भारत में पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र कौन-कौन से हैं ? इनके संरक्षण के लिये भारत सरकार की नीतियों का उल्लेख कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारत अपनी भौगोलिक विविधता और जैविक समृद्धि के कारण कई पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Ecologically Sensitive Areas – ESAs) का घर है। ये क्षेत्र पारिस्थितिक संतुलन, जलवायु स्थिरता और जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनके संरक्षण हेतु भारत सरकार ने अनेक नीतियाँ व कानूनी उपाय अपनाए हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र वे होते हैं जहाँ मानव हस्तक्षेप से पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो सकता है।
  • भारत में प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र हैं –
  • पश्चिमी घाट (Western Ghats) – यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, जैव विविधता से समृद्ध।
  • हिमालयी क्षेत्र – हिमनद, नदियों के स्रोत और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र।
  • सुंदरबन डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र।
  • अंडमान-निकोबार द्वीप समूह – समुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध
  • मरुस्थलीय क्षेत्र (थार रेगिस्तान) – शुष्क पारिस्थितिक संतुलन वाला क्षेत्र।
  • पूर्वोत्तर भारत – उच्च वर्षा और घनी वनस्पति वाला पारिस्थितिक क्षेत्र।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत इन क्षेत्रों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।
  • ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) नीति के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों के आसपास सीमित मानवीय गतिविधियाँ अनुमति-प्राप्त होती हैं।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र की निगरानी करता है।
  • CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management Act, 2016) वनों के क्षरण की भरपाई हेतु लागू है।
  • नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज़ हिमालय क्षेत्र के संरक्षण पर केंद्रित है।
  • ग्रीन इंडिया मिशन और राष्ट्रीय कार्य योजना जलवायु परिवर्तन पर (NAPCC) पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को प्रोत्साहित करते हैं।
  • ई-कोरिडोर परियोजनाएँ वन्यजीवों की आवाजाही और आवास संरक्षण के लिए लागू हैं।
  • स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल करने की नीति ने स्थायी परिणाम दिए हैं।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः भारत के पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र न केवल पर्यावरणीय संतुलन के प्रतीक हैं, बल्कि मानव अस्तित्व के लिए भी आवश्यक हैं। सरकार की नीतियाँ यदि वैज्ञानिक दृष्टि और स्थानीय सहभागिता के साथ लागू हों, तो इनका संरक्षण स्थायी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

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