“लोकसेवक के द्वारा कर्तव्य निर्वहन न करना एक प्रकार का भ्रष्टाचार है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्कसंगत व्याख्या कीजिए।

Ans: परिचय:
लोकसेवक समाज और शासन के बीच विश्वास की कड़ी होते हैं। उनका मुख्य दायित्व जनता के हित में नीतियों और सेवाओं का निष्पक्ष व समयबद्ध क्रियान्वयन करना है। जब कोई लोकसेवक अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता, तो यह जनविश्वास का हनन और भ्रष्टाचार का एक रूप बन जाता है।

विवेचना (मुख्य बिंदु):

  1. कर्तव्यपालन का अभाव: लोकसेवक का कर्तव्य जनता की सेवा करना है; उसका निर्वहण न करना सार्वजनिक हित की उपेक्षा है।
  2. निष्क्रियता भी भ्रष्टाचार: केवल रिश्वत लेना ही नहीं, बल्कि कार्य में लापरवाही या टालमटोल भी भ्रष्टाचार का रूप है।
  3. संविधानिक दृष्टिकोण: संविधान लोकसेवकों को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है; कर्तव्य न निभाना इस सिद्धांत का उल्लंघन है।
  4. नैतिक दृष्टि से: जब लोकसेवक अपने पद का उपयोग जनता की भलाई की बजाय अपने आराम या स्वार्थ के लिए करता है, तो यह नैतिक पतन है।
  5. प्रशासनिक दक्षता: कर्तव्यपालन में कमी से शासन व्यवस्था की दक्षता घटती है और नागरिकों का भरोसा कम होता है।
  6. उदाहरण: किसी अधिकारी द्वारा जानबूझकर फाइलों को रोकना, शिकायतों का समाधान न करना या गरीबों की उपेक्षा करना – ये भ्रष्ट आचरण हैं।
  7. सामाजिक प्रभाव: ऐसे व्यवहार से जनता में असंतोष, अविश्वास और नकारात्मक छवि बनती है।
  8. कानूनी दृष्टि से: कई सेवाओं के आचार संहिताओं में कर्तव्य न निभाना कदाचार (Misconduct) की श्रेणी में आता है।
  9. नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता: एक सच्चा लोकसेवक अपने कर्तव्यों को सेवा, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के भाव से निभाता है।
  10. सुधार का उपाय: नियमित निगरानी, जवाबदेही तंत्र और नैतिक प्रशिक्षण से इस प्रकार के भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है।

निष्कर्ष :
अतः, कर्तव्य का पालन न करना केवल लापरवाही नहीं बल्कि जनसेवा की भावना का भ्रष्ट रूप है। मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ कि लोकसेवक का कर्तव्य निर्वहण न करना भी भ्रष्टाचार का ही एक प्रकार है।

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