नागर शैली के मंदिरों की वास्तुकला विशेषताओं का वर्णन कीजिए ।
Ans: प्रस्तावना (Introduction) –
नागर शैली भारत की प्रमुख मंदिर स्थापत्य शैलियों में से एक है, जो उत्तर भारत में विकसित हुई। यह शैली अपनी ऊँची शिखरों, गर्भगृह की प्रमुखता और कलात्मक अलंकरण के लिए प्रसिद्ध है। गुप्त काल से प्रारंभ होकर यह शैली मध्यकालीन मंदिर निर्माण की पहचान बन गई।
मुख्य बिंदु (Main Points):
- इसका विकास मुख्यतः उत्तर भारत में हुआ, विशेषकर मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और ओडिशा में।
- मंदिर का मुख्य भाग गर्भगृह (Sanctum Sanctorum) होता है, जहाँ देवी-देवता की मूर्ति स्थापित रहती है।
- गर्भगृह के ऊपर ऊँचा शिखर (Tower) होता है जो सीधा एवं वक्राकार होता है।
- शिखर का शीर्ष भाग आमलक (Amla) और कलश (Finial) से अलंकृत होता है।
- प्रवेश द्वार पर अत्यंत सजावटी तोरणद्वार (Gateway) निर्मित होते हैं।
- मंदिर का बाह्य भाग अत्यधिक मूर्तिकला और उत्कीर्णन से सुसज्जित रहता है।
- मंडप (सभागृह) में स्तंभों का सुंदर उपयोग किया जाता है।
- दीवारें ऊर्ध्वाधर रूप में बनी होती हैं, जिससे ऊँचाई का आभास होता है।
- यह शैली पत्थर पर आधारित होती है और गुम्बदों का प्रयोग नहीं होता।
- मंदिर सामान्यतः ऊँचे जगती (Platform) पर बनाए जाते हैं।
- मंदिर की योजना प्रायः पंचरथ या सप्त रथ रूप में होती है।
- प्रमुख उदाहरण: कैलाशनाथ मंदिर (कांचीपुरम), लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर), खजुराहो के मंदिर आदि।
निष्कर्ष (Conclusion) –
नागर शैली भारतीय स्थापत्य कला की उत्कृष्ट परंपरा को दर्शाती है। यह न केवल धार्मिक भावना का प्रतीक है, बल्कि भारत की कलात्मक एवं सांस्कृतिक गौरव की धरोहर भी है।
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