नीतिशास्त्र में मानवकर्म से क्या तात्पर्य है? मानवकर्म में नैतिकता के निर्धारक और परिणाम की विवेचना कीजिए।
Ans: परिचय:
नीतिशास्त्र में मानवकर्म से तात्पर्य है मनुष्य द्वारा इच्छा, बुद्धि और विवेक के साथ किए गए कार्य। यह केवल बाह्य क्रिया नहीं बल्कि उसके पीछे की भावना, उद्देश्य और परिणाम से भी जुड़ा होता है। मानवकर्म की नैतिकता का मूल्यांकन उसके निर्धारकों और परिणामों के आधार पर किया जाता है।
मानवकर्म के नैतिक निर्धारक (Determinants of Morality):
- उद्देश्य (Intention): किसी कार्य की नैतिकता उसके पीछे की नीयत पर निर्भर करती है।
- प्रेरणा (Motive): निःस्वार्थ प्रेरणा नैतिक मानी जाती है, स्वार्थपरक प्रेरणा अनैतिक।
- कार्य का स्वरूप (Nature of Act): कार्य स्वयं में सद्गुणी या दुर्गुणी है, यह आवश्यक निर्धारक है।
- परिस्थिति (Circumstances): समय, स्थान और परिस्थिति नैतिक निर्णय को प्रभावित करती हैं।
- माध्यम (Means): “साध्य शुद्ध तभी जब साधन शुद्ध हों” – यह गांधीजी का सिद्धांत है।
- विवेक (Conscience): विवेकशीलता और आत्मनियंत्रण नैतिक कर्म का मूल आधार हैं।
मानवकर्म के नैतिक परिणाम (Consequences):
- आत्मसंतोष (Inner Peace): नैतिक कर्म से मन में शांति और संतोष की अनुभूति होती है।
- सामाजिक समरसता (Social Harmony): नैतिक कर्म समाज में सहयोग और एकता बढ़ाते हैं।
- आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth): नैतिकता व्यक्ति को उच्च मूल्यों की ओर अग्रसर करती है।
- पश्चाताप (Remorse): अनैतिक कर्म अपराधबोध और असंतोष को जन्म देते हैं।
- सामाजिक मूल्यांकन (Social Judgement): समाज व्यक्ति के कर्मों को नैतिक दृष्टि से परखता है।
- कर्मफल (Moral Result): हर कर्म का फल व्यक्ति को नैतिक रूप से भुगतना पड़ता है।
निष्कर्ष: अतः मानवकर्म का मूल्य केवल क्रिया से नहीं बल्कि उसके उद्देश्य, साधन और परिणाम से तय होता है। जब मनुष्य विवेक और निःस्वार्थता से कर्म करता है, तब वही कर्म सच्चे अर्थों में नैतिक कहलाता है।
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