भारत में बढ़ता हुआ क्षेत्रवाद किस प्रकार से अर्थव्यवस्था तथा राज्यव्यवस्था को प्रभावित कर रही है ? स्पष्ट कीजिए ।
Ans: भूमिका (Introduction ):
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में क्षेत्रवाद (Regionalism) स्वाभाविक रूप से उभरने वाली प्रवृत्ति है। यह क्षेत्रीय पहचान, भाषा, संस्कृति या आर्थिक असमानता के कारण पैदा होता है। परंतु जब यह अति रूप ले लेता है, तो यह देश की अर्थव्यवस्था और राज्यव्यवस्था दोनों को प्रभावित करता है।
मुख्य बिंदु (Important Points):
- क्षेत्रवाद के अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:
- विकास में असंतुलन: क्षेत्रीय असंतोष से निवेश और औद्योगिक विकास प्रभावित होता है।
- निवेश में कमी: अशांति और अस्थिरता के कारण निजी व विदेशी निवेशक पीछे हटते हैं।
- संसाधनों का अनुचित वितरण: क्षेत्रीय दबाव समूह विकास निधियों के असमान बँटवारे की माँग करते हैं।
- आर्थिक प्रतिस्पर्धा: राज्य आपसी प्रतिस्पर्धा में सहयोग की भावना खो देते हैं।
- राजकोषीय दबाव: क्षेत्रीय मांगों को पूरा करने हेतु सरकार पर वित्तीय बोझ बढ़ता है।
- श्रमिक प्रवास पर असर: क्षेत्रीय भेदभाव से आंतरिक प्रवासन और श्रम बाज़ार में अस्थिरता आती है।
- क्षेत्रवाद के राज्यव्यवस्था पर प्रभाव:
- राष्ट्रीय एकता पर खतरा: क्षेत्रीय निष्ठा राष्ट्रीय एकता से बड़ी बन जाती है।
- संघीय ढाँचे पर दबाव: राज्यों के बीच विवाद (जैसे जल बँटवारा, सीमा विवाद) बढ़ते हैं।
- राजनीतिक दलों का विखंडन: क्षेत्रीय दलों के उदय से राष्ट्रीय नीतियों में असंतुलन आता है।
- लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रभाव: क्षेत्रीय भावनाओं पर आधारित राजनीति विकास से ध्यान हटाती है।
- नीतिगत अस्थिरता: केंद्र व राज्यों के बीच सहयोग की कमी नीति निर्माण को प्रभावित करती है।
- सामाजिक तनाव: भाषाई, सांस्कृतिक और जातीय आधार पर समाज में विभाजन बढ़ता है।
निष्कर्ष (Conclusion):
भारत में क्षेत्रवाद को केवल दमन से नहीं, बल्कि समान विकास, संवैधानिक संतुलन और संवाद से नियंत्रित किया जा सकता है। जब सभी क्षेत्र समान अवसर पाएँगे, तभी राष्ट्रीय एकता और स्थिरता सशक्त बनेगी।
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