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Describe the strategies that civil servants can employ to overcome resistance to change and effectively persuade stakeholders to support new policies and initiatives. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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उन रणनीतियों का वर्णन करें जो सिविल सेवक परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध को दूर करने के लिए नियोजित कर सकते हैं और नई नीतियों तथा पहलों का समर्थन करने के लिए हितधारकों को प्रभावी ढंग से राजी कर सकते हैं।

Ans: परिचय:

प्रशासनिक प्रणाली में परिवर्तन (Change) अपरिहार्य होता है, परंतु इसके प्रति प्रतिरोध (Resistance) भी स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। एक सिविल सेवक का दायित्व है कि वह इस प्रतिरोध को संवाद, सहभागिता और विश्वास के माध्यम से दूर करे। सफल प्रशासक वही है जो हितधारकों को नई नीतियों और पहलों के समर्थन के लिए प्रभावी रूप से प्रेरित कर सके।

परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध दूर करने की रणनीतियाँ (Strategies to Overcome Resistance):

  • संचार (Effective Communication): परिवर्तन के उद्देश्य, लाभ और प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से समझाना।
  • उदाहरण: नीति के उद्देश्यों को सरल भाषा और तथ्यात्मक प्रस्तुति में बताना।
  • हितधारकों की सहभागिता (Stakeholder Participation): नीति-निर्माण में प्रभावित समूहों को प्रारंभिक स्तर पर शामिल करना।
  • विश्वास निर्माण (Building Trust): पारदर्शिता और निरंतर संवाद से लोगों का भरोसा जीतना।
  • प्रशिक्षण और क्षमता विकास (Training & Capacity Building): नई नीतियों से जुड़े कर्मचारियों को आवश्यक कौशल प्रदान करना।
  • सफल उदाहरण प्रस्तुत करना (Showcasing Success Stories): अन्य क्षेत्रों में हुए सफल परिवर्तनों के उदाहरण साझा करना।
  • सहानुभूति और संवेदनशीलता (Empathy & Sensitivity): लोगों की चिंताओं को सुनना और उनके दृष्टिकोण को महत्व देना।
  • प्रोत्साहन (Incentives): नई पहल अपनाने वाले कर्मचारियों को पुरस्कार या प्रशंसा देना।
  • क्रमिक कार्यान्वयन (Gradual Implementation): बड़े परिवर्तनों को चरणबद्ध ढंग से लागू करना ताकि झटका कम लगे।
  • सकारात्मक नेतृत्व (Positive Leadership): स्वयं उदाहरण प्रस्तुत कर दूसरों को प्रेरित करना
  • प्रतिक्रिया तंत्र (Feedback Mechanism): हितधारकों से नियमित प्रतिक्रिया लेकर सुधार करते रहना।
  • सामाजिक संवाद (Public Dialogue): मीडिया, संगोष्ठियों और जन-संवाद के माध्यम से नीति का महत्व बताना।
  • नैतिक दृढ़ता (Moral Conviction): सही नीतियों को लागू करने में नैतिक साहस दिखाना, चाहे विरोध क्यों न हो।

निष्कर्ष:

एक सिविल सेवक के लिए परिवर्तन लागू करना केवल प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि नेतृत्व और संवेदनशीलता की परीक्षा है। सहानुभूति, संवाद और पारदर्शिता के माध्यम से ही वह हितधारकों का विश्वास जीतकर सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।

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“Non-performance of duty by a public servant is a type of corruption”. Do you agree with this statement? Explain logically. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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“लोकसेवक के द्वारा कर्तव्य निर्वहन न करना एक प्रकार का भ्रष्टाचार है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्कसंगत व्याख्या कीजिए।

Ans: परिचय:
लोकसेवक समाज और शासन के बीच विश्वास की कड़ी होते हैं। उनका मुख्य दायित्व जनता के हित में नीतियों और सेवाओं का निष्पक्ष व समयबद्ध क्रियान्वयन करना है। जब कोई लोकसेवक अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता, तो यह जनविश्वास का हनन और भ्रष्टाचार का एक रूप बन जाता है।

विवेचना (मुख्य बिंदु):

  1. कर्तव्यपालन का अभाव: लोकसेवक का कर्तव्य जनता की सेवा करना है; उसका निर्वहण न करना सार्वजनिक हित की उपेक्षा है।
  2. निष्क्रियता भी भ्रष्टाचार: केवल रिश्वत लेना ही नहीं, बल्कि कार्य में लापरवाही या टालमटोल भी भ्रष्टाचार का रूप है।
  3. संविधानिक दृष्टिकोण: संविधान लोकसेवकों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है; कर्तव्य न निभाना इस सिद्धांत का उल्लंघन है।
  4. नैतिक दृष्टि से: जब लोकसेवक अपने पद का उपयोग जनता की भलाई की बजाय अपने आराम या स्वार्थ के लिए करता है, तो यह नैतिक पतन है।
  5. प्रशासनिक दक्षता: कर्तव्यपालन में कमी से शासन व्यवस्था की दक्षता घटती है और नागरिकों का भरोसा कम होता है।
  6. उदाहरण: किसी अधिकारी द्वारा जानबूझकर फाइलों को रोकना, शिकायतों का समाधान न करना या गरीबों की उपेक्षा करना – ये भ्रष्ट आचरण हैं।
  7. सामाजिक प्रभाव: ऐसे व्यवहार से जनता में असंतोष, अविश्वास और नकारात्मक छवि बनती है।
  8. कानूनी दृष्टि से: कई सेवाओं के आचार संहिताओं में कर्तव्य न निभाना कदाचार (Misconduct) की श्रेणी में आता है।
  9. नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता: एक सच्चा लोकसेवक अपने कर्तव्यों को सेवा, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के भाव से निभाता है।
  10. सुधार का उपाय: नियमित निगरानी, जवाबदेही तंत्र और नैतिक प्रशिक्षण से इस प्रकार के भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है।

निष्कर्ष :
अतः, कर्तव्य का पालन न करना केवल लापरवाही नहीं बल्कि जनसेवा की भावना का भ्रष्ट रूप है। मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ कि लोकसेवक का कर्तव्य निर्वहण न करना भी भ्रष्टाचार का ही एक प्रकार है।

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Integrity without knowledge is weak and useless, but knowledge without integrity is dangerous and terrible”. What do you understand by this statement? Discuss. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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“ज्ञान के अभाव में सत्यनिष्ठा कमजोर एवं बेकार है लेकिन सत्यनिष्ठा के अभाव में ज्ञान खतरनाक एवं भयानक है”- इस कथन से आप क्या समझते हैं? समझाइये। “

Ans: परिचय:

यह कथन ज्ञान (Knowledge) और सत्यनिष्ठा (Integrity) के परस्पर संबंध को दर्शाता है ज्ञान मनुष्य को शक्ति देता है, जबकि सत्यनिष्ठा उसे उस शक्ति के सदुपयोग की दिशा प्रदान करती है जब ज्ञान और सत्यनिष्ठा दोनों एक साथ हों, तभी व्यक्ति और समाज का विकास संतुलित व नैतिक रूप से संभव है।

विवेचना:

  • ज्ञान का महत्व: ज्ञान व्यक्ति को समझ, विवेक और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।
  • सत्यनिष्ठा का महत्व: सत्यनिष्ठा व्यक्ति को ईमानदार, न्यायप्रिय और जिम्मेदार बनाती है।
  • ज्ञान बिना सत्यनिष्ठा: यदि व्यक्ति के पास ज्ञान तो है पर ईमानदारी नहीं, तो वह ज्ञान विनाश का कारण बन सकता है।
  • उदाहरण: वैज्ञानिक ज्ञान का दुरुपयोग कर हथियार या फेक न्यूज़ तैयार करना।
  • सत्यनिष्ठा बिना ज्ञान: केवल ईमानदार होने से पर्याप्त नहीं, यदि व्यक्ति अज्ञान है तो उसके निर्णय प्रभावी नहीं होंगे।
  • उदाहरण: किसी प्रशासनिक अधिकारी की नीयत अच्छी हो लेकिन नीतियों का ज्ञान न हो, तो उसका कार्य निष्फल रहेगा।
  • दोनों का समन्वय आवश्यक: ज्ञान दिशा देता है और सत्यनिष्ठा उद्देश्य की शुद्धता सुनिश्चित करती है।
  • नैतिक दृष्टि से: ज्ञान का मूल्य तभी है जब उसका उपयोग सार्वजनिक हित में किया जाए।
  • लोक प्रशासन में: एक लोकसेवक को नीति-ज्ञान के साथ सत्यनिष्ठ होना चाहिए ताकि वह निष्पक्ष निर्णय ले सके।
  • दार्शनिक दृष्टिकोण: प्लेटो ने भी कहा कि “ज्ञान के साथ नैतिकता ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।”
  • व्यावहारिक उदाहरण: एक डॉक्टर के पास ज्ञान है, लेकिन सत्यनिष्ठा नहीं, तो वह लालच में मरीज को गलत दवा दे सकता है।
  • संतुलन की आवश्यकता: समाज में प्रगति तभी संभव है जब ज्ञान और नैतिकता दोनों का संयोजन हो।

निष्कर्ष:

इस कथन का सार यह है कि ज्ञान तभी सार्थक है जब वह सत्यनिष्ठा से जुड़ा हो। अतः एक सच्चे नागरिक या लोकसेवक के लिए ज्ञान और सत्यनिष्ठा दोनों का संगम ही वास्तविक नैतिक शक्ति है।

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Now a days social media is used to influence public opinion either in positive or in negative way. Being a civil servant, how will you solve this issue? [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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वर्तमान समय में सोशल मीडिया का उपयोग जनता की राय को सकारात्मक या नकारात्मक तरीके से प्रभावित करने के लिए किया जाता है। एक लोकसेवक होने के नाते आप इस मुद्दे का समाधान कैसे करेंगे?

Ans: परिचय:

वर्तमान डिजिटल युग में सोशल मीडिया जनता की राय बनाने का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन चुका है। यह जहाँ एक ओर सूचना, पारदर्शिता और जन-जागरूकता का सशक्त साधन है, वहीं दूसरी ओर भ्रामक सूचनाओं का स्रोत भी बन गया है। एक लोकसेवक के रूप में इस चुनौती का समाधान संतुलित, पारदर्शी और तथ्यपरक दृष्टिकोण से किया जा सकता है।

समाधान के प्रमुख बिंदु:

  • तथ्य आधारित जानकारी (Fact-based Communication): सभी सरकारी सूचनाएँ और घोषणाएँ सत्यापन योग्य स्रोतों से साझा की जाएँ।
  • जन-जागरूकता अभियान (Awareness Campaigns): जनता को फेक न्यूज़, अफवाहों और गलत सूचनाओं की पहचान करने के लिए शिक्षित करना।
  • पारदर्शिता (Transparency): प्रशासनिक निर्णयों और योजनाओं की स्पष्ट जानकारी जनता को देना, जिससे गलतफहमी न फैले।
  • नियमित संवाद (Regular Interaction): लोकसेवक को सोशल मीडिया पर जनता के साथ सकारात्मक संवाद बनाए रखना चाहिए।
  • मीडिया मॉनिटरिंग (Monitoring): सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली सूचनाओं की सतत निगरानी कर भ्रामक सामग्री का शीघ्र खंडन करना।
  • नैतिक दिशा-निर्देश (Ethical Guidelines): सरकारी कर्मचारियों के लिए सोशल मीडिया आचरण संहिता तैयार कर उसका पालन करवाना।
  • सकारात्मक प्रचार (Positive Use): विकास योजनाओं, उपलब्धियों और जनहित कार्यों को सोशल मीडिया के माध्यम से साझा करना।
  • तकनीकी साक्षरता (Digital Literacy): प्रशासनिक कर्मचारियों को सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग के लिए प्रशिक्षित करना।
  • जन-सहयोग (Public Collaboration): विश्वसनीय नागरिक समूहों, मीडिया और एनजीओ के सहयोग से सही जानकारी का प्रसार।
  • दृढ़ कार्रवाई (Firm Action): गलत सूचना फैलाने वालों पर उचित कानूनी कार्रवाई कर उदाहरण प्रस्तुत करना।

 निष्कर्ष:

एक लोकसेवक का दायित्व है कि वह सोशल मीडिया को सत्य, पारदर्शिता और जनहित के उपकरण के रूप में उपयोग करे। संतुलित दृष्टिकोण और जिम्मेदार संवाद के माध्यम से ही सोशल मीडिया को समाज निर्माण का सशक्त माध्यम बनाया जा सकता है।

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What are the major principles of public life? Discuss with suitable examples. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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लोक जीवन के मुख्य सिद्धान्त क्या हैं? उपयुक्त उदाहरण के साथ समझाइये।

Ans: परिचय:

लोक जीवन से अभिप्राय है – समाज में व्यक्तियों का आपसी व्यवहार, सहयोग, पारस्परिक सम्मान और सामूहिक जीवन की व्यवस्था। यह सामाजिक नैतिकता, परंपराओं और मूल्यों पर आधारित होता है। लोक जीवन के मुख्य सिद्धांत वे आधार हैं जो समाज में सौहार्द, एकता और नैतिक संतुलन बनाए रखते हैं।

 लोक जीवन के मुख्य सिद्धांत (Main Principles of Public Life):

  • सत्य (Truth): प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण और वचन में सत्यनिष्ठ रहना चाहिए।
  • उदाहरण: महात्मा गांधी ने ‘सत्याग्रह’ के माध्यम से सत्य को जीवन का सर्वोच्च मूल्य माना।
  • अहिंसा (Non-Violence): किसी को भी शारीरिक या मानसिक कष्ट न पहुँचाना।
  • उदाहरण: सामाजिक विवादों का शांतिपूर्ण समाधान अहिंसक दृष्टिकोण से किया जाना।
  • न्याय (Justice): समाज में सभी के साथ समान और निष्पक्ष व्यवहार होना चाहिए।
  • उदाहरण: प्रशासनिक निर्णयों में पक्षपात से बचना।
  • समानता (Equality): सभी व्यक्तियों को अवसरों और अधिकारों में समान स्थान मिलना।
  • उदाहरण: जाति, लिंग या धर्म के आधार पर भेदभाव न करना।
  • कर्तव्यनिष्ठा (Sense of Duty): प्रत्येक व्यक्ति को अपने सामाजिक और नैतिक कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
  • उदाहरण: एक शिक्षक का निष्ठा से विद्यार्थियों को शिक्षित करना।
  • सेवा भावना (Spirit of Service): दूसरों की भलाई के लिए निःस्वार्थ भाव से कार्य करना।
  • उदाहरण: आपदा के समय स्वयंसेवकों द्वारा सहायता प्रदान करना।
  • सहयोग और भाईचारा (Cooperation & Brotherhood): समाज में परस्पर सहयोग और सम्मान की भावना होना।
  • उदाहरण: ग्राम पंचायत में सामूहिक निर्णय लेना।
  • सहनशीलता (Tolerance): मतभेदों के बावजूद दूसरों के विचारों का सम्मान करना।
  • उदाहरण: विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के प्रति उदार दृष्टिकोण रखना।
  • ईमानदारी (Integrity): व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में पारदर्शिता और सच्चाई बनाए रखना।
  • उदाहरण: एक लोकसेवक द्वारा रिश्वत न लेना।
  • लोककल्याण (Public Welfare): सभी निर्णयों और कार्यों का उद्देश्य समाज का व्यापक हित होना चाहिए।
  • उदाहरण: नीतियाँ बनाते समय गरीबों और वंचितों का ध्यान रखना।

निष्कर्ष:

लोक जीवन के ये सिद्धांत समाज को नैतिक, न्यायपूर्ण और संवेदनशील बनाते हैं।इनका पालन व्यक्ति और समाज दोनों के सतत विकास एवं नैतिक उन्नति के लिए आवश्यक है।

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Rajeev is an idealist. He believes that, “Service to humanity is service to God”. One day he was going for an interview for government Job. He saw a severely injured person lying on the road who was asking for help. No one came forward to help. Rajeev took the injured person to the hospital and saved his life. But due to this reason, he lost the opportunity to get a government Job. Comment on Rajeev’s decision in the light of above circumstance. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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राजीव एक आदर्शवादी है। उसका विश्वास है कि “मानवता की सेवा ईश्वर की सेवा है।” एक दिन वह सरकारी नौकरी के लिए साक्षात्कार देने जा रहा था। उसने सड़क पर एक व्यक्ति को गम्भीर रूप से घायल अवस्था में पड़े देखा जो सहायता मांग रहा था। कोई सहायता के लिए सामने नहीं आया। राजीव घायल व्यक्ति को अस्पताल ले गया और उसके जीवन की रक्षा की। लेकिन इस कारण उसने सरकारी नौकरी प्राप्त करने के अवसर को खो दिया। उपर्युक्त परिस्थिति के प्रकाश में राजीव के निर्णय पर टिप्पणी कीजिए।

Ans: परिचय:

राजीव की स्थिति नैतिकता और स्वार्थ के बीच के द्वंद्व को दर्शाती है। उसका निर्णय इस विचार पर आधारित था कि “मानवता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।” उसने व्यक्तिगत लाभ की बजाय मानवीय कर्तव्य को प्राथमिकता दी, जो एक सच्चे नैतिक व्यक्ति का लक्षण है।

मुख्य बिंदु:

  • नैतिक दृष्टि से, राजीव का निर्णय पूर्णतः सही है क्योंकि उसने मानवीय करुणा को प्राथमिकता दी।
  • उसने कर्तव्यनिष्ठा (Duty-based Ethics) का पालन किया — जहाँ परिणाम नहीं बल्कि कर्तव्य महत्वपूर्ण होता है।
  • इमानुएल कांट (Immanuel Kant) के नैतिक सिद्धांत के अनुसार, नैतिक कर्म वही है जो कर्तव्य के भाव से किया जाए, न कि स्वार्थवश।
  • राजीव ने मानवता के सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत — “दूसरे की पीड़ा में सहायता करना” — का पालन किया।
  • उसका निर्णय उपकार, सहानुभूति और निःस्वार्थता पर आधारित था।
  • भले ही उसने नौकरी का अवसर खो दिया, लेकिन उसने नैतिक सफलता प्राप्त की।
  • समाज के लिए ऐसे उदाहरण प्रेरणादायी होते हैं और नैतिक चेतना को प्रोत्साहित करते हैं।
  • प्रशासनिक दृष्टि से भी ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता होती है जिनमें करुणा और मानवीय संवेदना हो।
  • उसका कार्य “सामाजिक उत्तरदायित्व” और “नैतिक साहस” का परिचायक है।
  • यह उदाहरण बताता है कि सच्चे मूल्य भौतिक सफलता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

 निष्कर्ष:

राजीव ने कठिन परिस्थिति में भी नैतिकता को सर्वोच्च रखा, जो उसके चरित्र की महानता दर्शाता है। उसका निर्णय भले ही उसे नौकरी से वंचित कर गया, पर उसने मानवता की रक्षा कर एक सच्चे आदर्शवादी की पहचान बनाई।

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What is meant by Human Action in Ethics? Discuss the determinants and consequences of ethics in Human Action. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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नीतिशास्त्र में मानवकर्म से क्या तात्पर्य है? मानवकर्म में नैतिकता के निर्धारक और परिणाम की विवेचना कीजिए।

Ans: परिचय:

नीतिशास्त्र में मानवकर्म से तात्पर्य है मनुष्य द्वारा इच्छा, बुद्धि और विवेक के साथ किए गए कार्य। यह केवल बाह्य क्रिया नहीं बल्कि उसके पीछे की भावना, उद्देश्य और परिणाम से भी जुड़ा होता है। मानवकर्म की नैतिकता का मूल्यांकन उसके निर्धारकों और परिणामों के आधार पर किया जाता है।

मानवकर्म के नैतिक निर्धारक (Determinants of Morality):

  • उद्देश्य (Intention): किसी कार्य की नैतिकता उसके पीछे की नीयत पर निर्भर करती है।
  • प्रेरणा (Motive): निःस्वार्थ प्रेरणा नैतिक मानी जाती है, स्वार्थपरक प्रेरणा अनैतिक।
  • कार्य का स्वरूप (Nature of Act): कार्य स्वयं में सद्गुणी या दुर्गुणी है, यह आवश्यक निर्धारक है।
  • परिस्थिति (Circumstances): समय, स्थान और परिस्थिति नैतिक निर्णय को प्रभावित करती हैं।
  • माध्यम (Means): “साध्य शुद्ध तभी जब साधन शुद्ध हों” – यह गांधीजी का सिद्धांत है।
  • विवेक (Conscience): विवेकशीलता और आत्मनियंत्रण नैतिक कर्म का मूल आधार हैं।

मानवकर्म के नैतिक परिणाम (Consequences):

  • आत्मसंतोष (Inner Peace): नैतिक कर्म से मन में शांति और संतोष की अनुभूति होती है।
  • सामाजिक समरसता (Social Harmony): नैतिक कर्म समाज में सहयोग और एकता बढ़ाते हैं।
  • आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth): नैतिकता व्यक्ति को उच्च मूल्यों की ओर अग्रसर करती है।
  • पश्चाताप (Remorse): अनैतिक कर्म अपराधबोध और असंतोष को जन्म देते हैं।
  • सामाजिक मूल्यांकन (Social Judgement): समाज व्यक्ति के कर्मों को नैतिक दृष्टि से परखता है।
  • कर्मफल (Moral Result): हर कर्म का फल व्यक्ति को नैतिक रूप से भुगतना पड़ता है।

निष्कर्ष: अतः मानवकर्म का मूल्य केवल क्रिया से नहीं बल्कि उसके उद्देश्य, साधन और परिणाम से तय होता है। जब मनुष्य विवेक और निःस्वार्थता से कर्म करता है, तब वही कर्म सच्चे अर्थों में नैतिक कहलाता है।

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Can Bhagavadgita be an ethical guide for civil servants? Comment. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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क्या भगवद्गीता लोकसेवकों की नैतिक मार्गदर्शिका हो सकती है? टिप्पणी कीजिए।

Ans: परिचय:

भगवद्गीता भारतीय दर्शन की अमूल्य कृति है जो जीवन, कर्तव्य और नैतिकता का गहन मार्गदर्शन प्रदान करती है।इसमें कर्मयोग, निःस्वार्थ सेवा, समभाव और कर्तव्यनिष्ठा जैसे  सिद्धांत निहित हैं। ये सभी गुण एक लोकसेवक के नैतिक आचरण की आधारशिला बन सकते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • भगवद्गीता कर्तव्य पालन को सर्वोपरि मानती है — “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
  • लोकसेवक को परिणाम की चिंता किए बिना निष्पक्षता से कार्य करना चाहिए।
  • यह निष्काम कर्मयोग (Selfless Action) की भावना सिखाती है।
  • निर्णय लेते समय समभाव और विवेकपूर्ण दृष्टि बनाए रखना आवश्यक है।
  • गीता में वर्णित स्वधर्म पालन लोकसेवक की निष्ठा को सुदृढ़ करता है।
  • यह क्रोध, लोभ और मोह जैसे दोषों से बचने की प्रेरणा देती है।
  • गीता का संयम और आत्मानुशासन प्रशासनिक दक्षता बढ़ाता है।
  • कठिन परिस्थितियों में धैर्य और संतुलन बनाए रखने का संदेश देती है।
  • लोकसेवक को जनकल्याण को सर्वोच्च लक्ष्य मानना चाहिए।
  • गीता का सत्य और धर्म पर जोर शासन में पारदर्शिता लाता है।
  • यह नेतृत्व और टीम भावना को भी प्रोत्साहित करती है।
  • उदाहरणतः, आधुनिक सिविल सेवक “कर्मयोगी” बनकर निष्ठा और सेवा का आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं।

निष्कर्ष:

अतः भगवद्गीता लोकसेवकों के लिए एक सशक्त नैतिक मार्गदर्शिका सिद्ध हो सकती है। इसकी शिक्षाएँ प्रशासन को आध्यात्मिक संतुलन, निष्पक्षता और जनसेवा की दिशा में प्रेरित करती हैं।

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While formulating public policies a civil servant must safely focus on the public welfare and while implementing those policies he must have a foresight to infer possible unexpected consequences”. Do you agree with this statement? Give arguments and justifications for your answer. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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“सार्वजनिक नीतियां बनाते समय एक सिविल सेवक को केवल जनता की भलाई पर ध्यान देना चाहिए और उन नीतियों को लागू करते समय उसमें संभावित अनपेक्षित परिणामों का अनुमान लगाने की दूरदर्शिता होनी चाहिए।” – क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के लिए युक्ति तथा प्रमाण प्रस्तुत कीजिए।

Ans: परिचय:

सिविल सेवक शासन व्यवस्था का नैतिक स्तंभ होता है, जिसका मुख्य उद्देश्य जनता की भलाई सुनिश्चित करना है। नीतियों का निर्माण केवल वर्तमान लाभ के लिए नहीं बल्कि दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। इसलिए नीति-निर्माण में दूरदर्शिता और जनहित दोनों का संतुलन आवश्यक है।

मुख्य बिंदु:

  • मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ क्योंकि नीति का मूल उद्देश्य लोककल्याण होता है।
  • सिविल सेवक को व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर कार्य करना चाहिए।
  • नीति बनाते समय सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर विचार आवश्यक है।
  • दूरदर्शिता (Foresight) नीति की सफलता का प्रमुख तत्व है।
  • नीतियों के अनपेक्षित परिणामों (Unintended Consequences) की पूर्वानुमान से प्रशासनिक विफलता रोकी जा सकती है।
  • उदाहरण: कृषि में हरित क्रांति से उत्पादन बढ़ा, परंतु पर्यावरणीय क्षति भी हुई—दूरदर्शिता का अभाव स्पष्ट हुआ।
  • सिविल सेवक को Evidence-based Policy Making अपनानी चाहिए।
  • नीति लागू करने से पूर्व Impact Assessment आवश्यक है।
  • जनसहभागिता से नीति अधिक यथार्थवादी बनती है।
  • नैतिक उत्तरदायित्व नीति-निर्माण को मानवीय दृष्टिकोण देता है।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही नीति के प्रति जनविश्वास बढ़ाती है।
  • नीति-निर्माण में संवेदनशीलता और विवेक का संतुलन आवश्यक है।

निष्कर्ष:

इस प्रकार, सिविल सेवक का कर्तव्य केवल नीति बनाना नहीं, बल्कि उसके दूरगामी प्रभावों का पूर्वानुमान लगाना भी है। जनहित और दूरदर्शिता के संतुलन से ही सुशासन और सतत विकास संभव है।

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What do you understand by Ethical Governance? Elucidate with example. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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नैतिक शासन व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

Ans: परिचय:

नैतिक शासन व्यवस्था (Ethical Governance) का अर्थ ऐसी प्रशासनिक प्रणाली से है जो न्याय, पारदर्शिता, जवाबदेही और लोककल्याण पर आधारित हो। यह केवल नियमों का पालन नहीं बल्कि नैतिक मूल्यों का आचरण भी सुनिश्चित करती है। ऐसी शासन व्यवस्था नागरिकों के विश्वास और सुशासन की नींव रखती है।

मुख्य बिंदु:

  • नैतिक शासन में ईमानदारी (Integrity) और निष्पक्षता (Impartiality) प्रमुख आधार होते हैं।
  • यह निर्णय-प्रक्रिया को पारदर्शी और उत्तरदायी बनाता है।
  • सत्ता का उपयोग सार्वजनिक हित में किया जाता है, न कि निजी लाभ हेतु।
  • नैतिकता नीति-निर्माण को मानव-केंद्रित बनाती है।
  • इसमें संवेदनशीलता (Sensitivity) और करुणा (Compassion) का समावेश होता है।
  • लोकसेवक अपने कर्तव्यों का पालन नैतिक मूल्यों के अनुरूप करते हैं।
  • यह भ्रष्टाचार, पक्षपात और दुरुपयोग को रोकने में सहायक है।
  • जनता की भागीदारी और विश्वास बढ़ाता है।
  • समाज में समानता (Equality) और न्याय (Justice) को बढ़ावा देता है।
  • तकनीकी पारदर्शिता जैसे ई-गवर्नेंस के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
  • उदाहरण: भारत में “लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम” नैतिक शासन की दिशा में एक कदम है।
  • महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तुत “रामराज्य” की परिकल्पना भी नैतिक शासन का आदर्श उदाहरण है।

निष्कर्ष:

नैतिक शासन व्यवस्था वह तंत्र है जो सत्ता को सेवा में परिवर्तित करता है। ऐसी व्यवस्था से न केवल प्रशासनिक दक्षता बढ़ती है, बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होता है।

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