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“An environmental movement led by youth’s gain popularity through social media, rallies and collaboration with influences and scientists with time the movement gained public support and let the government to propose changes in the policy.” What will be your stand to cope with the situation as a civil servant? (Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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“युवाओं द्वारा संचालित एक पर्यावरणीय आंदोलन सोशल मीडिया, रैलियों और प्रभावकारी व्यक्तियों और वैज्ञानिकों के साथ सहयोग के माध्यम से लोकप्रियता प्राप्त करता है। समय के साथ इस आंदोलन ने सार्वजनिक समर्थन प्राप्त किया और सरकार को नीति में बदलाव का प्रस्ताव देने के लिए प्रेरित किया।” एक सिविल सेवक के रूप में इस स्थिति से निपटने के लिए आप का क्या रुख होगा?

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

युवाओं द्वारा संचालित पर्यावरणीय आंदोलन सामाजिक जागरूकता और लोकतांत्रिक भागीदारी का सशक्त उदाहरण है। एक सिविल सेवक के रूप में मेरा दायित्व होगा कि मैं इस आंदोलन को संवेदनशील, संवादात्मक और नीति-उन्मुख दृष्टिकोण से देखूँ। ऐसे आंदोलनों में प्रशासन को संतुलन रखना होता है—जनहित और नीतिगत व्यवहार्यता दोनों के बीच।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. संवाद स्थापित करना: आंदोलन के नेताओं से सकारात्मक बातचीत शुरू करना ताकि उनकी मांगें स्पष्ट रूप से समझी जा सकें।

2. तथ्यों का अध्ययन: आंदोलन से जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों, रिपोर्टों और विशेषज्ञ मतों का निष्पक्ष विश्लेषण करना।

3. पारदर्शिता: जनता को यह बताना कि सरकार पर्यावरणीय मुद्दों पर क्या कदम उठा रही है।

4. नीति समीक्षा: संबंधित विभागों के साथ मिलकर नीतियों का मूल्यांकन कर आवश्यक संशोधन का प्रस्ताव देना।

5. युवा सहभागिता: आंदोलन के प्रतिनिधियों को नीति-निर्माण प्रक्रिया में परामर्शदाता के रूप में शामिल करना।

6. संतुलित दृष्टिकोण: पर्यावरणीय संरक्षण और विकास की आवश्यकताओं के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाना।

7. वैज्ञानिक सहयोग: पर्यावरण वैज्ञानिकों और अनुसंधान संस्थानों की राय को निर्णय प्रक्रिया में सम्मिलित करना।

8. सोशल मीडिया प्रबंधन: सकारात्मक सूचना साझा कर अफवाहों और गलत सूचनाओं को रोकना।

9. कानून व्यवस्था बनाए रखना: रैलियों या प्रदर्शनों के दौरान शांति और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना।

10. जन-जागरूकता कार्यक्रम: नागरिकों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति दीर्घकालिक जागरूकता बढ़ाने हेतु अभियान चलाना।

11. सफलता का मूल्यांकन: आंदोलन के प्रभाव से लागू नीतियों की समीक्षा कर परिणामों का आकलन करना।

12. नैतिक दृष्टिकोण: जनभावनाओं का सम्मान करते हुए निष्पक्षता और उत्तरदायित्व का पालन करना।

निष्कर्ष (Conclusion):

एक सिविल सेवक के रूप में मेरा उद्देश्य होगा कि युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक नीति-परिवर्तन में परिवर्तित किया जाए। संवाद, पारदर्शिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर ही प्रशासन पर्यावरण संरक्षण और जनसंतोष दोनों सुनिश्चित कर सकता है।

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“A person’s real behaviour was be contrary to the person’s attitude towards specific subject.” Do you agree with this statement? Answer with suitable argument.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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“एक व्यक्ति का वास्तविक व्यवहार व्यक्ति की विश्वास विषय के प्रति अभिव्यक्ति का विरुद्ध हो सकता है।” क्या आप इस कथन से सहमत है? उपयुक्त तर्कों सहित उत्तर दीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

मानव व्यवहार (Human Behaviour) सदैव उसकी आंतरिक मान्यताओं या विश्वासों (Beliefs) का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब नहीं होता। अक्सर व्यक्ति जो सोचता है, वही व्यवहार में प्रदर्शित नहीं करता—इसे “अभिवृत्ति और व्यवहार के अंतर (Attitude-Behaviour Gap)” कहा जाता है। इस अंतर के कई सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य कारण होते हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. सामाजिक दबाव (Social Pressure): व्यक्ति अपने वास्तविक विचारों के विपरीत व्यवहार करता है ताकि समाज में स्वीकृति बनी रहे।

2. परिस्थितिजन्य बाध्यता: कभी-कभी परिस्थिति या पद की सीमाएँ व्यक्ति को अपने विश्वास से अलग कार्य करने पर मजबूर करती हैं।

3. व्यक्तिगत लाभ: स्वार्थ या लाभ की भावना व्यक्ति को नैतिक मान्यताओं के विरुद्ध जाने को प्रेरित कर सकती है।

4. भय और असुरक्षा: सज़ा, आलोचना या अस्वीकृति के डर से व्यक्ति अपने विश्वासों को छिपा सकता है।

5. संगठनात्मक संस्कृति: किसी संस्था का वातावरण व्यक्ति के नैतिक आचरण को प्रभावित करता है।

6. नैतिक द्वंद्व (Moral Dilemma): जब दो नैतिक मूल्यों में टकराव हो, तो व्यवहार विश्वास से भिन्न हो सकता है।

7. आत्म-नियंत्रण की कमी: कभी-कभी व्यक्ति सही विश्वास रखता है, पर भावनाओं पर नियंत्रण न होने से गलत व्यवहार कर बैठता है।

8. अवसरवादिता (Opportunism): अवसर मिलने पर व्यक्ति सिद्धांतों से समझौता कर सकता है।

9. आदर्श और व्यवहार का अंतर: विचारों में व्यक्ति आदर्शवादी होता है, पर व्यवहार में व्यावहारिकता अपनाता है।

10. भूमिका-संघर्ष: विभिन्न सामाजिक भूमिकाओं (जैसे अधिकारी, पिता, मित्र) में व्यक्ति अलग-अलग व्यवहार करता है।

11. शिक्षा और आत्ममंथन की कमी: नैतिक शिक्षा की कमी से विश्वास और व्यवहार में दूरी बढ़ती है।

12. उदाहरण: कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार को गलत मानता है, पर रिश्वत देकर काम करवाने को “व्यवहारिकता” समझता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः यह कथन सही है कि व्यक्ति का व्यवहार उसके विश्वासों से भिन्न हो सकता है।  इस अंतर को कम करने के लिए नैतिक शिक्षा, आत्म-जागरूकता और मूल्य-आधारित सामाजिक वातावरण की आवश्यकता है।

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What are the key difference between ethics in private relations (family, friendships) and public relations (business, politics)? Explain.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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निजी संबंधों (परिवार, मित्रता) और सार्वजनिक संबंधों (व्यापार, राजनीति) में नैतिकता के बीच मुख्य अंतर क्या है? समझाइए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

नैतिकता (Ethics) हमारे व्यवहार को सही और गलत के मानदंडों से परखने का आधार प्रदान करती है। यह जीवन के हर क्षेत्र—निजी (Private) और सार्वजनिक (Public)—में समान रूप से आवश्यक है। फिर भी, दोनों क्षेत्रों की प्रकृति और दायित्व अलग होने के कारण उनकी नैतिकता में अंतर पाया जाता है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. संबंधों का आधार:

निजी संबंध भावनाओं, स्नेह और विश्वास पर आधारित होते हैं, जबकि सार्वजनिक संबंध कर्तव्य, नियम और निष्पक्षता पर टिका होता है।

2. उद्देश्य:

निजी संबंधों में व्यक्तिगत सुख-संतोष लक्ष्य होता है, जबकि सार्वजनिक संबंधों का उद्देश्य सामाजिक या सामूहिक कल्याण होता है।

3. जवाबदेही (Accountability):

परिवार या मित्रता में जवाबदेही व्यक्तिगत होती है, जबकि सार्वजनिक जीवन में यह जनता और कानून के प्रति होती है।

4. निर्णय-प्रक्रिया:

निजी जीवन में निर्णय भावनात्मक होते हैं, जबकि सार्वजनिक जीवन में निर्णय तार्किक और नीति-आधारित होते हैं।

5. नैतिक मानदंड:

निजी नैतिकता में करुणा, प्रेम और निष्ठा प्रमुख हैं; सार्वजनिक नैतिकता में सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और पारदर्शिता प्रमुख हैं।

6. गोपनीयता:

निजी संबंधों में गोपनीयता स्वीकार्य है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में पारदर्शिता आवश्यक है।

7. हितों का टकराव:

निजी संबंधों में पक्षपात स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक संबंधों में यह भ्रष्टाचार का रूप ले सकता है।

8. परिणाम का प्रभाव:

निजी नैतिकता का प्रभाव सीमित दायरे में रहता है, जबकि सार्वजनिक नैतिकता का असर व्यापक समाज पर पड़ता है।

9. मूल्य-निर्देशन:

निजी क्षेत्र में नैतिकता व्यक्तिगत मूल्यों से निर्देशित होती है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में संस्थागत नियमों से।

10. समय और परिस्थिति:

निजी नैतिकता लचीली होती है, जबकि सार्वजनिक नैतिकता अधिक स्थिर और औपचारिक।

11. दायित्व की प्रकृति:

निजी संबंध स्वैच्छिक होते हैं, जबकि सार्वजनिक संबंध संवैधानिक या कानूनी दायित्वों पर आधारित होते हैं।

12. नैतिक संघर्ष:

कई बार निजी स्नेह और सार्वजनिक कर्तव्य में टकराव होता है, जहाँ प्रशासक को सार्वजनिक नैतिकता को प्राथमिकता देनी चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion):

निजी और सार्वजनिक नैतिकता दोनों मानव जीवन के पूरक हैं, परंतु शासन और प्रशासन में सार्वजनिक नैतिकता सर्वोपरि है। जब व्यक्ति दोनों में संतुलन बनाए रखता है, तभी वह सच्चे अर्थों में नैतिक जीवन जी सकता है।

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As an administrator, develop an intervention programme for attitude change in “corruption free India”.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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एक प्रशासक के रूप में “भ्रष्टाचार मुक्त भारत” के संवर्धन में अभिवृत्ति परिवर्तन है, अंतरावेशी कार्यक्रम विकसित कीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि लोगों की अभिवृत्तियों (attitudes) में सकारात्मक परिवर्तन से संभव है।एक प्रशासक के रूप में यह आवश्यक है कि प्रशासनिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर नैतिक जागरूकता विकसित की जाए।इसके लिए एक अंतराकोशी (Interventional) कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है जो व्यवहार, सोच और मूल्यों में बदलाव लाए।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. नैतिक शिक्षा अभियान: विद्यालयों, महाविद्यालयों और प्रशिक्षण संस्थानों में नैतिकता और ईमानदारी पर सत्र आयोजित करना।

2. लोक सेवकों का प्रशिक्षण: अधिकारियों व कर्मचारियों को “Integrity and Ethics” पर नियमित प्रशिक्षण देना।

3. पारदर्शिता बढ़ाना: ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन सेवाओं को बढ़ावा देकर मानव संपर्क आधारित भ्रष्टाचार को कम करना।

4. जन-जागरूकता कार्यक्रम: नारे, पोस्टर, सोशल मीडिया अभियान के माध्यम से नागरिकों में ईमानदारी की भावना जागृत करना।

5. प्रोत्साहन तंत्र: ईमानदार अधिकारियों और नागरिकों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करना।

6. शिकायत निवारण तंत्र: स्वतंत्र और पारदर्शी “जन-सुनवाई” प्रणाली लागू करना।

7. नैतिक क्लब (Ethics Clubs): स्कूलों व कॉलेजों में नैतिक क्लब स्थापित कर युवाओं को भ्रष्टाचार विरोधी संदेश देना।

8. नागरिक सहभागिता: समाज के विभिन्न समूहों—NGOs, RWA, मीडिया—को भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों से जोड़ना।

9. मूल्याधारित नेतृत्व: उच्च अधिकारियों को नैतिक उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करना।

10. समाजिक अनुशासन: भ्रष्ट आचरण के प्रति समाज में अस्वीकार्यता (Zero Tolerance) का वातावरण बनाना।

11. मीडिया निगरानी: स्वतंत्र मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भ्रष्टाचार उजागर करने में सहयोगी बनाना।

12. सतत मूल्यांकन: अभियान की प्रभावशीलता मापने के लिए समय-समय पर निगरानी और सुधार करना।

निष्कर्ष (Conclusion):

भ्रष्टाचार मुक्त भारत की दिशा में सबसे प्रभावी उपाय नागरिकों और प्रशासकों की सोच में नैतिक परिवर्तन है। जब अभिवृत्ति, व्यवहार और प्रशासनिक संस्कृति ईमानदारी से जुड़ेंगी, तभी सच्चा सुशासन साकार होगा।

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Critically evaluate the role of society in shaping and internationalizing political attitudes.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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राजनीतिक अभिवृत्तियों को आकार देने और अंतर्राष्ट्रीयकरण में समाज की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

राजनीतिक अभिवृत्तियाँ (Political Attitudes) किसी व्यक्ति या समाज की राजनीतिक व्यवस्था, नीतियों और नेतृत्व के प्रति सोच को दर्शाती हैं। इन अभिवृत्तियों के निर्माण में समाज की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि समाज ही व्यक्ति के मूल्य, दृष्टिकोण और व्यवहार को गढ़ता है। आज के वैश्वीकरण (Globalization) युग में इन राजनीतिक अभिवृत्तियों का अंतर्राष्ट्रीयकरण भी तेजी से बढ़ा है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • सामाजिक संस्थाएँ: परिवार, विद्यालय और समुदाय व्यक्ति की प्रारंभिक राजनीतिक सोच को आकार देते हैं।
  • मीडिया की भूमिका: सोशल मीडिया और समाचार माध्यम राजनीतिक दृष्टिकोण को वैश्विक स्तर पर प्रभावित करते हैं।
  • शिक्षा का प्रभाव: शिक्षित समाज अधिक तार्किक और लोकतांत्रिक राजनीतिक सोच अपनाता है।
  • आर्थिक स्थिति: आर्थिक वर्गों के भेद राजनीतिक प्राथमिकताओं को निर्धारित करते हैं।
  • धर्म और संस्कृति: सामाजिक परंपराएँ और धार्मिक मान्यताएँ राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रभावित करती हैं।
  • युवा शक्ति: आधुनिक समाज में युवा वर्ग नई राजनीतिक विचारधाराओं का वाहक बन रहा है।
  • वैश्वीकरण का प्रभाव: अंतरराष्ट्रीय मीडिया, प्रवासन और इंटरनेट राजनीतिक विचारों का वैश्विक आदान-प्रदान संभव बना रहे हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ: संयुक्त राष्ट्र (UN), IMF, WTO जैसी संस्थाएँ नीतिगत सोच को अंतरराष्ट्रीय दिशा देती हैं।
  • लोकतांत्रिक मूल्य: मानवाधिकार, समानता, और स्वतंत्रता जैसे मूल्य अब विश्वव्यापी राजनीतिक अभिवृत्ति का हिस्सा बन गए हैं।
  • राजनीतिक आंदोलनों का प्रसार: अरब स्प्रिंग या #MeToo जैसे आंदोलन वैश्विक राजनीतिक चेतना के उदाहरण हैं।
  • आलोचनात्मक पक्ष: वैश्वीकरण से स्थानीय मुद्दों और सांस्कृतिक पहचान का ह्रास भी देखा जा रहा है।
  • संतुलन की आवश्यकता: राष्ट्रीय हितों और वैश्विक मूल्यों में संतुलन बनाना आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

समाज राजनीतिक अभिवृत्तियों का मूल स्रोत है और वैश्वीकरण ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया है। यदि यह प्रक्रिया नैतिकता और जनहित पर आधारित रहे, तो विश्व राजनीति अधिक मानवीय और सहयोगी बन सकती है।

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You are a city commissioner. There is a reputed college in your city, which has the maximum number of girl students. The conditions of the toilets/washrooms in this college is very poor and pathetic due to which the girl students have to face many mental, physical and hygiene relate problems every day. The college administration is not paying any attention to these basic facilities of the girl students. As a city commissioner, what steps will you take to improve this basic facility of the girl students and against the indifference of the college administration? (Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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आप एक नगर आयुक्त हैं। आप के नगर में एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय स्थित है, जिसमें छात्राओं की संख्या काफी अधिक है। इस महाविद्यालय में शौचालय/प्रसाधन की स्थिति अत्यन्त दयनीय है, जिससे आये दिन छात्राओं को मानसिक, शारीरिक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। महाविद्यालय प्रशासन छात्राओं की इस बुनियादी सुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। एक नगर आयुक्त के रूप में आप छात्राओं को इस बुनियादी सुविधाओं के सुधार के लिए महाविद्यालय प्रशासन की उदासीनता के विरुद्ध क्या कदम उठायेंगे? (12)

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

एक नगर आयुक्त के रूप में मेरी प्राथमिक जिम्मेदारी नगर के नागरिकों, विशेषकर छात्राओं, को सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण प्रदान करना है। महाविद्यालयों में स्वच्छ शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएँ न केवल स्वास्थ्य बल्कि गरिमा और समानता से भी जुड़ी हैं। ऐसी स्थिति में प्रशासन की निष्क्रियता के विरुद्ध नैतिक, कानूनी और मानवीय दृष्टि से ठोस कदम आवश्यक हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • स्थिति का मूल्यांकन: सर्वप्रथम महाविद्यालय परिसर का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट तैयार करूँगा।
  • नोटिस जारी करना: महाविद्यालय प्रशासन को तत्काल सुधार हेतु औपचारिक नोटिस भेजा जाएगा।
  • समय-सीमा निर्धारण: स्वच्छता और शौचालय निर्माण/मरम्मत के लिए निश्चित समय सीमा तय की जाएगी।
  • जनस्वास्थ्य अधिनियम के तहत कार्यवाही: यदि सुधार नहीं होता, तो नगर निगम अधिनियम या जनस्वास्थ्य कानूनों के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
  • छात्राओं की शिकायत निवारण समिति: छात्राओं की समस्याएँ सीधे सुनने के लिए शिकायत प्रकोष्ठ बनाया जाएगा।
  • स्वच्छता निरीक्षण दल: नियमित अंतराल पर निरीक्षण हेतु विशेष दल गठित किया जाएगा।
  • स्वच्छता मिशन से सहयोग: ‘स्वच्छ भारत मिशन’ या CSR फंडिंग के माध्यम से वित्तीय सहयोग लिया जा सकता है।
  • जन-जागरूकता अभियान: छात्राओं में स्वच्छता, स्वास्थ्य और अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु अभियान चलाया जाएगा।
  • मीडिया पारदर्शिता: समस्या और उठाए गए कदमों की जानकारी स्थानीय मीडिया में साझा की जाएगी ताकि जवाबदेही बनी रहे।
  • स्थानीय जनप्रतिनिधियों से समन्वय: पार्षद या विधायक से समन्वय कर प्रशासनिक सहयोग प्राप्त किया जाएगा।
  • दीर्घकालिक योजना: भविष्य में नगर के सभी शैक्षणिक संस्थानों में स्वच्छता ऑडिट को अनिवार्य बनाया जाएगा।
  • नैतिक जिम्मेदारी: एक लोकसेवक के रूप में छात्राओं की गरिमा और स्वास्थ्य की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

निष्कर्ष (Conclusion):

नगर आयुक्त के रूप में मेरा उद्देश्य केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन के माध्यम से जनकल्याण सुनिश्चित करना है। स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय उपलब्ध कराना छात्राओं के अधिकार और गरिमा दोनों की रक्षा का प्रतीक है।

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In the process of policy making by public administrators whether the priority should be given to the moral transparency or the effectiveness of consequences/results? Elucidate. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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लोक प्रशासकों द्वारा नीति-निर्माण की प्रक्रिया में वांछित सामाजिक-नैतिक लक्षणों की प्राप्ति हेतु, क्या साधनों की नैतिक पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए अथवा परिणामों की प्रभावशीलता को? समझाइये।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

लोक प्रशासक नीति-निर्माण में ऐसे निर्णय लेते हैं जो समाज के जीवन-मूल्यों को प्रभावित करते हैं। इन निर्णयों में नैतिक पारदर्शिता और परिणामों की प्रभावशीलता दोनों का संतुलन आवश्यक है। यह प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि साधन और परिणाम दोनों ही शासन की नैतिकता को परिभाषित करते हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points – 12 bullet points):

  • साधनों की नैतिकता (Ethical Means): नीति-निर्माण में अपनाए गए साधन पारदर्शी, न्यायसंगत और सत्यनिष्ठ होने चाहिए।
  • परिणामों की प्रभावशीलता (Effectiveness of Outcomes): नीतियों के परिणाम व्यावहारिक, जनोन्मुखी और समाजहितकारी हों।
  • गांधीजी का दृष्टिकोण: उन्होंने कहा – “असत्य साधनों से सत्य उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता।”
  • नैतिक पारदर्शिता का महत्व: यह नीति-निर्माताओं की विश्वसनीयता और सार्वजनिक विश्वास को सुदृढ़ करती है।
  • परिणाम-आधारित दृष्टिकोण: आधुनिक प्रशासन में परिणामों की गुणवत्ता और मापन पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
  • संतुलन की आवश्यकता: केवल साधनों पर या केवल परिणामों पर ध्यान देना नैतिक असंतुलन पैदा कर सकता है।
  • उद्देश्य और साधन की एकता: जब नीति-निर्माण में दोनों एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, तभी नैतिकता और दक्षता दोनों सुनिश्चित होती हैं।
  • लोकहित सर्वोपरि सिद्धांत: नीति चाहे कोई भी हो, उसका अंतिम उद्देश्य जनकल्याण होना चाहिए।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही: नीति प्रक्रिया खुली और उत्तरदायी होनी चाहिए ताकि भ्रष्टाचार व पक्षपात न बढ़े।
  • मानवीय दृष्टिकोण: नीति बनाते समय समाज के कमजोर वर्गों के हितों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • दीर्घकालिक प्रभाव: नैतिक साधनों से बनी नीतियाँ स्थायी और व्यापक प्रभाव डालती हैं।
  • नैतिक नेतृत्व की भूमिका: नीति-निर्माताओं के व्यक्तिगत मूल्य पूरे प्रशासनिक तंत्र को प्रभावित करते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion – 2 lines):

लोक प्रशासन में साधनों की नैतिक पारदर्शिता को प्राथमिकता देना ही सच्चा सुशासन है। जब नीति निर्माण में नैतिक साधन और प्रभावी परिणाम साथ चलते हैं, तभी जनविश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा होती है।

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What is the moral basis of the work performance in the system of governance? Discuss in the light of result contingent and result non-contingent karma. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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शासन व्यवस्था में कार्य निष्पादन का नैतिक आधार क्या है? परिणाम-निरपेक्ष एवं परिणाम-सापेक्ष कर्म के आलोक में विवेचना कीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

शासन व्यवस्था में कार्य निष्पादन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व भी है। अधिकारी का आचरण लोकहित, पारदर्शिता और न्याय पर आधारित होना चाहिए। इस संदर्भ में परिणाम-निरपेक्ष (duty-based) और परिणाम-सापेक्ष (result-based) कर्म की अवधारणाएँ नैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • नैतिक आधार (Moral Foundation): सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व शासन के नैतिक स्तंभ हैं।
  • कर्तव्य-निष्ठा (Duty Orientation): अधिकारी को अपने कार्य को नैतिक दायित्व मानकर निष्पादित करना चाहिए।
  • परिणाम-निरपेक्ष कर्म (Result-Independent Action): गीता के अनुसार, “कर्म करो, फल की चिंता मत करो” — यह कर्तव्य-निष्ठ दृष्टिकोण को दर्शाता है।
  • नैतिक निष्ठा (Ethical Commitment): निर्णय लेते समय सही और न्यायसंगत मार्ग अपनाना, भले ही परिणाम तात्कालिक रूप से अनुकूल न हों।
  • लोकहित सर्वोपरि (Public Good First): प्रत्येक कार्य जनकल्याण के उद्देश्य से किया जाना चाहिए।
  • पारदर्शिता और उत्तरदायित्व (Transparency & Accountability): नैतिक शासन इन्हीं सिद्धांतों पर टिका है।
  • परिणाम-सापेक्ष कर्म (Result-Oriented Action): आधुनिक शासन में दक्षता और परिणाम भी महत्वपूर्ण हैं।
  • संतुलन की आवश्यकता (Need for Balance): केवल परिणाम पर ध्यान देने से नैतिक मूल्य कमजोर पड़ सकते हैं; अतः दोनों दृष्टिकोणों में संतुलन आवश्यक है।
  • व्यावसायिक नैतिकता (Professional Ethics): कार्य निष्पादन में ईमानदारी और दक्षता का संयोजन आवश्यक है।
  • नैतिक नेतृत्व (Moral Leadership): वरिष्ठ अधिकारियों को उदाहरण प्रस्तुत कर अधीनस्थों में नैतिक आचरण प्रेरित करना चाहिए।
  • सार्वजनिक विश्वास (Public Trust): जब कार्य निष्पादन नैतिक आधार पर होता है, तब शासन में जनता का विश्वास बढ़ता है।
  • नैतिक आत्मसंतोष (Moral Satisfaction): परिणाम कुछ भी हो, सही तरीके से किया गया कार्य आत्मसंतोष देता है।

निष्कर्ष (Conclusion): शासन में कार्य निष्पादन का वास्तविक मूल्य तभी है जब वह नैतिक सिद्धांतों से निर्देशित हो। कर्तव्य-निष्ठा और परिणाम-दक्षता के बीच संतुलन ही सुशासन और नैतिक प्रशासन की पहचान है।

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What should be the nature of civil service values for a public administrator? How can he create a balance between these values in his personal and public life? Explain. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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लोक प्रशासन में कार्यरत अधिकारी के लिए सिविल सेवा मूल्यों का स्वरूप क्या होना चाहिए? वह अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में इन मूल्यों के बीच कैसे संतुलन स्थापित कर सकता है? समझाइये।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

लोक प्रशासन में कार्यरत अधिकारी समाज और सरकार के बीच सेतु का कार्य करता है। उसके आचरण में सिविल सेवा मूल्यों का प्रतिबिंब जनविश्वास और सुशासन की नींव बनता है। अतः इन मूल्यों का स्पष्ट स्वरूप और संतुलित पालन अत्यंत आवश्यक है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • सत्यनिष्ठा (Integrity): ईमानदारी और नैतिकता को प्रत्येक कार्य का आधार बनाना।
  • निष्पक्षता (Impartiality): सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना, किसी भी दबाव से मुक्त रहना।
  • उत्तरदायित्व (Accountability): अपने निर्णयों और कार्यों के लिए जनता और सरकार के प्रति जवाबदेह रहना।
  • पारदर्शिता (Transparency): नीतियों और निर्णयों को स्पष्ट, सार्वजनिक और जाँच योग्य रखना।
  • लोकहित की भावना (Public Service Orientation): निजी लाभ से ऊपर जनहित को रखना।
  • कर्तव्यनिष्ठा (Dedication to Duty): प्रशासनिक कार्यों को समय पर और पूर्ण समर्पण से पूरा करना।
  • संवेदनशीलता (Empathy): विशेषकर कमजोर वर्गों की समस्याओं के प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखना।
  • व्यावसायिकता (Professionalism): ज्ञान, दक्षता और नैतिकता का संयोजन बनाए रखना।
  • शुचिता (Probity): पद की गरिमा बनाए रखते हुए भ्रष्टाचार रहित आचरण अपनाना।
  • साहसिकता (Courage of Conviction): सही निर्णय के लिए नैतिक साहस दिखाना, चाहे दबाव कोई भी हो।
  • संतुलन (Balance): निजी जीवन में सादगी, संयम और पारिवारिक मूल्यों का पालन करते हुए सार्वजनिक जीवन में निष्पक्षता बनाए रखना।
  • निरंतर आत्ममंथन (Self-evaluation): अपने आचरण की समय-समय पर समीक्षा करना ताकि नैतिकता बनी रहे।

निष्कर्ष (Conclusion):

सिविल सेवक के लिए नैतिक मूल्य केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि आचरण की रीढ़ हैं। जब वह निजी और सार्वजनिक जीवन दोनों में इन मूल्यों का संतुलन रखता है, तभी वह सच्चे अर्थों में जनसेवक कहलाता है।

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Discuss the moral bases to deal with the challenges of corruption prevailing in the present society. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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वर्तमान समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की चुनौतियों से निपटने के लिए नैतिक आधारों की विवेचना कीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

भ्रष्टाचार वर्तमान समाज की सबसे गंभीर नैतिक एवं प्रशासनिक समस्या बन गया है। यह केवल आर्थिक हानि ही नहीं पहुँचाता, बल्कि लोक सेवा की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है। इससे निपटने के लिए नैतिक मूल्यों पर आधारित दृष्टिकोण आवश्यक है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • सत्यनिष्ठा (Integrity): लोकसेवकों में ईमानदारी एवं पारदर्शिता का विकास।
  • उत्तरदायित्व (Accountability): प्रत्येक निर्णय के लिए नैतिक और प्रशासनिक जवाबदेही तय हो।
  • निष्पक्षता (Impartiality): व्यक्तिगत लाभ या पक्षपात से मुक्त निर्णय प्रक्रिया।
  • लोकहित (Public Interest): निजी स्वार्थ के बजाय जनहित को प्राथमिकता देना।
  • कर्तव्यपरायणता (Duty Consciousness): संविधान और सेवा नियमों के प्रति निष्ठा।
  • पारदर्शिता (Transparency): कार्यप्रणालियों को खुला और जाँच योग्य बनाना।
  • संवेदनशीलता (Sensitivity): नागरिकों की समस्याओं को समझने की नैतिक प्रतिबद्धता।
  • स्वयं अनुशासन (Self-discipline): नैतिक सीमाओं का स्वयं पालन।
  • शुचिता (Probity): भ्रष्टाचार रहित आचरण को जीवन का मूल सिद्धांत बनाना।
  • नैतिक शिक्षा (Ethical Education): समाज और प्रशासन में नैतिक मूल्यों की शिक्षा का प्रसार।
  • सामाजिक नियंत्रण (Social Control): नागरिक समाज और मीडिया द्वारा निगरानी को प्रोत्साहन।
  • सांस्कृतिक पुनर्जागरण (Moral Renaissance): भारतीय नैतिक परंपराओं जैसे सत्य, अहिंसा, सेवा की पुनर्स्थापना।

निष्कर्ष (Conclusion): भ्रष्टाचार का उन्मूलन केवल कानूनी उपायों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए नैतिक जागरूकता अनिवार्य है। जब समाज और प्रशासन दोनों नैतिक मूल्यों को अपनाएँगे, तभी एक ईमानदार और पारदर्शी व्यवस्था संभव होगी।

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