क्या भगवद्गीता लोकसेवकों की नैतिक मार्गदर्शिका हो सकती है? टिप्पणी कीजिए।

Ans: परिचय:

भगवद्गीता भारतीय दर्शन की अमूल्य कृति है जो जीवन, कर्तव्य और नैतिकता का गहन मार्गदर्शन प्रदान करती है।इसमें कर्मयोग, निःस्वार्थ सेवा, समभाव और कर्तव्यनिष्ठा जैसे  सिद्धांत निहित हैं। ये सभी गुण एक लोकसेवक के नैतिक आचरण की आधारशिला बन सकते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • भगवद्गीता कर्तव्य पालन को सर्वोपरि मानती है — “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
  • लोकसेवक को परिणाम की चिंता किए बिना निष्पक्षता से कार्य करना चाहिए।
  • यह निष्काम कर्मयोग (Selfless Action) की भावना सिखाती है।
  • निर्णय लेते समय समभाव और विवेकपूर्ण दृष्टि बनाए रखना आवश्यक है।
  • गीता में वर्णित स्वधर्म पालन लोकसेवक की निष्ठा को सुदृढ़ करता है।
  • यह क्रोध, लोभ और मोह जैसे दोषों से बचने की प्रेरणा देती है।
  • गीता का संयम और आत्मानुशासन प्रशासनिक दक्षता बढ़ाता है।
  • कठिन परिस्थितियों में धैर्य और संतुलन बनाए रखने का संदेश देती है।
  • लोकसेवक को जनकल्याण को सर्वोच्च लक्ष्य मानना चाहिए।
  • गीता का सत्य और धर्म पर जोर शासन में पारदर्शिता लाता है।
  • यह नेतृत्व और टीम भावना को भी प्रोत्साहित करती है।
  • उदाहरणतः, आधुनिक सिविल सेवक “कर्मयोगी” बनकर निष्ठा और सेवा का आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं।

निष्कर्ष:

अतः भगवद्गीता लोकसेवकों के लिए एक सशक्त नैतिक मार्गदर्शिका सिद्ध हो सकती है। इसकी शिक्षाएँ प्रशासन को आध्यात्मिक संतुलन, निष्पक्षता और जनसेवा की दिशा में प्रेरित करती हैं।

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