संगमकालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ क्या है ?

Ans: भूमिका (Introduction):

संगमकाल (लगभग 300 ई.पू. से 300 ई.) दक्षिण भारत के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण काल था। इस समय तमिल भाषा, साहित्य, समाज और संस्कृति का अद्भुत विकास हुआ। संगमकालीन संस्कृति जीवन के विविध पक्षों – धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक – का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • साहित्यिक उत्कर्ष: ‘संगम साहित्य’ में प्रेम, युद्ध, नीति, और समाज के वास्तविक चित्रण मिलते हैं।
  • भाषा का विकास: तमिल भाषा का शुद्ध और परिष्कृत रूप इसी काल में उभरा।
  • राजनीतिक जीवन: छोटे-छोटे चेर, चोल और पांड्य राज्यों का शासन प्रमुख था।
  • समाज व्यवस्था: समाज जातिगत न होकर व्यवसाय और गुणों पर आधारित था।
  • महिलाओं की स्थिति: महिलाओं को शिक्षा और सम्मान प्राप्त था; अव्वैयार जैसी कवयित्रियाँ प्रसिद्ध थीं।
  • आर्थिक जीवन: कृषि, व्यापार और समुद्री वाणिज्य अत्यंत उन्नत था; रोम तक व्यापारिक सम्बन्ध थे।
  • धार्मिक जीवन: लोग शैव, वैष्णव, मुरुगन और मातृदेवी की उपासना करते थे।
  • नैतिक मूल्य: वीरता, प्रेम और दानशीलता को सर्वोच्च गुण माना गया।
  • कला और स्थापत्य: संगीत, नृत्य और चित्रकला का उल्लेख संगम ग्रंथों में मिलता है।
  • शहरीकरण: नगरों में सुव्यवस्थित बाजार, सड़कें और सामाजिक संस्थाएँ विकसित थीं।
  • लोक संस्कृति: उत्सव, नृत्य और लोकगीत सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग थे।
  • राजनयिक सम्बन्ध: विदेशी व्यापार और सांस्कृतिक सम्पर्क से समाज उदार व प्रगतिशील बना।

निष्कर्ष (Conclusion): संगमकालीन संस्कृति ने दक्षिण भारत को साहित्य, कला और सामाजिक चेतना का केन्द्र बनाया। यह काल भारतीय संस्कृति के स्थानीय और सार्वभौमिक मूल्यों के संगम का प्रतीक माना जाता है।

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