1857 के स्वतंत्रता संग्राम के वैचारिक आयामों को रेखांकित कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना (Introduction) –

1857 का स्वतंत्रता संग्राम केवल एक सैनिक विद्रोह नहीं था, बल्कि भारत के स्वतंत्र अस्तित्व की चेतना का प्रथम संगठित प्रदर्शन था। इसमें धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक असंतोष का समावेश था। यह विद्रोह भारतीय एकता, सम्मान और स्वतंत्रता की भावना से प्रेरित था।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • इसे “भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” कहा जाता है क्योंकि इसमें स्वतंत्रता की वैचारिक चेतना निहित थी।
  • भारतीय सैनिकों और जनता में विदेशी शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय अस्मिता (National Identity) की भावना जागृत हुई।
  • विद्रोह में धर्म की रक्षा का विचार प्रमुख था — अंग्रेजों की धार्मिक हस्तक्षेप नीति के विरुद्ध।
  • सामाजिक रूप से यह भारतीय परंपराओं और संस्कृति के पुनर्जागरण की प्रेरणा था।
  • राजनीतिक स्तर पर यह विदेशी शासन को समाप्त करने और देशी राजसत्ता की पुनर्स्थापना का प्रयास था।
  • आर्थिक दृष्टि से यह औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध प्रतिक्रिया थी।
  • विद्रोहियों ने “देश की आज़ादी” के लिए राजनीतिक एकता की भावना को जन्म दिया।
  • नेतृत्व में हिन्दू-मुस्लिम एकता की झलक दिखाई दी – जैसे बहादुरशाह ज़फर का प्रतीकात्मक नेतृत्व।
  • प्रचार में देशभक्ति और स्वाधीनता के लोकप्रिय नारे व गीत शामिल थे।
  • यह विद्रोह औपनिवेशिक अन्याय और अपमान के विरुद्ध सामूहिक विद्रोह का स्वर था।
  • विद्रोह ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन की वैचारिक नींव रखी।
  • आगे चलकर इसने भारतीयों में राजनीतिक चेतना और संगठन की भावना को जन्म दिया।

निष्कर्ष (Conclusion) – 1857 का संग्राम स्वतंत्रता के वैचारिक बीज बोने वाला ऐतिहासिक मोड़ था। इसने भारत में राष्ट्रीय चेतना की नींव रखकर स्वतंत्रता आंदोलन के नए युग की शुरुआत की।

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