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“United Nations Organisation has failed in its objective of maintaining international peace and security.” Describe with example. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

“संयुक्त राष्ट्र संघ अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखने के अपने उद्देश्य में विफल रहा है।” उदाहरण के साथ वर्णन कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations – UN) की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से हुई थी। इसका लक्ष्य था—युद्ध की पुनरावृत्ति रोकना और राष्ट्रों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना। किन्तु, समय के साथ यह संगठन अपने मूल उद्देश्य को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में असफल रहा है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • सुरक्षा परिषद् (UNSC) के पाँच स्थायी सदस्यों (P5) के वीटो अधिकार के कारण निर्णय प्रक्रिया अक्सर बाधित होती है।
  • सीरिया, यूक्रेन, गाज़ा जैसे संघर्षों में संयुक्त राष्ट्र निर्णायक हस्तक्षेप नहीं कर सका।
  • इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष में दशकों से शांति स्थापना के प्रयास असफल रहे हैं।
  • रवांडा (1994) और बोस्निया (1995) में नरसंहार रोकने में UN की असफलता मानवता पर कलंक रही।
  • अफगानिस्तान और इराक युद्ध में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका कमजोर और विभाजित रही।
  • कई बार बड़ी शक्तियाँ संगठन के मंच का उपयोग अपने राजनीतिक हितों के लिए करती हैं।
  • शांति सेना (Peacekeeping Forces) कई बार निष्क्रिय और सीमित अधिकारों में बंधी रहती हैं।
  • आर्थिक और मानवीय संकटों में भी इसकी प्रतिक्रिया अक्सर धीमी रही है।
  • जलवायु परिवर्तन, शरणार्थी संकट, आतंकवाद जैसे नए खतरों पर भी प्रभावी वैश्विक नीति नहीं बन सकी।
  • संगठन की संरचना और सदस्यता आज की विश्व राजनीति के अनुरूप नहीं है।
  • विकासशील देशों की आवाज़, विशेषकर भारत जैसी उभरती शक्तियों की, निर्णय प्रक्रिया में सीमित है।
  • सुधार की कमी के कारण UN की विश्वसनीयता और प्रासंगिकता पर प्रश्न उठ रहे हैं।

उदाहरण:

यूक्रेन-रूस युद्ध (2022) में सुरक्षा परिषद् विभाजित रही और कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका — यह विफलता का ताज़ा उदाहरण है।

निष्कर्ष (Conclusion):

संयुक्त राष्ट्र संघ की सीमाएँ आज की बहुध्रुवीय दुनिया में स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी हैं।

यदि इसमें संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो यह संगठन अपने मूल उद्देश्य — विश्व शांति और सुरक्षा — से और अधिक दूर होता जाएगा।

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What are the consequences of the ongoing Israel-Palestine conflict? How should India address the emerging challenges? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के क्या परिणाम हैं ? भारत को इससे उत्पन्न चुनौतियों का सामना कैसे करना चाहिए ?

Ans: परिचय:

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष (Israel-Palestine Conflict) मध्य पूर्व का सबसे पुराना और जटिल विवाद है, जिसकी जड़ें 1948 में इजराइल के गठन से जुड़ी हैं। यह संघर्ष धार्मिक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक कारणों से दशकों से जारी है। इसके परिणाम केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और भारत जैसे देशों पर भी प्रभाव डालते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • मानवाधिकार संकट: संघर्ष में आम नागरिकों की मौत, विस्थापन और मानवीय त्रासदी बढ़ी है।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता: मध्य पूर्व में शांति और स्थायित्व लगातार प्रभावित हुआ है।
  • आतंकवाद का प्रसार: चरमपंथी संगठनों को हिंसा फैलाने का अवसर मिला।
  • वैश्विक तेल बाजार पर असर: पश्चिम एशिया में तनाव से तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय ध्रुवीकरण: अमेरिका, यूरोपीय संघ, अरब देशों और रूस की नीतियाँ एक-दूसरे से टकराती हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न: शांति प्रयास बार-बार असफल रहे हैं।
  • भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) पर खतरा: पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का प्रमुख स्रोत है।
  • प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: हजारों भारतीय नागरिक इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।
  • राजनयिक संतुलन की चुनौती: भारत इजराइल और फिलिस्तीन दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है।
  • आर्थिक संबंधों पर प्रभाव: संघर्ष से व्यापार, रक्षा और तकनीकी सहयोग प्रभावित हो सकता है।
  • मानवीय दृष्टिकोण: भारत निरंतर “दो-राष्ट्र समाधान” (Two-State Solution) का समर्थन करता है।
  • संघर्ष की दीर्घता: क्षेत्रीय अस्थिरता भारत की पश्चिम एशिया नीति को जटिल बनाती है।
  • भारत के लिए चुनौतियों से निपटने के उपाय:
  • संतुलित कूटनीति अपनाकर दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना।
  • क्षेत्र में शांति प्रयासों का समर्थन और मानवीय सहायता प्रदान करना।
  • तेल आपूर्ति और प्रवासी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक तंत्र विकसित करना।
  • वैश्विक मंचों पर शांति और सह-अस्तित्व की नीति को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष (Conclusion ):

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष ने विश्व शांति और भारत की पश्चिम एशिया नीति दोनों को प्रभावित किया है। भारत को अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए संतुलित, मानवीय और शांति-समर्थक भूमिका निभानी चाहिए।

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Examine the major issues of dispute between India and Bangladesh and give suggestions for improving bilateral relations. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

भारत एवं बांग्लादेश के मध्य विवाद के प्रमुख मुद्दों का परीक्षण कीजिए एवं द्विपक्षीय सम्बन्धों में सुधार हेतु सुझाव दीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

भारत और बांग्लादेश ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। 1971 में स्वतंत्रता के बाद से दोनों देशों के सम्बन्ध सामान्यतः सहयोगात्मक रहे हैं, परंतु कुछ मुद्दों पर मतभेद भी बने हुए हैं। इन विवादों का समाधान दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • जल बँटवारा विवाद (Water Sharing Dispute): सबसे प्रमुख मुद्दा गंगा और तीस्ता नदी के जल वितरण को लेकर है।
  • सीमा विवाद: 2015 के भूमि सीमा समझौते (Land Boundary Agreement) से अधिकांश मुद्दे सुलझे, परंतु कुछ सीमाई अतिक्रमण अब भी होते हैं।
  • अवैध आव्रजन (Illegal Migration): असम व पूर्वोत्तर भारत में बांग्लादेशी घुसपैठ एक संवेदनशील विषय है।
  • सीमापार तस्करी (Cross-border Smuggling): मवेशी, नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी दोनों देशों के लिए चिंता का विषय है।
  • रोहिंग्या शरणार्थी संकट: इस मुद्दे पर दोनों देशों की स्थिति और सहयोग की सीमा भिन्न है।
  • सीमा सुरक्षा बलों के बीच तनाव: कभी-कभी गोलीबारी और विवाद की घटनाएँ संबंधों को प्रभावित करती हैं।
  • व्यापार असंतुलन (Trade Imbalance): भारत को व्यापार में अधिक लाभ होने से बांग्लादेश में असंतोष रहता है।
  • परिवहन व संपर्क (Connectivity): हाल के वर्षों में सड़क, रेल और जलमार्गों से संपर्क बेहतर हुआ है।
  • ऊर्जा सहयोग: बिजली व ईंधन के क्षेत्र में भारत-बांग्लादेश सहयोग बढ़ा है।
  • संस्कृतिक संबंध: साझा भाषा, परंपरा और धर्म दोनों देशों को जोड़ते हैं।
  • कूटनीतिक प्रयास: द्विपक्षीय वार्ताओं और उच्चस्तरीय यात्राओं से संबंधों में सकारात्मक सुधार हुआ है।
  • भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति बांग्लादेश को क्षेत्रीय सहयोग का प्रमुख भागीदार बनाती है।
  • सुझाव (Suggestions):
  • तीस्ता जल समझौते पर शीघ्र समाधान किया जाए।
  • सीमा प्रबंधन में संयुक्त निगरानी और तकनीकी सहयोग बढ़ाया जाए।
  • व्यापार संतुलन के लिए बांग्लादेश को अधिक बाज़ार पहुँच दी जाए।
  • सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष (Conclusion):

भारत-बांग्लादेश संबंधों में सहयोग की अपार संभावनाएँ हैं, पर विवादों का समाधान आवश्यक है। आपसी विश्वास, संवाद और समान हितों पर आधारित नीति से दोनों देश क्षेत्रीय स्थिरता और प्रगति के अग्रदूत बन सकते

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What is India’s progress on hunger and poverty after 2014? Explain. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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2014 के पश्चात भूख और गरीबी पर भारत की प्रगति क्या है ? व्याख्या कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

2014 के बाद भारत सरकार ने भूख (Hunger) और गरीबी (Poverty) को कम करने के लिए कई व्यापक नीतियाँ और योजनाएँ शुरू कीं। इनका उद्देश्य था—“सबका साथ, सबका विकास” के सिद्धांत पर आधारित समावेशी विकास सुनिश्चित करना। हालाँकि कुछ प्रगति हुई है, फिर भी भूख और कुपोषण जैसी समस्याएँ आज भी चुनौती बनी हुई हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • 2014 के बाद गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत लगातार घटा है।
  • नीति आयोग के अनुसार, 2013-14 से 2022 तक लगभग 24 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) से बाहर आए।
  • प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) ने भोजन का अधिकार सुनिश्चित किया।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, और जल जीवन मिशन ने जीवन स्तर में सुधार किया।
  • मनरेगा (MGNREGA) ने ग्रामीण रोजगार के माध्यम से आय में वृद्धि की।
  • जन-धन योजना ने वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ाया, जिससे गरीब तबकों की पहुँच बैंकिंग तक हुई।
  • आयुष्मान भारत योजना ने स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाया।
  • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) ने योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाई और लीकेज घटाया।
  • कोविड-19 के दौरान सरकार की राहत योजनाओं ने गरीब वर्गों को आंशिक सहारा दिया।
  • फिर भी, ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2024 में भारत की रैंक अभी भी चिंताजनक है (100 से नीचे)।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण, बेरोजगारी और मूल्यवृद्धि जैसी समस्याएँ अब भी गरीबी को बढ़ाती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

2014 के बाद भारत ने गरीबी घटाने और खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में उल्लेखनीय कदम उठाए हैं। फिर भी, स्थायी विकास के लिए रोजगार सृजन, पोषण सुधार और सामाजिक सुरक्षा को और सशक्त बनाना आवश्यक है।                  

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The labour class of the country has been significantly affected by the New Economic Policy. Explain. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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नई आर्थिक नीति से देश का श्रमिक वर्ग बहुत प्रभावित हुआ है। स्पष्ट कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

भारत में 1991 में लागू की गई नई आर्थिक नीति (New Economic Policy – NEP) ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में बड़ा परिवर्तन लाया। इस नीति ने भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धात्मक बनाया, परंतु इसके प्रभाव से श्रमिक वर्ग (Working Class) पर गहरा असर पड़ा। आर्थिक सुधारों ने जहाँ विकास के अवसर बढ़ाए, वहीं श्रमिकों की सुरक्षा और स्थायित्व को चुनौती भी दी।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • नई आर्थिक नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) का दायरा घटा और निजीकरण बढ़ा।
  • इससे लाखों श्रमिकों की नौकरी अस्थिर (Job insecurity) हो गई।
  • ठेका प्रणाली (Contract system) के विस्तार से स्थायी रोजगार घटे।
  • श्रम कानूनों को लचीला बनाने से श्रमिकों की सौदेबाज़ी शक्ति कमजोर हुई।
  • औद्योगिक पुनर्गठन से कई पारंपरिक उद्योग बंद हुए, जिससे बेरोजगारी बढ़ी।
  • असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) में काम करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी।
  • मजदूरी दरें (Wages) महँगाई के अनुपात में नहीं बढ़ीं।
  • सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ (Social Security Schemes) सीमित दायरे में रह गईं।
  • श्रमिकों की यूनियनें (Trade Unions) कमजोर पड़ीं और उनका प्रभाव घटा।
  • महिलाएँ और प्रवासी मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हुए।
  • प्रतिस्पर्धा और उत्पादकता के दबाव से कार्य-परिस्थितियाँ कठिन हुईं।
  • कौशल विकास (Skill Development) के प्रयासों के बावजूद निम्न आय वर्ग पर असमानता बढ़ी।

निष्कर्ष (Conclusion):

नई आर्थिक नीति ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा, पर श्रमिक वर्ग पर इसके नकारात्मक प्रभाव गहरे रहे। आवश्यक है कि विकास के साथ-साथ श्रमिकों की सुरक्षा, सम्मान और सामाजिक न्याय को भी प्राथमिकता दी जाए।

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What challenges is the Government facing in the implementing of welfare schemes for the most vulnerable sections? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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अति संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सरकार को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है ?

Ans: परिचय (Introduction):

भारत में सरकार द्वारा अति संवेदनशील वर्गों (Vulnerable Sections) — जैसे निर्धन, अनुसूचित जाति, जनजाति, दिव्यांग व वृद्धजन — के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएँ चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को साकार करना है। किन्तु इनके प्रभावी क्रियान्वयन में सरकार को अनेक संरचनात्मक और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

मुख्य बिंदु ( Important Points):

  • लाभार्थियों की सटीक पहचान (Identification of beneficiaries) में कठिनाई बनी रहती है।
  • योजनाओं का क्रियान्वयन कई विभागों में बिखरा होने से समन्वय की कमी होती है।
  • भ्रष्टाचार, दलाली व लीकेज (Leakage) से वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ नहीं पहुँचता।
  • आधार, बैंक खाता व डिजिटल साक्षरता की कमी से कई लोग योजनाओं से वंचित रहते हैं।
  • ग्रामीण व दूरदराज क्षेत्रों में अवसंरचना (Infrastructure) की कमी वितरण को बाधित करती है।
  • लाभार्थियों में योजना की जानकारी व जागरूकता का अभाव है।
  • योजनाओं में राजनीतिक हस्तक्षेप पारदर्शिता को प्रभावित करता है।
  • निगरानी और मूल्यांकन प्रणाली (Monitoring & Evaluation) पर्याप्त प्रभावी नहीं है।
  • डेटा प्रबंधन और वास्तविक समय पर ट्रैकिंग की सीमाएँ हैं।
  • सामाजिक भेदभाव और जातीय पूर्वाग्रह योजनाओं के निष्पक्ष क्रियान्वयन में बाधक बनते हैं।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय का अभाव संसाधनों के अपव्यय को बढ़ाता है।
  • बजटीय सीमाएँ और विलंबित फंड रिलीज़ भी बड़ी चुनौती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

सरकार को योजनाओं की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए पारदर्शिता, तकनीकी नवाचार और सामाजिक भागीदारी को सशक्त करना होगा। केवल यही उपाय अति संवेदनशील वर्गों को सच्चे अर्थों में विकास की मुख्यधारा से जोड़ सकते हैं।

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What role can the Finance Commission play in addressing regional disparities in India and what measures has it taken so far? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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भारत में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने में वित्त आयोग क्या भूमिका निभा सकता है और इसने अब तक क्या उपाय किए हैं ?

Ans: परिचय (Introduction):

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में क्षेत्रीय असमानताएँ (Regional Inequalities) एक प्रमुख चुनौती हैं। इन असमानताओं को कम करने में वित्त आयोग (Finance Commission) की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह आयोग केन्द्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के न्यायसंगत वितरण के माध्यम से संतुलित विकास सुनिश्चित करता है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • वित्त आयोग का गठन अनुच्छेद 280 के तहत हर पाँच वर्ष में किया जाता है।
  • इसका मुख्य कार्य केन्द्र और राज्यों के बीच राजस्व विभाजन (Tax Devolution) निर्धारित करना है।
  • आयोग वित्तीय संसाधनों का ऐसा वितरण करता है जिससे पिछड़े राज्यों को अधिक सहायता मिल सके।
  • यह राज्यों की वित्तीय क्षमता और आवश्यकताओं का तुलनात्मक मूल्यांकन करता है।
  • आयोग राज्यों की जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्रफल, आय स्तर और राजकोषीय अनुशासन जैसे मानदंडों को ध्यान में रखता है।
  • 14वें वित्त आयोग ने राज्यों को कुल कर राजस्व का 42% हिस्सा देने की अनुशंसा की, जिससे राज्यों की स्वायत्तता बढ़ी।
  • 15वें वित्त आयोग ने राज्यों के प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन (Performance-based incentives) को जोड़ा।
  • विशेष सहायता पूर्वोत्तर, पहाड़ी और आकांक्षी जिलों के लिए दी गई।
  • आयोग ने आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अनुदान देने की व्यवस्था की।
  • इसने राज्यों के वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता को बढ़ावा दिया।
  • आयोग की सिफारिशों से क्षेत्रीय संतुलन की दिशा में ठोस प्रगति हुई है।
  • फिर भी, राज्य-स्तरीय नीति कार्यान्वयन में असमानताएँ बनी हुई हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

वित्त आयोग भारत में वित्तीय समानता और क्षेत्रीय संतुलन का प्रमुख साधन है। इसके विवेकपूर्ण सुझावों से राज्यों की आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।

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How does the Indian Constitution compare with other modern constitutions in terms of flexibility and rigidity? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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लचीलेपन और कठोरता के संदर्भ में भारतीय संविधान की तुलना अन्य आधुनिक संविधानों से कैसे की जा सकती है ?

Ans: परिचय (Introduction):

भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत और संतुलित संविधान है, जिसमें न तो पूर्ण कठोरता है और न ही पूर्ण लचीलापन। यह विशेष रूप से इस प्रकार निर्मित किया गया है कि समय और परिस्थितियों के अनुसार संशोधन संभव हो सकें। लचीलापन और कठोरता के इस मिश्रण के कारण यह संविधान स्थायित्व और परिवर्तनशीलता दोनों को संतुलित करता है।

मुख्य बिंदु (12 Important Points):

  • ब्रिटेन का संविधान पूर्णतः लचीला है, क्योंकि वहाँ संसद सर्वोच्च है और संशोधन सामान्य कानूनों की तरह होते हैं।
  • अमेरिका का संविधान अत्यंत कठोर है; संशोधन के लिए दोनों सदनों और राज्यों की स्वीकृति आवश्यक होती है।
  • भारत का संविधान इन दोनों के बीच का संतुलित रूप है।
  • अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन की प्रक्रिया तीन प्रकार की है – सरल, विशेष, और राज्यों की सहमति से।
  • केवल संसद द्वारा संशोधन योग्य प्रावधान इसे लचीला बनाते हैं।
  • संघीय ढाँचे या न्यायपालिका से जुड़े प्रावधानों के लिए राज्यों की सहमति आवश्यक है, जो इसे कठोर बनाते हैं।
  • संविधान में अब तक 100 से अधिक संशोधन हुए हैं, जो इसके लचीलेपन का प्रमाण हैं।
  • फिर भी, मूल ढाँचे (Basic Structure) को परिवर्तित नहीं किया जा सकता, जो कठोरता दर्शाता है।
  • केशवानंद भारती मामला (1973) ने संविधान की मूल संरचना को सुरक्षित रखा।
  • इस संतुलन से संविधान समय के साथ विकसित होता रहा है।
  • अन्य आधुनिक संविधानों की तुलना में यह अधिक व्यावहारिक और अनुकूलनीय है।
  • इसकी यह प्रकृति भारतीय लोकतंत्र को स्थिरता और प्रगतिशीलता दोनों प्रदान करती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

भारतीय संविधान का लचीलापन इसे समयानुकूल बनाता है, जबकि कठोरता इसके मूल मूल्यों की रक्षा करती है। इसी संतुलन के कारण यह संविधान विश्व के सबसे जीवंत और दीर्घजीवी संविधानों में स्थान रखता है।

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What are the implications of the revised appointment process of Election Commission for ensuring its independence? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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चुनाव आयोग की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करने के लिए उसकी संशोधित नियुक्ति प्रक्रिया के निहितार्थ क्या हैं ?

Ans: परिचय (Introduction):

भारत में चुनाव आयोग (Election Commission of India) लोकतंत्र की निष्पक्षता और पारदर्शिता का प्रमुख आधार है। इसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए अत्यंत आवश्यक है। हाल ही में आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में संशोधन किए गए हैं, जिनके गहरे निहितार्थ लोकतांत्रिक संतुलन पर पड़े हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • पूर्व में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में स्वतंत्र चयन समिति का सुझाव दिया था।
  • इसके अनुसार चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल होने थे।
  • सरकार ने संशोधन कर मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय मंत्री को सदस्य बनाया।
  • यह संशोधन कार्यपालिका (Executive) के प्रभाव को बढ़ाता है।
  • इससे आयोग की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर प्रश्न उठे हैं।
  • विपक्ष और नागरिक संगठनों ने इसे “संवैधानिक संस्थाओं के राजनीतिकरण” की दिशा में कदम बताया।
  • सरकार का तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 324 की भावना के अनुरूप है।
  • आयोग की स्वतंत्रता उसकी विश्वसनीयता और चुनावों की निष्पक्षता के लिए अनिवार्य है।
  • न्यायपालिका की उपस्थिति चयन प्रक्रिया को संतुलित और पारदर्शी बनाती थी।
  • संशोधित प्रक्रिया से शक्तियों का केंद्रीकरण बढ़ने का खतरा है।
  • दीर्घकाल में यह लोकतंत्र के संस्थागत ढाँचे को प्रभावित कर सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

संशोधित नियुक्ति प्रक्रिया ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। लोकतंत्र की सुदृढ़ता के लिए आवश्यक है कि आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पूर्णतः निष्पक्ष, संतुलित और पारदर्शी बनी रहे।

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Analyze the statement, “State legislatures are often seen as the voice of the states within India’s federal structure.” [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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इस कथन का विश्लेषण कीजिए, “राज्य विधान-मंडलों को अक्सर भारत के संघीय ढाँचे के भीतर राज्यों की आवाज के रूप में देखा जाता है।”

Ans: परिचय (Introduction ):

भारत का संविधान संघीय (Federal) शासन प्रणाली पर आधारित है, जिसमें केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन है। राज्य विधान-मंडल (State Legislature) राज्य स्तर पर जनता की प्रतिनिधि संस्था है। इसे भारत के संघीय ढाँचे में राज्यों की आवाज़ के रूप में देखा जाता है क्योंकि यह राज्य की नीतियों, हितों और आवश्यकताओं को अभिव्यक्त करता है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • भारत में 28 राज्यों में से अधिकांश के पास द्विसदनीय (Bicameral) या एकसदनीय (Unicameral) विधान-मंडल है।
  • विधान सभा (Legislative Assembly) राज्य की निचली सदन है, जो प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुनी जाती है।
  • विधान परिषद (Legislative Council) ऊपरी सदन है, जो विभिन्न सामाजिक समूहों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है।
  • राज्य विधान-मंडल राज्य की नीतियों, कानूनों और बजट को निर्धारित करता है।
  • यह केन्द्र की नीतियों पर भी चर्चा कर राज्य के दृष्टिकोण को सामने लाता है।
  • संघीय ढाँचे में यह संस्था राज्यों की स्वायत्तता को सुदृढ़ करती है।
  • विधान सभा राज्य सरकार की कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है।
  • यह केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में संतुलन बनाए रखने का माध्यम है।
  • विधान परिषद् शिक्षाविदों, स्नातकों व शिक्षकों की राय को अभिव्यक्त करने का मंच है।
  • यह राज्य की समस्याओं और आकांक्षाओं को केन्द्र तक पहुँचाने का कार्य करती है।
  • राज्य विधान-मंडल के माध्यम से राज्य के नागरिक सीधे शासन प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
  • यह संघीय लोकतंत्र की आत्मा – ‘राज्यों की भागीदारी’ को मूर्त रूप देती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

इस प्रकार राज्य विधान-मंडल भारत के संघीय ढाँचे में राज्यों की लोकतांत्रिक आवाज़ के रूप में कार्य करता है। यह न केवल राज्य के हितों की रक्षा करता है, बल्कि केन्द्र और राज्यों के बीच सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को भी सुदृढ़ बनाता है।

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