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“Transparency and Accountability are complementary to each other.” Comment. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-2

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“पारदर्शिता एवं जवाबदेही एक दूसरे के पूरक है।” टिप्पणी कीजिए।

Ans: भूमिका:

लोक प्रशासन में पारदर्शिता (Transparency) और जवाबदेही (Accountability) सुशासन के दो मूल स्तंभ हैं। पारदर्शिता से नागरिकों को शासन की गतिविधियों की जानकारी मिलती है, जबकि जवाबदेही यह सुनिश्चित करती है कि सत्ता का दुरुपयोग न हो। दोनों का संबंध आपस में गहराई से जुड़ा है।

मुख्य बिंदु:

  • पारदर्शिता से शासन की नीतियाँ, निर्णय और व्यय जनता के सामने स्पष्ट होते हैं।
  • यह नागरिकों को शासन में भागीदारी और निगरानी का अवसर देती है।
  • जवाबदेही यह सुनिश्चित करती है कि अधिकारी अपने कार्यों के लिए उत्तरदायी रहें।
  • पारदर्शिता के बिना जवाबदेही का मूल्यांकन संभव नहीं है।
  • सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • जब शासन पारदर्शी होता है, तो भ्रष्टाचार और अपारदर्शी निर्णयों में कमी आती है।
  • जवाबदेही नागरिक विश्वास को सुदृढ़ बनाती है, जिससे शासन अधिक प्रभावी होता है।

निष्कर्ष:

इस प्रकार पारदर्शिता और जवाबदेही एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों मिलकर लोकतंत्र में जनहित, विश्वास और सुशासन की नींव को मजबूत करते हैं।

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How the power of Governor to Pardon is different from the power of the President under Article 72 of the Indian Constitution ? [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-2

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भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राज्यपाल की क्षमादान का अधिकार राष्ट्रपति की अधिकार से किस प्रकार भिन्न है ?

Ans: भूमिका :

भारतीय संविधान में दया, क्षमा, उपशमन और दंड परिवर्तन के अधिकार राष्ट्रपति (अनुच्छेद 72) और राज्यपाल (अनुच्छेद 161) दोनों को दिए गए हैं। इनका उद्देश्य न्याय के साथ मानवीय दृष्टिकोण बनाए रखना है। किंतु दोनों के अधिकारों की सीमा और क्षेत्र अलग-अलग हैं।

मुख्य बिंदु:

  • संवैधानिक आधार: राष्ट्रपति का अधिकार अनुच्छेद 72 में, जबकि राज्यपाल का अनुच्छेद 161 में निहित है।
  • प्रभाव क्षेत्र: राष्ट्रपति का अधिकार पूरे भारत पर लागू होता है, जबकि राज्यपाल का अधिकार केवल अपने राज्य तक सीमित है।
  • विधायी क्षेत्र: राष्ट्रपति केंद्रीय कानूनों के अंतर्गत अपराधों पर दया दे सकते हैं; राज्यपाल केवल राज्य कानूनों के अंतर्गत।
  • मृत्युदंड: राष्ट्रपति मृत्युदंड को क्षमा कर सकते हैं; राज्यपाल केवल उसे स्थगित या परिवर्तित कर सकते हैं।
  • न्यायिक शक्तियाँ: राष्ट्रपति सैन्य न्यायालयों द्वारा दिए गए दंड को भी क्षमा कर सकते हैं; राज्यपाल नहीं।
  • अधिकार का उपयोग: राष्ट्रपति केंद्र सरकार की सलाह पर कार्य करते हैं; राज्यपाल राज्य मंत्रिपरिषद की सलाह पर।
  • विस्तार का स्तर: राष्ट्रपति का दया अधिकार अधिक व्यापक और प्रभावशाली है।

निष्कर्ष :

अतः राज्यपाल का क्षमादान अधिकार सीमित है और केवल राज्य के अपराधों तक सीमित रहता है, जबकि राष्ट्रपति का अधिकार राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक और सर्वोच्च होता है।

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Mention three demerits of Judicial Activism. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-2

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न्यायिक सक्रियता के तीन दोषों का वर्णन कीजिए ।

Ans: भूमिका:

न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से न्यायालय संविधान की भावना के अनुरूप कार्यपालिका और विधायिका के निर्णयों की समीक्षा करता है। हालांकि इसका उद्देश्य जनहित की रक्षा करना है, परंतु अत्यधिक हस्तक्षेप कई बार नकारात्मक प्रभाव भी छोड़ता है।

मुख्य बिंदु:

  • सत्ता पृथक्करण का उल्लंघन: न्यायपालिका का प्रशासनिक या विधायी क्षेत्र में हस्तक्षेप संविधान की त्रिसत्ता सिद्धांत को कमजोर करता है।
  • लोकतांत्रिक जवाबदेही में कमी: न्यायाधीश निर्वाचित नहीं होते, फिर भी नीतिगत निर्णय लेने लगते हैं।
  • नीतिगत असंतुलन: न्यायिक आदेश कभी-कभी सरकार की नीतियों के व्यावहारिक क्रियान्वयन को बाधित करते हैं।
  • अत्यधिक जनहित याचिकाएँ (PIL misuse): तुच्छ या राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित याचिकाएँ न्यायिक समय की हानि करती हैं।
  • विधायिका की भूमिका में हस्तक्षेप: न्यायालय कभी-कभी कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ जाता है।
  • प्रशासनिक दक्षता पर प्रभाव: बार-बार के हस्तक्षेप से प्रशासनिक अधिकारियों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता घटती है।
  • न्यायिक विश्वसनीयता पर प्रश्न: अत्यधिक हस्तक्षेप से न्यायपालिका की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता है।

निष्कर्ष :

इस प्रकार न्यायिक सक्रियता तभी लाभकारी है जब वह संवैधानिक सीमाओं में रहे। अति सक्रियता लोकतंत्र की संतुलित संरचना को कमजोर कर सकती है।

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Why the 42nd Amendment is called a revision of the Indian Constitution? [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-2

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42 वें भारतीय संशोधन को संविधान का पुनः लेखन क्यों कहा जाता है ?

Ans:  भूमिका:

सन् 1976 में किया गया 42वां संविधान संशोधन भारतीय संविधान के इतिहास का सबसे व्यापक संशोधन माना जाता है। इसे “मिनी संविधान” या “संविधान का पुनः लेखन” कहा गया क्योंकि इसने संविधान के अनेक भागों में बड़े पैमाने पर परिवर्तन किए। इस संशोधन से संविधान की मूल भावना पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।

मुख्य बिंदु:

  • प्रस्तावना में “समाजवादी”, “पंथनिरपेक्ष” और “अखंडता” शब्द जोड़े गए।
  • मौलिक कर्तव्यों (अनुच्छेद 51A) का नया भाग जोड़ा गया।
  • न्यायपालिका की शक्तियों पर नियंत्रण के प्रयास किए गए।
  • संसद को व्यापक संशोधन शक्तियाँ प्रदान की गईं।
  • केन्द्र सरकार की शक्तियाँ राज्यों की तुलना में बढ़ाई गईं।
  • न्यायिक पुनरावलोकन की सीमा तय करने का प्रयास किया गया।
  • नियोजन नीति और समाजवादी सिद्धांतों पर बल दिया गया।

निष्कर्ष:

इस प्रकार 42वां संशोधन संविधान की संरचना, स्वरूप और दिशा में व्यापक बदलाव लाया। इसलिए इसे भारतीय संविधान का पुनः लेखन कहा जाता है।

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Why the Preamble is called the Philosophy of the Indian Constitution?[Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-2

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प्रस्तावना को भारतीय संविधान का दर्शन क्यों कहा जाता है ?

Ans:  भूमिका (Introduction):

भारतीय संविधान की प्रस्तावना संविधान की आत्मा मानी जाती है। यह न केवल संविधान की मूल भावना को व्यक्त करती है, बल्कि उसके उद्देश्यों और आदर्शों का दार्शनिक मार्गदर्शन भी प्रदान करती है। इसे संविधान का दर्पण कहा जाता है क्योंकि इसमें भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सोच का सार निहित है।

मुख्य बिंदु (Important points):

  • प्रस्तावना संविधान के मूल उद्देश्यों – न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—को स्पष्ट करती है।
  • यह भारत को “संपूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” घोषित करती है।
  • यह संविधान की भावना और आदर्शों की दिशा निर्धारित करती है।
  • प्रस्तावना नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों के मूल स्रोत की प्रेरणा देती है
  • यह संविधान निर्माताओं की विचारधारा और उद्देश्य को दर्शाती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे संविधान की “मूल संरचना” का भाग माना है।
  • यह भारत की लोकतांत्रिक पहचान और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक है।

निष्कर्ष:

अतः प्रस्तावना संविधान के आदर्शों और मूल्यों का सार प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि इसे भारतीय संविधान का दर्शन कहा जाता है।

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“United Nations Organisation has failed in its objective of maintaining international peace and security.” Describe with example. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

“संयुक्त राष्ट्र संघ अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखने के अपने उद्देश्य में विफल रहा है।” उदाहरण के साथ वर्णन कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations – UN) की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से हुई थी। इसका लक्ष्य था—युद्ध की पुनरावृत्ति रोकना और राष्ट्रों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना। किन्तु, समय के साथ यह संगठन अपने मूल उद्देश्य को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में असफल रहा है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • सुरक्षा परिषद् (UNSC) के पाँच स्थायी सदस्यों (P5) के वीटो अधिकार के कारण निर्णय प्रक्रिया अक्सर बाधित होती है।
  • सीरिया, यूक्रेन, गाज़ा जैसे संघर्षों में संयुक्त राष्ट्र निर्णायक हस्तक्षेप नहीं कर सका।
  • इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष में दशकों से शांति स्थापना के प्रयास असफल रहे हैं।
  • रवांडा (1994) और बोस्निया (1995) में नरसंहार रोकने में UN की असफलता मानवता पर कलंक रही।
  • अफगानिस्तान और इराक युद्ध में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका कमजोर और विभाजित रही।
  • कई बार बड़ी शक्तियाँ संगठन के मंच का उपयोग अपने राजनीतिक हितों के लिए करती हैं।
  • शांति सेना (Peacekeeping Forces) कई बार निष्क्रिय और सीमित अधिकारों में बंधी रहती हैं।
  • आर्थिक और मानवीय संकटों में भी इसकी प्रतिक्रिया अक्सर धीमी रही है।
  • जलवायु परिवर्तन, शरणार्थी संकट, आतंकवाद जैसे नए खतरों पर भी प्रभावी वैश्विक नीति नहीं बन सकी।
  • संगठन की संरचना और सदस्यता आज की विश्व राजनीति के अनुरूप नहीं है।
  • विकासशील देशों की आवाज़, विशेषकर भारत जैसी उभरती शक्तियों की, निर्णय प्रक्रिया में सीमित है।
  • सुधार की कमी के कारण UN की विश्वसनीयता और प्रासंगिकता पर प्रश्न उठ रहे हैं।

उदाहरण:

यूक्रेन-रूस युद्ध (2022) में सुरक्षा परिषद् विभाजित रही और कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका — यह विफलता का ताज़ा उदाहरण है।

निष्कर्ष (Conclusion):

संयुक्त राष्ट्र संघ की सीमाएँ आज की बहुध्रुवीय दुनिया में स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी हैं।

यदि इसमें संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो यह संगठन अपने मूल उद्देश्य — विश्व शांति और सुरक्षा — से और अधिक दूर होता जाएगा।

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What are the consequences of the ongoing Israel-Palestine conflict? How should India address the emerging challenges? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के क्या परिणाम हैं ? भारत को इससे उत्पन्न चुनौतियों का सामना कैसे करना चाहिए ?

Ans: परिचय:

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष (Israel-Palestine Conflict) मध्य पूर्व का सबसे पुराना और जटिल विवाद है, जिसकी जड़ें 1948 में इजराइल के गठन से जुड़ी हैं। यह संघर्ष धार्मिक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक कारणों से दशकों से जारी है। इसके परिणाम केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और भारत जैसे देशों पर भी प्रभाव डालते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • मानवाधिकार संकट: संघर्ष में आम नागरिकों की मौत, विस्थापन और मानवीय त्रासदी बढ़ी है।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता: मध्य पूर्व में शांति और स्थायित्व लगातार प्रभावित हुआ है।
  • आतंकवाद का प्रसार: चरमपंथी संगठनों को हिंसा फैलाने का अवसर मिला।
  • वैश्विक तेल बाजार पर असर: पश्चिम एशिया में तनाव से तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय ध्रुवीकरण: अमेरिका, यूरोपीय संघ, अरब देशों और रूस की नीतियाँ एक-दूसरे से टकराती हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न: शांति प्रयास बार-बार असफल रहे हैं।
  • भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) पर खतरा: पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का प्रमुख स्रोत है।
  • प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: हजारों भारतीय नागरिक इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।
  • राजनयिक संतुलन की चुनौती: भारत इजराइल और फिलिस्तीन दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है।
  • आर्थिक संबंधों पर प्रभाव: संघर्ष से व्यापार, रक्षा और तकनीकी सहयोग प्रभावित हो सकता है।
  • मानवीय दृष्टिकोण: भारत निरंतर “दो-राष्ट्र समाधान” (Two-State Solution) का समर्थन करता है।
  • संघर्ष की दीर्घता: क्षेत्रीय अस्थिरता भारत की पश्चिम एशिया नीति को जटिल बनाती है।
  • भारत के लिए चुनौतियों से निपटने के उपाय:
  • संतुलित कूटनीति अपनाकर दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना।
  • क्षेत्र में शांति प्रयासों का समर्थन और मानवीय सहायता प्रदान करना।
  • तेल आपूर्ति और प्रवासी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक तंत्र विकसित करना।
  • वैश्विक मंचों पर शांति और सह-अस्तित्व की नीति को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष (Conclusion ):

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष ने विश्व शांति और भारत की पश्चिम एशिया नीति दोनों को प्रभावित किया है। भारत को अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए संतुलित, मानवीय और शांति-समर्थक भूमिका निभानी चाहिए।

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Examine the major issues of dispute between India and Bangladesh and give suggestions for improving bilateral relations. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

भारत एवं बांग्लादेश के मध्य विवाद के प्रमुख मुद्दों का परीक्षण कीजिए एवं द्विपक्षीय सम्बन्धों में सुधार हेतु सुझाव दीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

भारत और बांग्लादेश ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। 1971 में स्वतंत्रता के बाद से दोनों देशों के सम्बन्ध सामान्यतः सहयोगात्मक रहे हैं, परंतु कुछ मुद्दों पर मतभेद भी बने हुए हैं। इन विवादों का समाधान दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • जल बँटवारा विवाद (Water Sharing Dispute): सबसे प्रमुख मुद्दा गंगा और तीस्ता नदी के जल वितरण को लेकर है।
  • सीमा विवाद: 2015 के भूमि सीमा समझौते (Land Boundary Agreement) से अधिकांश मुद्दे सुलझे, परंतु कुछ सीमाई अतिक्रमण अब भी होते हैं।
  • अवैध आव्रजन (Illegal Migration): असम व पूर्वोत्तर भारत में बांग्लादेशी घुसपैठ एक संवेदनशील विषय है।
  • सीमापार तस्करी (Cross-border Smuggling): मवेशी, नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी दोनों देशों के लिए चिंता का विषय है।
  • रोहिंग्या शरणार्थी संकट: इस मुद्दे पर दोनों देशों की स्थिति और सहयोग की सीमा भिन्न है।
  • सीमा सुरक्षा बलों के बीच तनाव: कभी-कभी गोलीबारी और विवाद की घटनाएँ संबंधों को प्रभावित करती हैं।
  • व्यापार असंतुलन (Trade Imbalance): भारत को व्यापार में अधिक लाभ होने से बांग्लादेश में असंतोष रहता है।
  • परिवहन व संपर्क (Connectivity): हाल के वर्षों में सड़क, रेल और जलमार्गों से संपर्क बेहतर हुआ है।
  • ऊर्जा सहयोग: बिजली व ईंधन के क्षेत्र में भारत-बांग्लादेश सहयोग बढ़ा है।
  • संस्कृतिक संबंध: साझा भाषा, परंपरा और धर्म दोनों देशों को जोड़ते हैं।
  • कूटनीतिक प्रयास: द्विपक्षीय वार्ताओं और उच्चस्तरीय यात्राओं से संबंधों में सकारात्मक सुधार हुआ है।
  • भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति बांग्लादेश को क्षेत्रीय सहयोग का प्रमुख भागीदार बनाती है।
  • सुझाव (Suggestions):
  • तीस्ता जल समझौते पर शीघ्र समाधान किया जाए।
  • सीमा प्रबंधन में संयुक्त निगरानी और तकनीकी सहयोग बढ़ाया जाए।
  • व्यापार संतुलन के लिए बांग्लादेश को अधिक बाज़ार पहुँच दी जाए।
  • सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष (Conclusion):

भारत-बांग्लादेश संबंधों में सहयोग की अपार संभावनाएँ हैं, पर विवादों का समाधान आवश्यक है। आपसी विश्वास, संवाद और समान हितों पर आधारित नीति से दोनों देश क्षेत्रीय स्थिरता और प्रगति के अग्रदूत बन सकते

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What is India’s progress on hunger and poverty after 2014? Explain. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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2014 के पश्चात भूख और गरीबी पर भारत की प्रगति क्या है ? व्याख्या कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

2014 के बाद भारत सरकार ने भूख (Hunger) और गरीबी (Poverty) को कम करने के लिए कई व्यापक नीतियाँ और योजनाएँ शुरू कीं। इनका उद्देश्य था—“सबका साथ, सबका विकास” के सिद्धांत पर आधारित समावेशी विकास सुनिश्चित करना। हालाँकि कुछ प्रगति हुई है, फिर भी भूख और कुपोषण जैसी समस्याएँ आज भी चुनौती बनी हुई हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • 2014 के बाद गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत लगातार घटा है।
  • नीति आयोग के अनुसार, 2013-14 से 2022 तक लगभग 24 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) से बाहर आए।
  • प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) ने भोजन का अधिकार सुनिश्चित किया।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, और जल जीवन मिशन ने जीवन स्तर में सुधार किया।
  • मनरेगा (MGNREGA) ने ग्रामीण रोजगार के माध्यम से आय में वृद्धि की।
  • जन-धन योजना ने वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ाया, जिससे गरीब तबकों की पहुँच बैंकिंग तक हुई।
  • आयुष्मान भारत योजना ने स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाया।
  • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) ने योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाई और लीकेज घटाया।
  • कोविड-19 के दौरान सरकार की राहत योजनाओं ने गरीब वर्गों को आंशिक सहारा दिया।
  • फिर भी, ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2024 में भारत की रैंक अभी भी चिंताजनक है (100 से नीचे)।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण, बेरोजगारी और मूल्यवृद्धि जैसी समस्याएँ अब भी गरीबी को बढ़ाती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

2014 के बाद भारत ने गरीबी घटाने और खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में उल्लेखनीय कदम उठाए हैं। फिर भी, स्थायी विकास के लिए रोजगार सृजन, पोषण सुधार और सामाजिक सुरक्षा को और सशक्त बनाना आवश्यक है।                  

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The labour class of the country has been significantly affected by the New Economic Policy. Explain. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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नई आर्थिक नीति से देश का श्रमिक वर्ग बहुत प्रभावित हुआ है। स्पष्ट कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

भारत में 1991 में लागू की गई नई आर्थिक नीति (New Economic Policy – NEP) ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में बड़ा परिवर्तन लाया। इस नीति ने भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धात्मक बनाया, परंतु इसके प्रभाव से श्रमिक वर्ग (Working Class) पर गहरा असर पड़ा। आर्थिक सुधारों ने जहाँ विकास के अवसर बढ़ाए, वहीं श्रमिकों की सुरक्षा और स्थायित्व को चुनौती भी दी।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • नई आर्थिक नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) का दायरा घटा और निजीकरण बढ़ा।
  • इससे लाखों श्रमिकों की नौकरी अस्थिर (Job insecurity) हो गई।
  • ठेका प्रणाली (Contract system) के विस्तार से स्थायी रोजगार घटे।
  • श्रम कानूनों को लचीला बनाने से श्रमिकों की सौदेबाज़ी शक्ति कमजोर हुई।
  • औद्योगिक पुनर्गठन से कई पारंपरिक उद्योग बंद हुए, जिससे बेरोजगारी बढ़ी।
  • असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) में काम करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी।
  • मजदूरी दरें (Wages) महँगाई के अनुपात में नहीं बढ़ीं।
  • सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ (Social Security Schemes) सीमित दायरे में रह गईं।
  • श्रमिकों की यूनियनें (Trade Unions) कमजोर पड़ीं और उनका प्रभाव घटा।
  • महिलाएँ और प्रवासी मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हुए।
  • प्रतिस्पर्धा और उत्पादकता के दबाव से कार्य-परिस्थितियाँ कठिन हुईं।
  • कौशल विकास (Skill Development) के प्रयासों के बावजूद निम्न आय वर्ग पर असमानता बढ़ी।

निष्कर्ष (Conclusion):

नई आर्थिक नीति ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा, पर श्रमिक वर्ग पर इसके नकारात्मक प्रभाव गहरे रहे। आवश्यक है कि विकास के साथ-साथ श्रमिकों की सुरक्षा, सम्मान और सामाजिक न्याय को भी प्राथमिकता दी जाए।

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