भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में उत्तर प्रदेश की भूमिका का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए ।

Ans: परिचय (Introduction – 3 lines):
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन (Indian Freedom Movement) में उत्तर प्रदेश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। यह प्रदेश न केवल कई प्रमुख आंदोलनों का केंद्र बना, बल्कि यहाँ से अनेक महान नेता भी उभरे। इसकी भूमि ने स्वतंत्रता संघर्ष को वैचारिक, राजनीतिक और जनांदोलन दोनों रूपों में दिशा दी।

मुख्य बिंदु (12 Bullet Points):
• 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मेरठ और कानपुर जैसे नगरों से प्रारंभ हुआ।
• मंगल पांडे और नाना साहब जैसे वीर सेनानियों ने विद्रोह का नेतृत्व किया।
• बनारस, लखनऊ और झाँसी इस संग्राम के प्रमुख केंद्र रहे।
• झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का बलिदान महिला वीरता का प्रतीक बना।
• कांग्रेस की कई अधिवेशन (जैसे 1910, 1916 का लखनऊ अधिवेशन) यहीं आयोजित हुए।
• 1916 के लखनऊ समझौते ने हिंदू-मुस्लिम एकता को बल दिया।
• असहयोग आंदोलन (1920) में वाराणसी, इलाहाबाद और गोरखपुर सक्रिय केंद्र बने।
• चौरी-चौरा की घटना (1922) यहीं घटी, जिसने आंदोलन की दिशा बदली।
• सविनय अवज्ञा आंदोलन में उत्तर प्रदेश के किसानों और विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
• नेताजी सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं का संबंध इस प्रदेश से था।
• क्रांतिकारी संगठनों — हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) — की गतिविधियाँ कानपुर और इलाहाबाद में केंद्रित थीं।
• ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (1942) में बलिया ने स्वतंत्र सरकार बनाकर उदाहरण प्रस्तुत किया।

निष्कर्ष (Conclusion – 2 lines):
उत्तर प्रदेश ने स्वतंत्रता संग्राम को जन-आंदोलन का रूप दिया। इसकी भूमिका न केवल नेतृत्वकारी रही, बल्कि इसने भारतीय राष्ट्रवाद को स्थायी आधार प्रदान किया।

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