उत्तर प्रदेश में ‘सार्वजनिक स्कूली शिक्षा की विफलता एवं भविष्य’ पर टिप्पणी लिखिए ।

Ans:   परिचय (Introduction):

सार्वजनिक स्कूली शिक्षा (Public School Education) किसी भी राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास की नींव होती है। उत्तर प्रदेश में यह प्रणाली व्यापक नेटवर्क के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाई है। गुणवत्ताहीन शिक्षण, संसाधनों की कमी और जवाबदेही के अभाव ने इसकी प्रभावशीलता को कमजोर किया है।

मुख्य बिंदु:

• राज्य में 1.5 लाख से अधिक सरकारी विद्यालय हैं, परंतु छात्र उपस्थिति में लगातार गिरावट देखी गई है।

• शिक्षकों की अनुपस्थिति और गैर-शैक्षिक कार्यों में व्यस्तता शिक्षण गुणवत्ता को प्रभावित करती है।

• आधारभूत सुविधाओं — बिजली, पानी, शौचालय, फर्नीचर — की कमी प्रमुख समस्या है।

• सीखने के स्तर (Learning Outcomes) में गिरावट ASER Report द्वारा बार-बार उजागर की गई है।

• अभिभावकों का झुकाव निजी विद्यालयों की ओर बढ़ा है।

• सरकारी विद्यालयों में English-medium और Digital Learning की कमी प्रतिस्पर्धा घटाती है।

• बजट आवंटन तो पर्याप्त है, पर उसका प्रभावी उपयोग नहीं हो पाता।

• छात्र-शिक्षक अनुपात कई क्षेत्रों में निर्धारित मानक से अधिक है।

• Mission Prerna और Operation Kayakalp जैसी योजनाएँ सुधार की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम हैं।

• शिक्षकों का प्रशिक्षण और मूल्यांकन प्रणाली अभी भी पारंपरिक है।

• ग्रामीण क्षेत्रों में छात्राओं की निरंतरता (Retention) एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

• शिक्षा में सामुदायिक भागीदारी और तकनीकी हस्तक्षेप से सुधार की संभावनाएँ बढ़ रही हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

उत्तर प्रदेश की सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली चुनौतियों से जूझ रही है, पर सुधार की दिशा में प्रयास जारी हैं। यदि गुणवत्ता, जवाबदेही और तकनीकी नवाचार पर ध्यान दिया जाए, तो इसका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।

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