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A child learns values by what he observes around him”. Discuss the role of family and society in the formation of values in the light of this statement. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

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“बालक अपने चतुर्दिक जो देखता है, उससे मूल्यों को सीखता है” – इस कथन के आलोक में मूल्यों के निर्माण में परिवार और समाज की भूमिका की विवेचना कीजिए। “

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

मूल्य (Values) किसी व्यक्ति के जीवन की नैतिक दिशा निर्धारित करते हैं। बालक का व्यक्तित्व जन्मजात नहीं होता, बल्कि उसके परिवेश से विकसित होता है। वह अपने परिवार और समाज से देखकर, सुनकर और अनुभव करके मूल्य सीखता है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • परिवार बालक का प्रथम विद्यालय होता है, जहाँ वह सत्य, ईमानदारी, और अनुशासन जैसे मूल्य सीखता है।
  • माता-पिता के आचरण से बालक आदर्श व्यवहार का अनुकरण करता है।
  • घर का वातावरण – प्रेम, सहयोग और सहिष्णुता – बालक की भावनात्मक स्थिरता बनाता है।
  • समाज बालक को सामाजिक मूल्य जैसे समानता, न्याय, और सहअस्तित्व सिखाता है।
  • विद्यालय, मित्र समूह और मीडिया भी मूल्य निर्माण में सहायक माध्यम बनते हैं।
  • समाज की सांस्कृतिक परंपराएँ और रीति-रिवाज नैतिकता की जड़ों को मजबूत करते हैं।
  • परिवार और समाज के समन्वित प्रयास से बालक में जिम्मेदारी और नैतिक चेतना विकसित होती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः परिवार और समाज बालक के मूल्य-निर्माण के दो प्रमुख स्तंभ हैं। इनके आदर्श व्यवहार से ही एक नैतिक, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण होता है।

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Examine the relevance of the following in the context of civil service. a) Spirit of service b) Courage of firm conviction. [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

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सिविल सेवा के सन्दर्भ में निम्नलिखित की प्रासंगिकता का परीक्षण कीजिए। अ) सेवा भाव ब) दृढ़ विश्वास का साहस।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

सिविल सेवा केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं बल्कि जनता की सेवा का माध्यम है। इसमें लोकहित, निष्पक्षता और उत्तरदायित्व सर्वोपरि होते हैं। सेवा भाव और दृढ़ विश्वास का साहस, दोनों ही गुण एक आदर्श लोकसेवक की पहचान हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • सेवा भाव लोकसेवक को जनता की आवश्यकताओं और समस्याओं के प्रति संवेदनशील बनाता है।
  • यह करुणा, सहानुभूति और मानवीय दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
  • लोकसेवक को आत्मकेंद्रित न होकर सार्वजनिक कल्याण के प्रति समर्पित रखता है।
  • दृढ़ विश्वास का साहस नैतिकता और सत्य के मार्ग पर टिके रहने की शक्ति देता है।
  • यह लोकसेवक को राजनीतिक या व्यक्तिगत दबावों से स्वतंत्र होकर निर्णय लेने में सक्षम बनाता है।
  • नैतिक दुविधाओं की स्थिति में यह गुण सही के पक्ष में खड़े रहने का साहस प्रदान करता है।
  • दोनों गुण मिलकर प्रशासन में नैतिक नेतृत्व और जनविश्वास को सशक्त करते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः सेवा भाव और दृढ़ विश्वास का साहस सिविल सेवक के चरित्र की दो आधारशिलाएँ हैं।

इनके समन्वय से प्रशासन जनहितकारी, नैतिक और उत्तरदायी बनता है।

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What do you understand by Moral insight? How does it help in Moral situation of civil servants? [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-4

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नैतिक अन्तर्दृष्टि से आप क्या समझते हैं? लोकसेवकों की नैतिक परिस्थिति में यह किस प्रकार सहायक है?

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

नैतिक अन्तर्दृष्टि (Moral Insight) का अर्थ है—सही और गलत के बीच भेद करने की गहरी समझ। यह व्यक्ति को अपने आचरण और निर्णयों में नैतिक मूल्यों के अनुरूप कार्य करने की दिशा देती है। लोकसेवकों के लिए यह अंतर्दृष्टि ईमानदारी, निष्पक्षता और सार्वजनिक हित बनाए रखने की नींव है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • यह लोकसेवक को जटिल परिस्थितियों में नैतिक निर्णय लेने में सक्षम बनाती है।
  • व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सार्वजनिक कल्याण को प्राथमिकता देने में सहायता करती है।
  • भ्रष्टाचार, पक्षपात और शक्ति दुरुपयोग से बचाव का आधार बनती है।
  • पारदर्शिता, जवाबदेही और जनविश्वास को सुदृढ़ करती है।
  • नैतिक दुविधाओं में विवेकपूर्ण संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।
  • सेवा के आदर्शों जैसे सत्यनिष्ठा, करुणा और सहिष्णुता को प्रोत्साहित करती है।
  • प्रशासनिक निर्णयों में मानवता और न्याय के मूल्यों का समावेश सुनिश्चित करती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

इस प्रकार नैतिक अन्तर्दृष्टि लोकसेवकों के लिए एक नैतिक दिशा-सूचक का कार्य करती है। यह उनके कार्य को अधिक पारदर्शी, संवेदनशील और जनोन्मुख बनाती है।

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What is digital arrest ? Which are the States most effected by the problem of digital arrest in India in the last three years ? Mention the effective measures taken by the Government of India in this direction. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-3

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डिजिटल अरेस्ट क्या है ? विगत तीन वर्षों में भारत में डिजिटल अरेस्ट की समस्या से सर्वाधिक प्रभावित राज्य कौन-से हैं ? इस दिशा में भारत सरकार द्वारा उठाये गये प्रभावी उपायों का उल्लेख करें ।

Ans: परिचय (Introduction):  

डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) एक उभरता हुआ साइबर अपराध है जिसमें अपराधी स्वयं को सरकारी एजेंसी (जैसे CBI, पुलिस या NCB) का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल या संदेशों के माध्यम से लोगों को डराते हैं कि वे किसी अपराध में शामिल हैं और “ऑनलाइन गिरफ्तारी” से बचने के लिए धन जमा करें।

मुख्य बिंदु (Key Points):

  • यह अपराध भय और भ्रम फैलाकर आर्थिक ठगी करने का तरीका है।
  • कानूनी रूप से “डिजिटल गिरफ्तारी” का कोई अस्तित्व नहीं है।
  • पिछले तीन वर्षों में कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सर्वाधिक प्रभावित राज्य रहे हैं।
  • 2024 में कर्नाटक में 600 से अधिक मामले दर्ज हुए और ₹100 करोड़ से अधिक की हानि हुई।
  • सरकार ने Indian Cyber Crime Coordination Centre (I4C) और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के माध्यम से नियंत्रण के प्रयास किए।
  • ‘Stop-Think-Act’ अभियान के ज़रिए जनजागरूकता बढ़ाई जा रही है।
  • फर्जी सिम कार्ड, व्हाट्सएप व स्काइप खातों को ब्लॉक करने की कार्रवाई जारी है।

निष्कर्ष (Conclusion):

सरकार के साइबर नियंत्रण उपायों और नागरिक जागरूकता से इस डिजिटल ठगी पर रोक लगाई जा सकती है। सुरक्षित ऑनलाइन व्यवहार ही डिजिटल अरेस्ट जैसे अपराधों से बचाव का सर्वोत्तम उपाय है।

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What are major initiatives of Government of India for promoting technology-based solutions for rural upliftment ? [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-3

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ग्रामीण उत्थान के लिये तकनीक-आधारित समाधान को बढ़ावा देने हेतु भारत सरकार के प्रमुख प्रयास क्या हैं ?

Ans: परिचय (Introduction):

ग्रामीण भारत देश की जनसंख्या और अर्थव्यवस्था का आधार है। इसके सतत विकास के लिए भारत सरकार ने तकनीक-आधारित समाधान (Technology-Based Solutions) को ग्रामीण जीवन, कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य में लागू करने के अनेक प्रयास किए हैं।

मुख्य प्रयास (Key Initiatives):

  • डिजिटल इंडिया अभियान – ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, डिजिटल भुगतान और ई-गवर्नेंस को बढ़ावा।
  • कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) – ग्रामीण नागरिकों को सरकारी सेवाओं की डिजिटल पहुँच।
  • ई-नाम (e-NAM) पोर्टल – किसानों को ऑनलाइन कृषि बाजार उपलब्ध कराना।
  • भारतनेट परियोजना – ग्राम पंचायतों तक ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी पहुँचाना।
  • स्मार्ट ग्राम योजना – ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य और संचार में स्मार्ट समाधान लागू करना।
  • कृषि तकनीकी उपयोग – ड्रोन, सेंसर, और मोबाइल ऐप से सटीक कृषि को प्रोत्साहन।
  • आरोग्य सेतु व टेलीमेडिसिन सेवाएँ – ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में डिजिटल नवाचार।

निष्कर्ष (Conclusion):

तकनीक-आधारित पहलों ने ग्रामीण क्षेत्रों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाए हैं। इनसे न केवल जीवन स्तर सुधर रहा है, बल्कि ग्रामीण भारत आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो रहा है।

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“A person’s real behaviour was be contrary to the person’s attitude towards specific subject.” Do you agree with this statement? Answer with suitable argument.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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“एक व्यक्ति का वास्तविक व्यवहार व्यक्ति की विश्वास विषय के प्रति अभिव्यक्ति का विरुद्ध हो सकता है।” क्या आप इस कथन से सहमत है? उपयुक्त तर्कों सहित उत्तर दीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

मानव व्यवहार (Human Behaviour) सदैव उसकी आंतरिक मान्यताओं या विश्वासों (Beliefs) का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब नहीं होता। अक्सर व्यक्ति जो सोचता है, वही व्यवहार में प्रदर्शित नहीं करता—इसे “अभिवृत्ति और व्यवहार के अंतर (Attitude-Behaviour Gap)” कहा जाता है। इस अंतर के कई सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य कारण होते हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. सामाजिक दबाव (Social Pressure): व्यक्ति अपने वास्तविक विचारों के विपरीत व्यवहार करता है ताकि समाज में स्वीकृति बनी रहे।

2. परिस्थितिजन्य बाध्यता: कभी-कभी परिस्थिति या पद की सीमाएँ व्यक्ति को अपने विश्वास से अलग कार्य करने पर मजबूर करती हैं।

3. व्यक्तिगत लाभ: स्वार्थ या लाभ की भावना व्यक्ति को नैतिक मान्यताओं के विरुद्ध जाने को प्रेरित कर सकती है।

4. भय और असुरक्षा: सज़ा, आलोचना या अस्वीकृति के डर से व्यक्ति अपने विश्वासों को छिपा सकता है।

5. संगठनात्मक संस्कृति: किसी संस्था का वातावरण व्यक्ति के नैतिक आचरण को प्रभावित करता है।

6. नैतिक द्वंद्व (Moral Dilemma): जब दो नैतिक मूल्यों में टकराव हो, तो व्यवहार विश्वास से भिन्न हो सकता है।

7. आत्म-नियंत्रण की कमी: कभी-कभी व्यक्ति सही विश्वास रखता है, पर भावनाओं पर नियंत्रण न होने से गलत व्यवहार कर बैठता है।

8. अवसरवादिता (Opportunism): अवसर मिलने पर व्यक्ति सिद्धांतों से समझौता कर सकता है।

9. आदर्श और व्यवहार का अंतर: विचारों में व्यक्ति आदर्शवादी होता है, पर व्यवहार में व्यावहारिकता अपनाता है।

10. भूमिका-संघर्ष: विभिन्न सामाजिक भूमिकाओं (जैसे अधिकारी, पिता, मित्र) में व्यक्ति अलग-अलग व्यवहार करता है।

11. शिक्षा और आत्ममंथन की कमी: नैतिक शिक्षा की कमी से विश्वास और व्यवहार में दूरी बढ़ती है।

12. उदाहरण: कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार को गलत मानता है, पर रिश्वत देकर काम करवाने को “व्यवहारिकता” समझता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः यह कथन सही है कि व्यक्ति का व्यवहार उसके विश्वासों से भिन्न हो सकता है।  इस अंतर को कम करने के लिए नैतिक शिक्षा, आत्म-जागरूकता और मूल्य-आधारित सामाजिक वातावरण की आवश्यकता है।

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What are the key difference between ethics in private relations (family, friendships) and public relations (business, politics)? Explain.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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निजी संबंधों (परिवार, मित्रता) और सार्वजनिक संबंधों (व्यापार, राजनीति) में नैतिकता के बीच मुख्य अंतर क्या है? समझाइए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

नैतिकता (Ethics) हमारे व्यवहार को सही और गलत के मानदंडों से परखने का आधार प्रदान करती है। यह जीवन के हर क्षेत्र—निजी (Private) और सार्वजनिक (Public)—में समान रूप से आवश्यक है। फिर भी, दोनों क्षेत्रों की प्रकृति और दायित्व अलग होने के कारण उनकी नैतिकता में अंतर पाया जाता है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. संबंधों का आधार:

निजी संबंध भावनाओं, स्नेह और विश्वास पर आधारित होते हैं, जबकि सार्वजनिक संबंध कर्तव्य, नियम और निष्पक्षता पर टिका होता है।

2. उद्देश्य:

निजी संबंधों में व्यक्तिगत सुख-संतोष लक्ष्य होता है, जबकि सार्वजनिक संबंधों का उद्देश्य सामाजिक या सामूहिक कल्याण होता है।

3. जवाबदेही (Accountability):

परिवार या मित्रता में जवाबदेही व्यक्तिगत होती है, जबकि सार्वजनिक जीवन में यह जनता और कानून के प्रति होती है।

4. निर्णय-प्रक्रिया:

निजी जीवन में निर्णय भावनात्मक होते हैं, जबकि सार्वजनिक जीवन में निर्णय तार्किक और नीति-आधारित होते हैं।

5. नैतिक मानदंड:

निजी नैतिकता में करुणा, प्रेम और निष्ठा प्रमुख हैं; सार्वजनिक नैतिकता में सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और पारदर्शिता प्रमुख हैं।

6. गोपनीयता:

निजी संबंधों में गोपनीयता स्वीकार्य है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में पारदर्शिता आवश्यक है।

7. हितों का टकराव:

निजी संबंधों में पक्षपात स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक संबंधों में यह भ्रष्टाचार का रूप ले सकता है।

8. परिणाम का प्रभाव:

निजी नैतिकता का प्रभाव सीमित दायरे में रहता है, जबकि सार्वजनिक नैतिकता का असर व्यापक समाज पर पड़ता है।

9. मूल्य-निर्देशन:

निजी क्षेत्र में नैतिकता व्यक्तिगत मूल्यों से निर्देशित होती है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में संस्थागत नियमों से।

10. समय और परिस्थिति:

निजी नैतिकता लचीली होती है, जबकि सार्वजनिक नैतिकता अधिक स्थिर और औपचारिक।

11. दायित्व की प्रकृति:

निजी संबंध स्वैच्छिक होते हैं, जबकि सार्वजनिक संबंध संवैधानिक या कानूनी दायित्वों पर आधारित होते हैं।

12. नैतिक संघर्ष:

कई बार निजी स्नेह और सार्वजनिक कर्तव्य में टकराव होता है, जहाँ प्रशासक को सार्वजनिक नैतिकता को प्राथमिकता देनी चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion):

निजी और सार्वजनिक नैतिकता दोनों मानव जीवन के पूरक हैं, परंतु शासन और प्रशासन में सार्वजनिक नैतिकता सर्वोपरि है। जब व्यक्ति दोनों में संतुलन बनाए रखता है, तभी वह सच्चे अर्थों में नैतिक जीवन जी सकता है।

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As an administrator, develop an intervention programme for attitude change in “corruption free India”.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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एक प्रशासक के रूप में “भ्रष्टाचार मुक्त भारत” के संवर्धन में अभिवृत्ति परिवर्तन है, अंतरावेशी कार्यक्रम विकसित कीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि लोगों की अभिवृत्तियों (attitudes) में सकारात्मक परिवर्तन से संभव है।एक प्रशासक के रूप में यह आवश्यक है कि प्रशासनिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर नैतिक जागरूकता विकसित की जाए।इसके लिए एक अंतराकोशी (Interventional) कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है जो व्यवहार, सोच और मूल्यों में बदलाव लाए।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. नैतिक शिक्षा अभियान: विद्यालयों, महाविद्यालयों और प्रशिक्षण संस्थानों में नैतिकता और ईमानदारी पर सत्र आयोजित करना।

2. लोक सेवकों का प्रशिक्षण: अधिकारियों व कर्मचारियों को “Integrity and Ethics” पर नियमित प्रशिक्षण देना।

3. पारदर्शिता बढ़ाना: ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन सेवाओं को बढ़ावा देकर मानव संपर्क आधारित भ्रष्टाचार को कम करना।

4. जन-जागरूकता कार्यक्रम: नारे, पोस्टर, सोशल मीडिया अभियान के माध्यम से नागरिकों में ईमानदारी की भावना जागृत करना।

5. प्रोत्साहन तंत्र: ईमानदार अधिकारियों और नागरिकों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करना।

6. शिकायत निवारण तंत्र: स्वतंत्र और पारदर्शी “जन-सुनवाई” प्रणाली लागू करना।

7. नैतिक क्लब (Ethics Clubs): स्कूलों व कॉलेजों में नैतिक क्लब स्थापित कर युवाओं को भ्रष्टाचार विरोधी संदेश देना।

8. नागरिक सहभागिता: समाज के विभिन्न समूहों—NGOs, RWA, मीडिया—को भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों से जोड़ना।

9. मूल्याधारित नेतृत्व: उच्च अधिकारियों को नैतिक उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करना।

10. समाजिक अनुशासन: भ्रष्ट आचरण के प्रति समाज में अस्वीकार्यता (Zero Tolerance) का वातावरण बनाना।

11. मीडिया निगरानी: स्वतंत्र मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भ्रष्टाचार उजागर करने में सहयोगी बनाना।

12. सतत मूल्यांकन: अभियान की प्रभावशीलता मापने के लिए समय-समय पर निगरानी और सुधार करना।

निष्कर्ष (Conclusion):

भ्रष्टाचार मुक्त भारत की दिशा में सबसे प्रभावी उपाय नागरिकों और प्रशासकों की सोच में नैतिक परिवर्तन है। जब अभिवृत्ति, व्यवहार और प्रशासनिक संस्कृति ईमानदारी से जुड़ेंगी, तभी सच्चा सुशासन साकार होगा।

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In the process of policy making by public administrators whether the priority should be given to the moral transparency or the effectiveness of consequences/results? Elucidate. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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लोक प्रशासकों द्वारा नीति-निर्माण की प्रक्रिया में वांछित सामाजिक-नैतिक लक्षणों की प्राप्ति हेतु, क्या साधनों की नैतिक पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए अथवा परिणामों की प्रभावशीलता को? समझाइये।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

लोक प्रशासक नीति-निर्माण में ऐसे निर्णय लेते हैं जो समाज के जीवन-मूल्यों को प्रभावित करते हैं। इन निर्णयों में नैतिक पारदर्शिता और परिणामों की प्रभावशीलता दोनों का संतुलन आवश्यक है। यह प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि साधन और परिणाम दोनों ही शासन की नैतिकता को परिभाषित करते हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points – 12 bullet points):

  • साधनों की नैतिकता (Ethical Means): नीति-निर्माण में अपनाए गए साधन पारदर्शी, न्यायसंगत और सत्यनिष्ठ होने चाहिए।
  • परिणामों की प्रभावशीलता (Effectiveness of Outcomes): नीतियों के परिणाम व्यावहारिक, जनोन्मुखी और समाजहितकारी हों।
  • गांधीजी का दृष्टिकोण: उन्होंने कहा – “असत्य साधनों से सत्य उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता।”
  • नैतिक पारदर्शिता का महत्व: यह नीति-निर्माताओं की विश्वसनीयता और सार्वजनिक विश्वास को सुदृढ़ करती है।
  • परिणाम-आधारित दृष्टिकोण: आधुनिक प्रशासन में परिणामों की गुणवत्ता और मापन पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
  • संतुलन की आवश्यकता: केवल साधनों पर या केवल परिणामों पर ध्यान देना नैतिक असंतुलन पैदा कर सकता है।
  • उद्देश्य और साधन की एकता: जब नीति-निर्माण में दोनों एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, तभी नैतिकता और दक्षता दोनों सुनिश्चित होती हैं।
  • लोकहित सर्वोपरि सिद्धांत: नीति चाहे कोई भी हो, उसका अंतिम उद्देश्य जनकल्याण होना चाहिए।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही: नीति प्रक्रिया खुली और उत्तरदायी होनी चाहिए ताकि भ्रष्टाचार व पक्षपात न बढ़े।
  • मानवीय दृष्टिकोण: नीति बनाते समय समाज के कमजोर वर्गों के हितों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • दीर्घकालिक प्रभाव: नैतिक साधनों से बनी नीतियाँ स्थायी और व्यापक प्रभाव डालती हैं।
  • नैतिक नेतृत्व की भूमिका: नीति-निर्माताओं के व्यक्तिगत मूल्य पूरे प्रशासनिक तंत्र को प्रभावित करते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion – 2 lines):

लोक प्रशासन में साधनों की नैतिक पारदर्शिता को प्राथमिकता देना ही सच्चा सुशासन है। जब नीति निर्माण में नैतिक साधन और प्रभावी परिणाम साथ चलते हैं, तभी जनविश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा होती है।

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What is the moral basis of the work performance in the system of governance? Discuss in the light of result contingent and result non-contingent karma. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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शासन व्यवस्था में कार्य निष्पादन का नैतिक आधार क्या है? परिणाम-निरपेक्ष एवं परिणाम-सापेक्ष कर्म के आलोक में विवेचना कीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

शासन व्यवस्था में कार्य निष्पादन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व भी है। अधिकारी का आचरण लोकहित, पारदर्शिता और न्याय पर आधारित होना चाहिए। इस संदर्भ में परिणाम-निरपेक्ष (duty-based) और परिणाम-सापेक्ष (result-based) कर्म की अवधारणाएँ नैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • नैतिक आधार (Moral Foundation): सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व शासन के नैतिक स्तंभ हैं।
  • कर्तव्य-निष्ठा (Duty Orientation): अधिकारी को अपने कार्य को नैतिक दायित्व मानकर निष्पादित करना चाहिए।
  • परिणाम-निरपेक्ष कर्म (Result-Independent Action): गीता के अनुसार, “कर्म करो, फल की चिंता मत करो” — यह कर्तव्य-निष्ठ दृष्टिकोण को दर्शाता है।
  • नैतिक निष्ठा (Ethical Commitment): निर्णय लेते समय सही और न्यायसंगत मार्ग अपनाना, भले ही परिणाम तात्कालिक रूप से अनुकूल न हों।
  • लोकहित सर्वोपरि (Public Good First): प्रत्येक कार्य जनकल्याण के उद्देश्य से किया जाना चाहिए।
  • पारदर्शिता और उत्तरदायित्व (Transparency & Accountability): नैतिक शासन इन्हीं सिद्धांतों पर टिका है।
  • परिणाम-सापेक्ष कर्म (Result-Oriented Action): आधुनिक शासन में दक्षता और परिणाम भी महत्वपूर्ण हैं।
  • संतुलन की आवश्यकता (Need for Balance): केवल परिणाम पर ध्यान देने से नैतिक मूल्य कमजोर पड़ सकते हैं; अतः दोनों दृष्टिकोणों में संतुलन आवश्यक है।
  • व्यावसायिक नैतिकता (Professional Ethics): कार्य निष्पादन में ईमानदारी और दक्षता का संयोजन आवश्यक है।
  • नैतिक नेतृत्व (Moral Leadership): वरिष्ठ अधिकारियों को उदाहरण प्रस्तुत कर अधीनस्थों में नैतिक आचरण प्रेरित करना चाहिए।
  • सार्वजनिक विश्वास (Public Trust): जब कार्य निष्पादन नैतिक आधार पर होता है, तब शासन में जनता का विश्वास बढ़ता है।
  • नैतिक आत्मसंतोष (Moral Satisfaction): परिणाम कुछ भी हो, सही तरीके से किया गया कार्य आत्मसंतोष देता है।

निष्कर्ष (Conclusion): शासन में कार्य निष्पादन का वास्तविक मूल्य तभी है जब वह नैतिक सिद्धांतों से निर्देशित हो। कर्तव्य-निष्ठा और परिणाम-दक्षता के बीच संतुलन ही सुशासन और नैतिक प्रशासन की पहचान है।

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