“बालक अपने चतुर्दिक जो देखता है, उससे मूल्यों को सीखता है” – इस कथन के आलोक में मूल्यों के निर्माण में परिवार और समाज की भूमिका की विवेचना कीजिए। “
Ans: प्रस्तावना (Introduction):
मूल्य (Values) किसी व्यक्ति के जीवन की नैतिक दिशा निर्धारित करते हैं। बालक का व्यक्तित्व जन्मजात नहीं होता, बल्कि उसके परिवेश से विकसित होता है। वह अपने परिवार और समाज से देखकर, सुनकर और अनुभव करके मूल्य सीखता है।
मुख्य बिंदु (Important Points):
- परिवार बालक का प्रथम विद्यालय होता है, जहाँ वह सत्य, ईमानदारी, और अनुशासन जैसे मूल्य सीखता है।
- माता-पिता के आचरण से बालक आदर्श व्यवहार का अनुकरण करता है।
- घर का वातावरण – प्रेम, सहयोग और सहिष्णुता – बालक की भावनात्मक स्थिरता बनाता है।
- समाज बालक को सामाजिक मूल्य जैसे समानता, न्याय, और सहअस्तित्व सिखाता है।
- विद्यालय, मित्र समूह और मीडिया भी मूल्य निर्माण में सहायक माध्यम बनते हैं।
- समाज की सांस्कृतिक परंपराएँ और रीति-रिवाज नैतिकता की जड़ों को मजबूत करते हैं।
- परिवार और समाज के समन्वित प्रयास से बालक में जिम्मेदारी और नैतिक चेतना विकसित होती है।
निष्कर्ष (Conclusion):
अतः परिवार और समाज बालक के मूल्य-निर्माण के दो प्रमुख स्तंभ हैं। इनके आदर्श व्यवहार से ही एक नैतिक, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण होता है।
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