“ज्ञान के अभाव में सत्यनिष्ठा कमजोर एवं बेकार है लेकिन सत्यनिष्ठा के अभाव में ज्ञान खतरनाक एवं भयानक है”- इस कथन से आप क्या समझते हैं? समझाइये। “

Ans: परिचय:

यह कथन ज्ञान (Knowledge) और सत्यनिष्ठा (Integrity) के परस्पर संबंध को दर्शाता है ज्ञान मनुष्य को शक्ति देता है, जबकि सत्यनिष्ठा उसे उस शक्ति के सदुपयोग की दिशा प्रदान करती है जब ज्ञान और सत्यनिष्ठा दोनों एक साथ हों, तभी व्यक्ति और समाज का विकास संतुलित व नैतिक रूप से संभव है।

विवेचना:

  • ज्ञान का महत्व: ज्ञान व्यक्ति को समझ, विवेक और निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।
  • सत्यनिष्ठा का महत्व: सत्यनिष्ठा व्यक्ति को ईमानदार, न्यायप्रिय और जिम्मेदार बनाती है।
  • ज्ञान बिना सत्यनिष्ठा: यदि व्यक्ति के पास ज्ञान तो है पर ईमानदारी नहीं, तो वह ज्ञान विनाश का कारण बन सकता है।
  • उदाहरण: वैज्ञानिक ज्ञान का दुरुपयोग कर हथियार या फेक न्यूज़ तैयार करना।
  • सत्यनिष्ठा बिना ज्ञान: केवल ईमानदार होने से पर्याप्त नहीं, यदि व्यक्ति अज्ञान है तो उसके निर्णय प्रभावी नहीं होंगे।
  • उदाहरण: किसी प्रशासनिक अधिकारी की नीयत अच्छी हो लेकिन नीतियों का ज्ञान न हो, तो उसका कार्य निष्फल रहेगा।
  • दोनों का समन्वय आवश्यक: ज्ञान दिशा देता है और सत्यनिष्ठा उद्देश्य की शुद्धता सुनिश्चित करती है।
  • नैतिक दृष्टि से: ज्ञान का मूल्य तभी है जब उसका उपयोग सार्वजनिक हित में किया जाए।
  • लोक प्रशासन में: एक लोकसेवक को नीति-ज्ञान के साथ सत्यनिष्ठ होना चाहिए ताकि वह निष्पक्ष निर्णय ले सके।
  • दार्शनिक दृष्टिकोण: प्लेटो ने भी कहा कि “ज्ञान के साथ नैतिकता ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।”
  • व्यावहारिक उदाहरण: एक डॉक्टर के पास ज्ञान है, लेकिन सत्यनिष्ठा नहीं, तो वह लालच में मरीज को गलत दवा दे सकता है।
  • संतुलन की आवश्यकता: समाज में प्रगति तभी संभव है जब ज्ञान और नैतिकता दोनों का संयोजन हो।

निष्कर्ष:

इस कथन का सार यह है कि ज्ञान तभी सार्थक है जब वह सत्यनिष्ठा से जुड़ा हो। अतः एक सच्चे नागरिक या लोकसेवक के लिए ज्ञान और सत्यनिष्ठा दोनों का संगम ही वास्तविक नैतिक शक्ति है।

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