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Discuss the functions of National Security Council of India. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के क्रिया कलापों की व्याख्या कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (National Security Council – NSC) की स्थापना वर्ष 1998 में देश की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के समन्वित निर्धारण और रणनीतिक मार्गदर्शन के लिए की गई थी। यह भारत की सर्वोच्च सलाहकारी संस्था है, जो आंतरिक, बाह्य, आर्थिक और सामरिक खतरों से निपटने हेतु समग्र सुरक्षा दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का गठन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में किया गया है।
  • इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित नीतिगत सलाह देना और विभिन्न मंत्रालयों, एजेंसियों एवं सशस्त्र बलों के बीच समन्वय स्थापित करना है।
  • परिषद की संरचना तीन स्तरों पर आधारित है:
  • राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) – नीति निर्धारण निकाय।
  • स्ट्रैटेजिक पॉलिसी ग्रुप (SPG) – रणनीतिक नीतियों पर विचार-विमर्श।
  • नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर बोर्ड (NSAB) – विशेषज्ञ सलाह व अनुसंधान।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) परिषद के कार्यों का समन्वयन करता है और प्रधानमंत्री को प्रत्यक्ष सलाह देता है।
  • परिषद आतंकवाद, सीमा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, रक्षा नीति, आंतरिक विद्रोह और ऊर्जा सुरक्षा जैसे विषयों पर विचार करती है।
  • यह खुफिया एजेंसियों, विदेश नीति और रक्षा तंत्र के बीच सूचना-साझाकरण को सुदृढ़ करती है।
  • NSC संकट प्रबंधन तंत्र (Crisis Management Group) के माध्यम से आपात स्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करती है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के निर्माण में दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण विकसित करना इसका मुख्य कार्य है।
  • परिषद भारत की “एकीकृत सुरक्षा संरचना” (Integrated Security Framework) का केंद्रीय स्तंभ मानी जाती है।
  • NSAB द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टें और नीति सुझाव सरकार की रक्षा एवं विदेश नीतियों को दिशा प्रदान करते हैं।
  • यह वैश्विक सुरक्षा परिवर्तनों के अनुरूप भारत की सुरक्षा प्राथमिकताओं को अद्यतन रखती है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

इस प्रकार, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद भारत की समग्र सुरक्षा व्यवस्था का बौद्धिक और नीतिगत केंद्र है। यह संस्था राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए आंतरिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के बीच प्रभावी संतुलन स्थापित करती है।

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Narco-terrorism has emerged as a serious threat across the country. Suggest suitable measures to counter it. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

पूरे देश में नार्को-आतंकवाद एक गंभीर खतरे के रूप में उभरा है । इससे निपटने के लिये उपयुक्त उपाय सुझाइये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

नार्को-आतंकवाद (Narco-Terrorism) का आशय है मादक पदार्थों (Drugs) की तस्करी से प्राप्त धन का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण में करना। हाल के वर्षों में यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और युवा पीढ़ी के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में उभरा है, विशेषकर सीमावर्ती राज्यों जैसे पंजाब, जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • आतंकवादी संगठन ड्रग व्यापार से अर्जित धन का प्रयोग हथियार खरीद, प्रशिक्षण और नेटवर्क विस्तार में करते हैं।
  • भारत की भौगोलिक स्थिति—“Golden Crescent” (अफगानिस्तान-पाकिस्तान-ईरान) और “Golden Triangle” (म्यांमार-लाओस-थाईलैंड)—के बीच होने से इसे दोहरे खतरे का सामना है।
  • युवाओं में नशे की लत सामाजिक अस्थिरता और अपराध दर को बढ़ा रही है।
  • NDPS Act, 1985 (Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act) के तहत मादक पदार्थों की तस्करी पर कड़ा नियंत्रण है।
  • Narcotics Control Bureau (NCB), BSF और Indian Coast Guard ड्रग तस्करी पर निगरानी रखते हैं।
  • सीमा पार निगरानी को मज़बूत करने हेतु “स्मार्ट फेंसिंग”, ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है।
  • Enforcement Directorate (ED) और Financial Intelligence Unit (FIU) मनी लॉन्ड्रिंग पर निगरानी रखती हैं।
  • UNODC व SAARC Drug Control Programme के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सशक्त किया गया है।
  • स्कूल-कॉलेज स्तर पर Drug-Free India जैसे अभियानों से जन-जागरूकता बढ़ाई जा रही है।
  • नशा पीड़ितों के पुनर्वास केंद्रों के विस्तार पर भी बल दिया जा रहा है।
  • सीमा क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को बढ़ाना प्रभावी रणनीति सिद्ध हो सकती है।
  • आधुनिक साइबर निगरानी से ऑनलाइन ड्रग नेटवर्क पर अंकुश लगाया जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

स्पष्ट है कि नार्को-आतंकवाद केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्थिरता का भी प्रश्न है। सख्त कानून, उन्नत तकनीक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जन-जागरूकता के समन्वय से ही भारत इस जटिल खतरे का स्थायी समाधान पा सकता है।

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What are ‘Social Networking Sites’ and how does their uncontrolled use increase the possibilities of cyber attacks? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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‘सामाजिक संजाल स्थल’ क्या होते हैं ? और इनका अनियंत्रित उपयोग साइबर हमलों की संभावनाओं में किस प्रकार वृद्धि करता है ?

Ans: भूमिका (Introduction) –

‘सामाजिक संजाल स्थल’ (Social Networking Sites) वे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म हैं जहाँ उपयोगकर्ता आपसी संवाद, विचार, सूचना और सामग्री का आदान-प्रदान करते हैं। जैसे – फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर (X), यूट्यूब, लिंक्डइन आदि। ये आज सामाजिक सहभागिता और सूचना प्रसार का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • सामाजिक संजाल स्थल लोगों को जोड़ने, अभिव्यक्ति और सूचना साझा करने का अवसर देते हैं।
  • ये व्यवसाय, शिक्षा, राजनीति और जन-जागरूकता के प्रभावी साधन बन चुके हैं।
  • परंतु इनका अनियंत्रित और असावधान उपयोग साइबर सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।
  • उपयोगकर्ता अपनी व्यक्तिगत जानकारी, फोटो, लोकेशन और बैंक विवरण साझा करते हैं, जिन्हें साइबर अपराधी दुरुपयोग कर सकते हैं।
  • फिशिंग (Phishing) और मैलवेयर (Malware) जैसे हमले अक्सर सोशल मीडिया लिंक के माध्यम से फैलते हैं।
  • नकली प्रोफाइल और फेक न्यूज़ से न केवल भ्रम फैलता है, बल्कि डेटा चोरी और पहचान की जालसाजी भी बढ़ती है।
  • सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) तकनीक द्वारा हैकर्स लोगों को भावनात्मक रूप से भ्रमित कर पासवर्ड या निजी जानकारी प्राप्त करते हैं।
  • अनियंत्रित उपयोग से डेटा लीकेज, गोपनीयता भंग और राष्ट्रीय सुरक्षा तक को खतरा हो सकता है।
  • साइबर हमले अक्सर सोशल मीडिया पर साझा लापरवाह जानकारी के कारण संभव होते हैं।
  • भारत में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट, 2000 तथा CERT-In जैसी संस्थाएँ साइबर सुरक्षा की निगरानी करती हैं।
  • सरकार “डिजिटल साक्षरता अभियान” के माध्यम से नागरिकों को जागरूक करने का प्रयास कर रही है।
  • उपयोगकर्ताओं को मजबूत पासवर्ड, दो-स्तरीय प्रमाणीकरण और सावधानीपूर्ण साझा करने की आदत अपनानी चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion) –

इस प्रकार, सामाजिक संजाल स्थल जहाँ संवाद का सशक्त माध्यम हैं, वहीं अनियंत्रित उपयोग साइबर हमलों की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा देता है। इनका सुरक्षित, जिम्मेदार और जागरूक उपयोग ही डिजिटल युग में सुरक्षा और विश्वास का आधार बन सकता है।

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What are the ecologically sensitive areas in India? Mention the policies of the Government of India for their protection. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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भारत में पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र कौन-कौन से हैं ? इनके संरक्षण के लिये भारत सरकार की नीतियों का उल्लेख कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारत अपनी भौगोलिक विविधता और जैविक समृद्धि के कारण कई पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Ecologically Sensitive Areas – ESAs) का घर है। ये क्षेत्र पारिस्थितिक संतुलन, जलवायु स्थिरता और जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनके संरक्षण हेतु भारत सरकार ने अनेक नीतियाँ व कानूनी उपाय अपनाए हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र वे होते हैं जहाँ मानव हस्तक्षेप से पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो सकता है।
  • भारत में प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र हैं –
  • पश्चिमी घाट (Western Ghats) – यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, जैव विविधता से समृद्ध।
  • हिमालयी क्षेत्र – हिमनद, नदियों के स्रोत और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र।
  • सुंदरबन डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र।
  • अंडमान-निकोबार द्वीप समूह – समुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध
  • मरुस्थलीय क्षेत्र (थार रेगिस्तान) – शुष्क पारिस्थितिक संतुलन वाला क्षेत्र।
  • पूर्वोत्तर भारत – उच्च वर्षा और घनी वनस्पति वाला पारिस्थितिक क्षेत्र।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत इन क्षेत्रों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।
  • ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) नीति के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों के आसपास सीमित मानवीय गतिविधियाँ अनुमति-प्राप्त होती हैं।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र की निगरानी करता है।
  • CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management Act, 2016) वनों के क्षरण की भरपाई हेतु लागू है।
  • नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज़ हिमालय क्षेत्र के संरक्षण पर केंद्रित है।
  • ग्रीन इंडिया मिशन और राष्ट्रीय कार्य योजना जलवायु परिवर्तन पर (NAPCC) पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को प्रोत्साहित करते हैं।
  • ई-कोरिडोर परियोजनाएँ वन्यजीवों की आवाजाही और आवास संरक्षण के लिए लागू हैं।
  • स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल करने की नीति ने स्थायी परिणाम दिए हैं।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः भारत के पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र न केवल पर्यावरणीय संतुलन के प्रतीक हैं, बल्कि मानव अस्तित्व के लिए भी आवश्यक हैं। सरकार की नीतियाँ यदि वैज्ञानिक दृष्टि और स्थानीय सहभागिता के साथ लागू हों, तो इनका संरक्षण स्थायी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

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Compare Indian Knowledge Tradition based aeronautics with modern aeronautics. Mention the policies of the Department of Science and Technology for the research in this field. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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भारतीय ज्ञान परम्परा आधारित वैमानिकी शास्त्र की तुलना आधुनिक वैमानिकी शास्त्र से कीजिये । इस क्षेत्र में अनुसंधान हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की नीतियों का उल्लेख कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारतीय ज्ञान परम्परा में वैमानिकी शास्त्र (Aeronautics) का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों जैसे विमानिका शास्त्र और संहिताओं में मिलता है, जिनमें उड़ने वाले यंत्रों, उनकी संरचना और संचालन सिद्धांतों का वर्णन किया गया है। आधुनिक वैमानिकी शास्त्र (Modern Aeronautics) वैज्ञानिक परीक्षणों, भौतिकी के सिद्धांतों और प्रौद्योगिकी के प्रयोग पर आधारित है। दोनों की तुलना परंपरा और विज्ञान के विकासक्रम को दर्शाती है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • प्राचीन वैमानिकी शास्त्र में वायुयान के प्रकार, ईंधन, दिशा नियंत्रण एवं गति का वर्णन मिलता है।
  • यह ज्यामिति, यांत्रिकी और धातु विज्ञान के प्रारंभिक स्वरूपों से जुड़ा था।
  • आधुनिक वैमानिकी वायुगतिकी (Aerodynamics), प्रणोदन (Propulsion), सामग्री विज्ञान (Material Science) और इलेक्ट्रॉनिक्स पर आधारित है।
  • भारतीय परम्परा में यह अवधारणा वैचारिक और सैद्धांतिक थी; आधुनिक विज्ञान ने इसे प्रयोगात्मक रूप दिया।
  • आज वैमानिकी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और नैनो प्रौद्योगकी का प्रयोग बढ़ रहा है।
  • प्राचीन ग्रंथों का पुनःअध्ययन भारतीय वैज्ञानिक सोच की ऐतिहासिक गहराई को उजागर करता है।
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) इस क्षेत्र में Indigenous Knowledge Systems (IKS) पर अनुसंधान को प्रोत्साहित कर रहा है।
  • DST ने “भारतीय ज्ञान प्रणाली केंद्र” (IKS Division) की स्थापना कर पारंपरिक विज्ञान के वैज्ञानिक विश्लेषण को बढ़ावा दिया है।
  • एयरोस्पेस अनुसंधान हेतु DST-AR&DB (Aeronautics Research and Development Board) विभिन्न संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
  • यह नीतियाँ प्राचीन सिद्धांतों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं।
  • ISRO और DRDO भी वैमानिकी के क्षेत्र में स्वदेशी नवाचारों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
  • नीति का उद्देश्य भारत को आत्मनिर्भर वैमानिकी प्रौद्योगिकी (Aatmanirbhar Aeronautics) के क्षेत्र में अग्रणी बनाना है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः कहा जा सकता है कि भारतीय वैमानिकी परम्परा ने वैचारिक आधार प्रदान किया, जबकि आधुनिक वैमानिकी ने उसे वैज्ञानिक रूप दिया। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की नीतियाँ इन दोनों के समन्वय से भारत को प्राचीन ज्ञान और आधुनिक अनुसंधान के संगम पर अग्रसर कर रही हैं।

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What do you understand by buffer stock? Is it essential for food security in India? Explain clearly. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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बफर स्टॉक से आप क्या समझते हैं ? क्या भारत में खाद्य सुरक्षा के लिये यह आवश्यक है ? स्पष्ट रूप से व्याख्या कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

बफर स्टॉक (Buffer Stock) से तात्पर्य सरकार द्वारा आवश्यक मात्रा में खाद्यान्नों (जैसे गेहूँ, चावल आदि) का भंडारण करना है, ताकि आपातकालीन स्थितियों—जैसे सूखा, बाढ़ या बाजार में मूल्य अस्थिरता—में जन-आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। यह प्रणाली भारत की खाद्य सुरक्षा नीति का एक प्रमुख आधार है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • बफर स्टॉक का निर्माण भारतीय खाद्य निगम (FCI) द्वारा किया जाता है।
  • इसका उद्देश्य किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) देना और उपभोक्ताओं के लिए खाद्यान्न की स्थिर आपूर्ति बनाए रखना है।
  • यह स्टॉक सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के माध्यम से गरीब व कमजोर वर्गों तक भोजन पहुँचाने में सहायक होता है।
  • प्राकृतिक आपदाओं या आपूर्ति संकट के समय यह भंडार देश को राहत प्रदान करता है।
  • बफर स्टॉक मूल्य स्थिरीकरण (Price Stabilization) का भी प्रभावी साधन है।
  • सरकार प्रत्येक वर्ष खाद्य सुरक्षा मानदंडों के अनुसार न्यूनतम बफर स्टॉक सीमा निर्धारित करती है।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 ने इस प्रणाली को कानूनी समर्थन दिया है।
  • प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी योजनाओं के सफल संचालन के पीछे यही तंत्र कार्य करता है।
  • कोविड-19 महामारी के दौरान बफर स्टॉक ने देशभर में मुफ्त अनाज वितरण संभव बनाया।
  • हालांकि, अत्यधिक भंडारण से गोदामों पर दबाव, खाद्यान्न की बर्बादी और वित्तीय बोझ भी बढ़ता है।
  • इसलिए, तकनीकी भंडारण, आपूर्ति प्रबंधन और समयबद्ध निकासी जरूरी है।
  • डिजिटल निगरानी और ई-प्रोक्योरमेंट प्रणाली बफर स्टॉक प्रबंधन को अधिक पारदर्शी बना सकती है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

स्पष्ट है कि भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बफर स्टॉक नितांत आवश्यक है। यह न केवल संकट के समय भोजन की उपलब्धता बनाए रखता है, बल्कि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हितों की रक्षा भी करता है।

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Critically evaluate the strategy of poverty alleviation programmes in India, in recent years. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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हाल के वर्षों में, भारत में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की रणनीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारत में गरीबी उन्मूलन (Poverty Alleviation) स्वतंत्रता के बाद से सरकार की प्रमुख प्राथमिकता रही है। हाल के वर्षों में गरीबी घटाने की रणनीति में केवल आय वृद्धि नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, कौशल विकास और समावेशी विकास पर भी ध्यान दिया गया है। फिर भी, चुनौतियाँ बनी हुई हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • प्रारंभिक कार्यक्रम जैसे – गरीबी हटाओ योजना, IRDP, NREP आदि प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाने पर केंद्रित थे।
  • हाल के वर्षों में दृष्टिकोण “कल्याण आधारित” से “सशक्तिकरण आधारित” (Empowerment-based) रणनीति की ओर बदला है।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना, जन-धन योजना और उज्ज्वला योजना ने जीवन स्तर सुधारने में मदद की।
  • मनरेगा (MGNREGA) ने ग्रामीण रोजगार व आय सुरक्षा को मजबूत किया।
  • राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) ने स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से महिला सशक्तिकरण को प्रोत्साहित किया।
  • Direct Benefit Transfer (DBT) प्रणाली ने भ्रष्टाचार और रिसाव को कम किया।
  • डिजिटल इंडिया और आधार ने पारदर्शिता व वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया।
  • हालांकि, कई योजनाओं में लक्षित लाभार्थियों की पहचान, निगरानी और स्थायित्व की समस्या बनी रही।
  • असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों व शहरी गरीबों तक योजनाओं की पहुँच सीमित है।
  • बहु-आयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) — शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण— पर अभी और ध्यान की आवश्यकता है।
  • नीतियों में क्षेत्रीय असमानता व सामाजिक विषमता को कम करने के लिए स्थानीय समाधान जरूरी हैं।
  • सरकार अब “गरीबी से समृद्धि” की दिशा में टिकाऊ आजीविका और कौशल विकास पर बल दे रही है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः हाल की रणनीतियाँ गरीबी घटाने में प्रभावी रही हैं, परंतु स्थायी परिणामों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और सामाजिक सुरक्षा पर निरंतर निवेश आवश्यक है। गरीबी उन्मूलन तभी सफल होगा जब विकास वास्तव में समावेशी और न्यायसंगत बने।

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Assess the role of States and Central Government in developing irrigation infrastructure in India. How has Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana (P.M.K.S.Y.) helped in improving irrigation access across the country? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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भारत में सिंचाई के बुनियादी ढाँचे के विकास में राज्यों और केन्द्र सरकार की भूमिका का आकलन करें । प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पी. एम. के. एस. वाई.) देश भर में सिंचाई की पहुँच को बेहतर बनाने में कैसे मदद की है ?

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारत मुख्यतः कृषि प्रधान देश है, जहाँ सिंचाई (Irrigation) कृषि उत्पादन की रीढ़ मानी जाती है। सिंचाई के बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) के विकास में केन्द्र और राज्य सरकार दोनों की भूमिकाएँ परस्पर पूरक हैं। इन दोनों के समन्वय से ही जल संसाधनों का न्यायपूर्ण एवं कुशल उपयोग संभव है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • जल संसाधन एक राज्य विषय (State Subject) है, परन्तु बड़े और अन्तरराज्यीय परियोजनाओं के लिए केन्द्र की भूमिका निर्णायक होती है।
  • केन्द्र सरकार जल नीति, वित्तीय सहायता और तकनीकी सहयोग प्रदान करती है।
  • राज्य सरकारें सिंचाई परियोजनाओं का क्रियान्वयन, रखरखाव और जल वितरण करती हैं।
  • केन्द्रीय जल आयोग (CWC) और जल शक्ति मंत्रालय नीतिगत दिशा और समन्वय सुनिश्चित करते हैं।
  • बड़ी बहुउद्देशीय परियोजनाएँ जैसे – भाखड़ा-नांगल, सरदार सरोवर, और टिहरी बाँध – केन्द्र-राज्य साझेदारी के उदाहरण हैं।
  • लघु सिंचाई योजनाएँ (Minor Irrigation Projects) जैसे ट्यूबवेल, तालाब, चेक डैम आदि राज्यों के अधीन हैं।
  • वित्त आयोगों द्वारा राज्यों को जल संसाधन विकास हेतु अनुदान दिया जाता है।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) 2015 में शुरू की गई, जिसका उद्देश्य “हर खेत को पानी” पहुँचाना है।
  • यह योजना चार घटकों पर आधारित है – परंपरागत जल स्रोतों का पुनरुद्धार, सूक्ष्म सिंचाई (Drip/Sprinkler) को बढ़ावा, जल संरक्षण और खेत-स्तरीय सिंचाई विस्तार।
  • योजना से जल उपयोग दक्षता में सुधार, सूखा प्रभावित क्षेत्रों में उत्पादकता वृद्धि, और किसानों की आय में वृद्धि हुई है।
  • PMKSY के अंतर्गत “पर ड्रॉप मोर क्रॉप” अभियान ने पानी की बचत के साथ फसल उत्पादन को प्रोत्साहन दिया।
  • केन्द्र–राज्य साझा वित्तपोषण (60:40) ने योजना को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पहुँच दिलाई।

निष्कर्ष (Conclusion) –

स्पष्ट है कि भारत में सिंचाई अवसंरचना के विकास में केन्द्र और राज्य दोनों की भूमिकाएँ समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ने इस सहयोग को संस्थागत रूप देकर जल प्रबंधन और कृषि विकास में नई ऊर्जा प्रदान की है।

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Budgets are half used if they serve only as planning device”. Critically examine this statement. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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“बजट का आधा उपयोग हो पाता है यदि उन्हें केवल नियोजन के उपकरण के रूप में ही प्रयोग किया जाये |” इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये । “

Ans: भूमिका (Introduction) –

बजट किसी भी सरकार का वार्षिक वित्तीय वक्तव्य है, जो देश की आय और व्यय का अनुमान प्रस्तुत करता है। इसे सामान्यतः नियोजन (Planning) का एक उपकरण माना जाता है, परंतु यदि इसे केवल नियोजन तक सीमित कर दिया जाए, तो इसके व्यापक उद्देश्यों की प्राप्ति अधूरी रह जाती है। यह कथन इसी सीमित दृष्टिकोण की आलोचना प्रस्तुत करता है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • बजट का उद्देश्य केवल योजनाएँ बनाना नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना भी है।
  • नियोजन के स्तर पर बजट मात्र अनुमान प्रस्तुत करता है; वास्तविक सफलता उसके कार्यान्वयन में निहित होती है।
  • यदि बजट को केवल योजनाबद्ध व्यय तक सीमित कर दिया जाए, तो संसाधनों का दुरुपयोग और अपव्यय बढ़ सकता है।
  • सामाजिक न्याय, गरीबी उन्मूलन, रोजगार सृजन जैसे उद्देश्यों की प्राप्ति तभी संभव है जब बजट परिणामोन्मुख (Outcome-oriented) हो।
  • कई बार योजनाओं के लिए निधि आवंटित होती है, परंतु निगरानी तंत्र की कमी से खर्च अधूरा रह जाता है।
  • भारत में कई मंत्रालय अपने आवंटित बजट का पूरा उपयोग नहीं कर पाते, जिससे योजनाओं का प्रभाव घट जाता है।
  • नीति आयोग ने “परिणाम आधारित बजटिंग” (Outcome Budgeting) की संकल्पना इसी समस्या के समाधान हेतु दी है।
  • जनभागीदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही के बिना बजट अपने लक्ष्य से भटक सकता है।
  • प्रभावी ऑडिट, समयबद्ध मूल्यांकन और वित्तीय अनुशासन इसकी उपयोगिता बढ़ाते हैं।
  • बजट को नियोजन के साथ-साथ नीति निर्माण, नियंत्रण और जनकल्याण का माध्यम बनाना आवश्यक है।
  • केवल नियोजन पर केंद्रित बजट “आर्थिक दृष्टि” से अधूरा और “विकास दृष्टि” से कमजोर बन जाता है।
  • इसलिए बजट को एक गतिशील उपकरण के रूप में प्रयोग करना चाहिए, जो लक्ष्य निर्धारण से लेकर परिणाम मूल्यांकन तक सक्रिय भूमिका निभाए।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः यह सत्य है कि यदि बजट को केवल नियोजन का उपकरण माना जाए, तो उसकी उपयोगिता आधी रह जाती है। वास्तविक अर्थों में बजट तभी प्रभावी है, जब वह विकास, पारदर्शिता और जनकल्याण को समान रूप से सुनिश्चित करे।

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Does inclusive growth ensure social justice? Discuss. What steps have been taken by the Government of India for bringing inclusive growth with social justice? Elucidate your answer. [ Marks-12 ] UPPCS Mains 2024 GS-3

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क्या समावेशी विकास, सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करता है ? विवेचना कीजिये । भारत सरकार द्वारा सामाजिक न्याय के साथ समावेशी विकास लाने हेतु क्या कदम उठाये गये हैं ? अपने उत्तर को स्पष्ट कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

समावेशी विकास (Inclusive Development) का अर्थ है ऐसा आर्थिक विकास जिसमें समाज के सभी वर्ग—गरीब, वंचित, महिलाएँ, अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अल्पसंख्यक—समान रूप से सहभागी हों। इसका उद्देश्य केवल GDP वृद्धि नहीं बल्कि समान अवसरों के माध्यम से सामाजिक न्याय (Social Justice) सुनिश्चित करना है। भारत में यह नीति सामाजिक समानता, अवसर की समानता और क्षेत्रीय संतुलन पर आधारित है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • समावेशी विकास सामाजिक न्याय का व्यावहारिक रूप है, जो समाज में असमानताओं को घटाता है।
  • यह विकास के लाभों को सभी वर्गों तक पहुँचाने पर बल देता है।
  • गरीबी उन्मूलन एवं रोजगार सृजन इसकी प्रमुख प्राथमिकताएँ हैं।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आवास में समान पहुँच सामाजिक न्याय की नींव बनती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यक्रमों से क्षेत्रीय असमानता कम होती है।
  • महिला सशक्तिकरण योजनाएँ (जैसे – बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, स्ट्रीट वेंडर योजना) लैंगिक न्याय सुनिश्चित करती हैं।
  • अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण व उद्यमिता योजनाएँ अवसर समानता को बढ़ाती हैं।
  • अल्पसंख्यक मंत्रालय की योजनाएँ (जैसे – नई मंज़िल, नई रोशनी) समावेशी नीति का हिस्सा हैं।
  • मनरेगा (MGNREGA) ग्रामीण रोजगार व सामाजिक सुरक्षा का उदाहरण है।
  • प्रधानमंत्री जन-धन योजना व आधार-DBT प्रणाली आर्थिक समावेशन को सुदृढ़ करती है।
  • शिक्षा का अधिकार व स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ सामाजिक सुरक्षा को व्यापक बनाती हैं।
  • नीति आयोग द्वारा “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” की नीति समावेशी विकास की दिशा को पुष्ट करती है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

स्पष्ट है कि समावेशी विकास, सामाजिक न्याय की प्राप्ति का प्रभावी साधन है। भारत सरकार की नीतियाँ यदि प्रभावी रूप से लागू हों, तो आर्थिक विकास के साथ सामाजिक समानता भी सुनिश्चित की जा सकती है।

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