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What is meant by Human Action in Ethics? Discuss the determinants and consequences of ethics in Human Action. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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नीतिशास्त्र में मानवकर्म से क्या तात्पर्य है? मानवकर्म में नैतिकता के निर्धारक और परिणाम की विवेचना कीजिए।

Ans: परिचय:

नीतिशास्त्र में मानवकर्म से तात्पर्य है मनुष्य द्वारा इच्छा, बुद्धि और विवेक के साथ किए गए कार्य। यह केवल बाह्य क्रिया नहीं बल्कि उसके पीछे की भावना, उद्देश्य और परिणाम से भी जुड़ा होता है। मानवकर्म की नैतिकता का मूल्यांकन उसके निर्धारकों और परिणामों के आधार पर किया जाता है।

मानवकर्म के नैतिक निर्धारक (Determinants of Morality):

  • उद्देश्य (Intention): किसी कार्य की नैतिकता उसके पीछे की नीयत पर निर्भर करती है।
  • प्रेरणा (Motive): निःस्वार्थ प्रेरणा नैतिक मानी जाती है, स्वार्थपरक प्रेरणा अनैतिक।
  • कार्य का स्वरूप (Nature of Act): कार्य स्वयं में सद्गुणी या दुर्गुणी है, यह आवश्यक निर्धारक है।
  • परिस्थिति (Circumstances): समय, स्थान और परिस्थिति नैतिक निर्णय को प्रभावित करती हैं।
  • माध्यम (Means): “साध्य शुद्ध तभी जब साधन शुद्ध हों” – यह गांधीजी का सिद्धांत है।
  • विवेक (Conscience): विवेकशीलता और आत्मनियंत्रण नैतिक कर्म का मूल आधार हैं।

मानवकर्म के नैतिक परिणाम (Consequences):

  • आत्मसंतोष (Inner Peace): नैतिक कर्म से मन में शांति और संतोष की अनुभूति होती है।
  • सामाजिक समरसता (Social Harmony): नैतिक कर्म समाज में सहयोग और एकता बढ़ाते हैं।
  • आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth): नैतिकता व्यक्ति को उच्च मूल्यों की ओर अग्रसर करती है।
  • पश्चाताप (Remorse): अनैतिक कर्म अपराधबोध और असंतोष को जन्म देते हैं।
  • सामाजिक मूल्यांकन (Social Judgement): समाज व्यक्ति के कर्मों को नैतिक दृष्टि से परखता है।
  • कर्मफल (Moral Result): हर कर्म का फल व्यक्ति को नैतिक रूप से भुगतना पड़ता है।

निष्कर्ष: अतः मानवकर्म का मूल्य केवल क्रिया से नहीं बल्कि उसके उद्देश्य, साधन और परिणाम से तय होता है। जब मनुष्य विवेक और निःस्वार्थता से कर्म करता है, तब वही कर्म सच्चे अर्थों में नैतिक कहलाता है।

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Can Bhagavadgita be an ethical guide for civil servants? Comment. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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क्या भगवद्गीता लोकसेवकों की नैतिक मार्गदर्शिका हो सकती है? टिप्पणी कीजिए।

Ans: परिचय:

भगवद्गीता भारतीय दर्शन की अमूल्य कृति है जो जीवन, कर्तव्य और नैतिकता का गहन मार्गदर्शन प्रदान करती है।इसमें कर्मयोग, निःस्वार्थ सेवा, समभाव और कर्तव्यनिष्ठा जैसे  सिद्धांत निहित हैं। ये सभी गुण एक लोकसेवक के नैतिक आचरण की आधारशिला बन सकते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • भगवद्गीता कर्तव्य पालन को सर्वोपरि मानती है — “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
  • लोकसेवक को परिणाम की चिंता किए बिना निष्पक्षता से कार्य करना चाहिए।
  • यह निष्काम कर्मयोग (Selfless Action) की भावना सिखाती है।
  • निर्णय लेते समय समभाव और विवेकपूर्ण दृष्टि बनाए रखना आवश्यक है।
  • गीता में वर्णित स्वधर्म पालन लोकसेवक की निष्ठा को सुदृढ़ करता है।
  • यह क्रोध, लोभ और मोह जैसे दोषों से बचने की प्रेरणा देती है।
  • गीता का संयम और आत्मानुशासन प्रशासनिक दक्षता बढ़ाता है।
  • कठिन परिस्थितियों में धैर्य और संतुलन बनाए रखने का संदेश देती है।
  • लोकसेवक को जनकल्याण को सर्वोच्च लक्ष्य मानना चाहिए।
  • गीता का सत्य और धर्म पर जोर शासन में पारदर्शिता लाता है।
  • यह नेतृत्व और टीम भावना को भी प्रोत्साहित करती है।
  • उदाहरणतः, आधुनिक सिविल सेवक “कर्मयोगी” बनकर निष्ठा और सेवा का आदर्श प्रस्तुत कर सकते हैं।

निष्कर्ष:

अतः भगवद्गीता लोकसेवकों के लिए एक सशक्त नैतिक मार्गदर्शिका सिद्ध हो सकती है। इसकी शिक्षाएँ प्रशासन को आध्यात्मिक संतुलन, निष्पक्षता और जनसेवा की दिशा में प्रेरित करती हैं।

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While formulating public policies a civil servant must safely focus on the public welfare and while implementing those policies he must have a foresight to infer possible unexpected consequences”. Do you agree with this statement? Give arguments and justifications for your answer. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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“सार्वजनिक नीतियां बनाते समय एक सिविल सेवक को केवल जनता की भलाई पर ध्यान देना चाहिए और उन नीतियों को लागू करते समय उसमें संभावित अनपेक्षित परिणामों का अनुमान लगाने की दूरदर्शिता होनी चाहिए।” – क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के लिए युक्ति तथा प्रमाण प्रस्तुत कीजिए।

Ans: परिचय:

सिविल सेवक शासन व्यवस्था का नैतिक स्तंभ होता है, जिसका मुख्य उद्देश्य जनता की भलाई सुनिश्चित करना है। नीतियों का निर्माण केवल वर्तमान लाभ के लिए नहीं बल्कि दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। इसलिए नीति-निर्माण में दूरदर्शिता और जनहित दोनों का संतुलन आवश्यक है।

मुख्य बिंदु:

  • मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ क्योंकि नीति का मूल उद्देश्य लोककल्याण होता है।
  • सिविल सेवक को व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर कार्य करना चाहिए।
  • नीति बनाते समय सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर विचार आवश्यक है।
  • दूरदर्शिता (Foresight) नीति की सफलता का प्रमुख तत्व है।
  • नीतियों के अनपेक्षित परिणामों (Unintended Consequences) की पूर्वानुमान से प्रशासनिक विफलता रोकी जा सकती है।
  • उदाहरण: कृषि में हरित क्रांति से उत्पादन बढ़ा, परंतु पर्यावरणीय क्षति भी हुई—दूरदर्शिता का अभाव स्पष्ट हुआ।
  • सिविल सेवक को Evidence-based Policy Making अपनानी चाहिए।
  • नीति लागू करने से पूर्व Impact Assessment आवश्यक है।
  • जनसहभागिता से नीति अधिक यथार्थवादी बनती है।
  • नैतिक उत्तरदायित्व नीति-निर्माण को मानवीय दृष्टिकोण देता है।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही नीति के प्रति जनविश्वास बढ़ाती है।
  • नीति-निर्माण में संवेदनशीलता और विवेक का संतुलन आवश्यक है।

निष्कर्ष:

इस प्रकार, सिविल सेवक का कर्तव्य केवल नीति बनाना नहीं, बल्कि उसके दूरगामी प्रभावों का पूर्वानुमान लगाना भी है। जनहित और दूरदर्शिता के संतुलन से ही सुशासन और सतत विकास संभव है।

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What do you understand by Ethical Governance? Elucidate with example. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-4

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नैतिक शासन व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

Ans: परिचय:

नैतिक शासन व्यवस्था (Ethical Governance) का अर्थ ऐसी प्रशासनिक प्रणाली से है जो न्याय, पारदर्शिता, जवाबदेही और लोककल्याण पर आधारित हो। यह केवल नियमों का पालन नहीं बल्कि नैतिक मूल्यों का आचरण भी सुनिश्चित करती है। ऐसी शासन व्यवस्था नागरिकों के विश्वास और सुशासन की नींव रखती है।

मुख्य बिंदु:

  • नैतिक शासन में ईमानदारी (Integrity) और निष्पक्षता (Impartiality) प्रमुख आधार होते हैं।
  • यह निर्णय-प्रक्रिया को पारदर्शी और उत्तरदायी बनाता है।
  • सत्ता का उपयोग सार्वजनिक हित में किया जाता है, न कि निजी लाभ हेतु।
  • नैतिकता नीति-निर्माण को मानव-केंद्रित बनाती है।
  • इसमें संवेदनशीलता (Sensitivity) और करुणा (Compassion) का समावेश होता है।
  • लोकसेवक अपने कर्तव्यों का पालन नैतिक मूल्यों के अनुरूप करते हैं।
  • यह भ्रष्टाचार, पक्षपात और दुरुपयोग को रोकने में सहायक है।
  • जनता की भागीदारी और विश्वास बढ़ाता है।
  • समाज में समानता (Equality) और न्याय (Justice) को बढ़ावा देता है।
  • तकनीकी पारदर्शिता जैसे ई-गवर्नेंस के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
  • उदाहरण: भारत में “लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम” नैतिक शासन की दिशा में एक कदम है।
  • महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तुत “रामराज्य” की परिकल्पना भी नैतिक शासन का आदर्श उदाहरण है।

निष्कर्ष:

नैतिक शासन व्यवस्था वह तंत्र है जो सत्ता को सेवा में परिवर्तित करता है। ऐसी व्यवस्था से न केवल प्रशासनिक दक्षता बढ़ती है, बल्कि जनता का विश्वास भी मजबूत होता है।

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What is the role of social influence in public administration? Elucidate with examples. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

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लोक प्रशासन में सामाजिक प्रभाव की क्या भूमिका है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए। What is the role of social influence in public administration? Elucidate with examples. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

लोक प्रशासन (Public Administration) समाज से जुड़ी हुई एक गतिशील प्रक्रिया है। इसमें सामाजिक प्रभाव (Social Influence) प्रशासनिक निर्णयों और व्यवहार को प्रभावित करता है। यह प्रभाव सकारात्मक भी हो सकता है और कभी-कभी नकारात्मक भी।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • सामाजिक प्रभाव से लोकसेवक जनता की अपेक्षाओं और मूल्यों को बेहतर समझ पाता है।
  • यह प्रशासन को स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के अनुरूप नीतियाँ बनाने में सहायता करता है।
  • जनमत (Public Opinion) नीति निर्माण और क्रियान्वयन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता है।
  • सामाजिक दबाव कभी-कभी लोकसेवकों को नैतिक दुविधा में डाल सकता है।
  • सकारात्मक सामाजिक प्रभाव से पारदर्शिता, जवाबदेही और जनसहभागिता को बल मिलता है।
  • उदाहरण – स्वच्छ भारत मिशन या बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान सामाजिक समर्थन से सफल हुए।
  • प्रशासन यदि समाज की भावनाओं और अपेक्षाओं को समझकर कार्य करे, तो जनविश्वास और सहयोग बढ़ता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः सामाजिक प्रभाव लोक प्रशासन का अभिन्न अंग है जो उसकी दिशा और प्रभावशीलता तय करता है। सकारात्मक सामाजिक प्रभाव से शासन अधिक जनोन्मुख, संवेदनशील और सफल बनता है।

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Explain the role of emotional intelligence for good governance and administration. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

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सुशासन और प्रशासन के लिए संवेगात्मक बुद्धि की भूमिका की व्याख्या कीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

संवेगात्मक बुद्धि (Emotional Intelligence) का अर्थ है—अपनी और दूसरों की भावनाओं को समझने, नियंत्रित करने और सकारात्मक रूप से उपयोग करने की क्षमता। सिविल सेवकों के लिए यह केवल बौद्धिक योग्यता से अधिक आवश्यक गुण है। यह सुशासन (Good Governance) और प्रभावी प्रशासन की आधारशिला बनती है।

मुख्य बिंदु (7 Important Points):

  • यह लोकसेवक को तनावपूर्ण परिस्थितियों में शांत और संतुलित बनाए रखती है।
  • सहानुभूति (Empathy) के माध्यम से जनता की भावनाओं और जरूरतों को समझने में मदद करती है।
  • आत्म-जागरूकता (Self-awareness) से अधिकारी अपने निर्णयों को नैतिक और तार्किक रख पाता है।
  • संबंध प्रबंधन (Relationship Management) से टीम वर्क और सहयोग की भावना मजबूत होती है।
  • यह संघर्ष समाधान और संवाद कौशल को प्रभावी बनाती है।
  • भावनात्मक रूप से बुद्धिमान अधिकारी मानव-केंद्रित प्रशासन को बढ़ावा देते हैं।
  • इससे शासन में विश्वास, करुणा और पारदर्शिता की भावना विकसित होती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः संवेगात्मक बुद्धि सुशासन के लिए एक नैतिक व प्रशासनिक पूरक शक्ति है।

यह सिविल सेवक को संवेदनशील, न्यायप्रिय और जनोन्मुख बनाती है।

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How can liberality and objectivity be fostered among civil servants? Give your suggestion. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

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सिविल सेवकों के बीच उदारता और वस्तुनिष्ठता को कैसे बढ़ावा दिया जा सकता है? अपना सुझाव दीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

सिविल सेवकों के कार्य का उद्देश्य जनहित की पूर्ति और न्यायपूर्ण शासन सुनिश्चित करना होता है। इसके लिए उनके भीतर उदारता (Tolerance) और वस्तुनिष्ठता (Objectivity) जैसे गुणों का होना अत्यंत आवश्यक है। ये गुण प्रशासन को निष्पक्ष, मानवीय और प्रभावी बनाते हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • नैतिक शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से संवेदनशीलता और निष्पक्ष सोच विकसित की जा सकती है।
  • विविध सामाजिक समूहों से संवाद बढ़ाकर सांस्कृतिक सहिष्णुता और समझ को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
  • साक्ष्य-आधारित निर्णय प्रक्रिया अपनाकर व्यक्तिगत पूर्वाग्रह को कम किया जा सकता है।
  • टीम वर्क और सहभागिता आधारित प्रशासन से सहयोग और सम्मान की भावना बढ़ती है।
  • नियमित आत्ममूल्यांकन और फीडबैक तंत्र से सुधार और आत्मचिंतन की प्रवृत्ति विकसित होती है।
  • वरिष्ठ अधिकारियों का आदर्श आचरण अधीनस्थों में वस्तुनिष्ठता की प्रेरणा देता है।
  • प्रोत्साहन और पुरस्कार प्रणाली के माध्यम से निष्पक्ष और उदार व्यवहार को बढ़ावा दिया जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः प्रशिक्षण, संवाद और मूल्य-आधारित कार्यसंस्कृति से उदारता और वस्तुनिष्ठता को सुदृढ़ किया जा सकता है। इन गुणों से सिविल सेवक प्रशासन में न्याय, पारदर्शिता और मानवता के मूल्यों को जीवंत रखते हैं।

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Discuss any two important attributes which you consider important for public servant. Justify your answer. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

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किन्हीं दो महत्वपूर्ण गुणों की विवेचना कीजिए जिन्हें आप लोक-सेवक के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। तर्कसंगत व्याख्या कीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

लोकसेवक प्रशासनिक व्यवस्था का प्रमुख स्तंभ होता है, जिस पर जनकल्याण की जिम्मेदारी होती है। उसके आचरण और निर्णयों से सरकार की विश्वसनीयता निर्धारित होती है। अतः कुछ नैतिक और व्यक्तित्वगत गुण लोकसेवक के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

(1) सत्यनिष्ठा (Integrity):

  • यह लोकसेवक को ईमानदारी और नैतिकता के मार्ग पर बनाए रखती है।
  • भ्रष्टाचार, पक्षपात और अनुचित प्रभावों से मुक्त निर्णय लेने में मदद करती है।
  • सत्यनिष्ठ अधिकारी जनता के बीच विश्वास और सम्मान अर्जित करता है।

(2) सहानुभूति (Empathy):

  • यह लोकसेवक को जनता की समस्याओं और भावनाओं को समझने की क्षमता देती है।
  • गरीब, वंचित और कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण विकसित करती है।
  • सहानुभूतिपूर्ण अधिकारी मानवता और न्याय पर आधारित प्रशासन को बढ़ावा देता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः सत्यनिष्ठा और सहानुभूति लोकसेवक के व्यक्तित्व की दो अनिवार्य विशेषताएँ हैं।

इनसे प्रशासनिक कार्य न केवल प्रभावी बल्कि मानवीय और नैतिक भी बनता है।

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Describe various components of attitude and discuss factors that influence attitude formation. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

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अभिवृत्ति के विभिन्न अवयवों का वर्णन कीजिए तथा अभिवृत्ति निर्माण को प्रभावित करने वाले कारकों का विवेचन कीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

अभिवृत्ति (Attitude) किसी व्यक्ति की सोच, भावना और व्यवहार का स्थायी मानसिक रुझान है। यह तय करती है कि व्यक्ति किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति के प्रति कैसा दृष्टिकोण रखेगा। अभिवृत्ति का निर्माण अनेक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों से होता है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • अभिवृत्ति के तीन प्रमुख अवयव (Components) होते हैं:
  • संज्ञानात्मक (Cognitive): व्यक्ति के विचार, विश्वास और ज्ञान से संबंधित।
  • भावात्मक (Affective): किसी विषय के प्रति व्यक्ति की भावनाएँ या संवेदनाएँ।
  • व्यवहारात्मक (Behavioral): व्यक्ति का बाहरी आचरण या प्रतिक्रिया।
  • अभिवृत्ति निर्माण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक (Factors) हैं—
  • परिवार और सामाजिक परिवेश: प्रारंभिक अनुभव और मूल्य प्रणाली से।
  • शिक्षा और मीडिया: नए विचारों और सूचनाओं के माध्यम से दृष्टिकोण बनाते हैं।
  • व्यक्तिगत अनुभव: सफलता या असफलता से उत्पन्न भावनात्मक प्रभाव।
  • समूह प्रभाव (Peer Influence): मित्रों व सहकर्मियों का दृष्टिकोण व्यक्ति को प्रभावित करता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः अभिवृत्ति व्यक्ति के व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण अंग है जो उसके व्यवहार को दिशा देता है। इसका निर्माण निरंतर सामाजिक अनुभवों और शिक्षा से होता है।

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In the era of Globalization International ethics is the need of hour for ensuring peace and stability among the nations”. Explain critically. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

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“वैश्वीकरण के युग में राष्ट्रों के मध्य शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र समय की मांग है।”, आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए। “

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

वैश्वीकरण (Globalization) ने विश्व के राष्ट्रों को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से परस्पर जुड़ दिया है। इस युग में किसी एक देश की नीतियाँ अन्य देशों को सीधे प्रभावित करती हैं। अतः अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र (International Ethics) वैश्विक शांति और स्थिरता का अनिवार्य आधार बन गया है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र राष्ट्रों के बीच न्याय, समानता और सहयोग के सिद्धांतों को प्रोत्साहित करता है।
  • यह मानवता के हित को राष्ट्रीय स्वार्थों से ऊपर रखने की प्रेरणा देता है।
  • युद्ध, शोषण और पर्यावरणीय दोहन जैसी समस्याओं के समाधान हेतु नैतिक दृष्टिकोण आवश्यक है।
  • विकसित देशों का दायित्व है कि वे विकासशील देशों के प्रति सहयोग और निष्पक्षता दिखाएँ।
  • वैश्विक संस्थाएँ (जैसे—UN, WHO, WTO) तभी प्रभावी बन सकती हैं जब उनके निर्णय नैतिक सिद्धांतों पर आधारित हों।
  • परंतु व्यवहार में कई बार राष्ट्र अपने राजनीतिक और आर्थिक हितों को प्राथमिकता देते हैं।
  • इसलिए अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र की सफलता नैतिक प्रतिबद्धता और पारदर्शिता पर निर्भर करती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

निष्कर्षतः, अंतर्राष्ट्रीय नीतिशास्त्र आज की वैश्विक व्यवस्था में शांति और संतुलन का मार्गदर्शक है। जब राष्ट्र नैतिक आचरण अपनाएँगे तभी वास्तविक वैश्विक सौहार्द और स्थिरता संभव होगी।

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