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Distinguish between natural and manmade disasters. Also, elucidate the effectiveness of the disaster management system in India. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-3

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प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं में अन्तर स्पष्ट करें। साथ ही, भारत में आपदा प्रबन्धन प्रणाली की प्रभावशीलता स्पष्ट करें।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

आपदाएँ दो प्रकार की होती हैं – प्राकृतिक (Natural) और मानव निर्मित (Man-made)। ये मानव जीवन, संपत्ति और पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। भारत, अपने भौगोलिक विविधता के कारण, दोनों प्रकार की आपदाओं के प्रति संवेदनशील है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • प्राकृतिक आपदाएँ – वे आपदाएँ जो प्रकृति की शक्तियों से उत्पन्न होती हैं, जैसे भूकम्प, बाढ़, चक्रवात, सूखा आदि।
  • मानव निर्मित आपदाएँ – वे आपदाएँ जो मानव की गतिविधियों से उत्पन्न होती हैं, जैसे औद्योगिक दुर्घटनाएँ, रासायनिक रिसाव, परमाणु दुर्घटनाएँ आदि।
  • प्राकृतिक आपदाएँ अप्रत्याशित होती हैं, जबकि मानव निर्मित आपदाएँ प्रायः लापरवाही या तकनीकी विफलता से होती हैं।
  • भारत विश्व के उन देशों में है जहाँ लगभग 60% भूमि भूकम्प संभावित क्षेत्र में है।
  • देश के तटीय भागों में चक्रवात और सुनामी का खतरा बना रहता है।
  • मानव निर्मित आपदाओं में भोपाल गैस त्रासदी (1984) प्रमुख उदाहरण है।
  • भारत में आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 लागू किया गया।
  • इसके तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) की स्थापना हुई।
  • राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) व जिला आपदा प्राधिकरण (DDMA) स्थानीय स्तर पर कार्य करते हैं।
  • NDRF (National Disaster Response Force) त्वरित राहत व बचाव कार्यों में अग्रणी भूमिका निभाती है।
  • सरकार ने ‘Sendai Framework for Disaster Risk Reduction’ के अनुरूप नीति अपनाई है।
  • समुदाय आधारित आपदा प्रबंधन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली से तैयारी में सुधार हुआ है।

निष्कर्ष (Conclusion):

भारत की आपदा प्रबंधन प्रणाली निरंतर सुदृढ़ हो रही है, परंतु स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण और जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। समन्वित प्रयासों से ही आपदाओं के प्रभाव को न्यूनतम किया जा सकता है।

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Present an account of the missions included in the State Action Plan on Climate Change in Uttar Pradesh. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-6

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उत्तर प्रदेश में जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्य योजना में शामिल मिशनों का विवरण प्रस्तुत करें।

Ans: प्रस्तावना (Introduction ):

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) वर्तमान समय की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौती है, जिसका प्रभाव उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों पर विशेष रूप से देखा जा रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (State Action Plan on Climate Change – SAPCC) तैयार की है। इस योजना में विभिन्न क्षेत्रों के लिए विशेष “मिशन आधारित रणनीतियाँ” अपनाई गई हैं, जिनका उद्देश्य पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास सुनिश्चित करना है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • सौर ऊर्जा मिशन: राज्य में सौर ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देकर जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाना।
  • कृषि एवं खाद्य सुरक्षा मिशन: जलवायु-सहिष्णु फसलों, सूक्ष्म सिंचाई और मृदा संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा।
  • जल संसाधन मिशन: जल संरक्षण, पुनर्भरण और सिंचाई दक्षता सुधार के लिए योजनाएँ लागू की गईं।
  • वन एवं जैव विविधता मिशन: वृक्षारोपण, सामाजिक-वानिकी और वन आवरण बढ़ाने पर बल।
  • ऊर्जा दक्षता मिशन: उद्योगों, भवनों और परिवहन क्षेत्र में ऊर्जा दक्ष तकनीकों को प्रोत्साहन।
  • शहरी विकास मिशन: स्मार्ट सिटी, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और हरित परिवहन को बढ़ावा।
  • स्वास्थ्य मिशन: जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न बीमारियों जैसे हीट स्ट्रोक और मलेरिया की रोकथाम हेतु नीति।
  • औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण मिशन: प्रदूषणकारी इकाइयों की निगरानी और स्वच्छ उत्पादन तकनीकों को प्रोत्साहन।
  • परिवहन मिशन: इलेक्ट्रिक वाहनों, सार्वजनिक परिवहन और स्वच्छ ईंधनों को बढ़ावा।
  • जलवायु जागरूकता मिशन: विद्यालयों, कॉलेजों और पंचायतों में जन-जागरूकता कार्यक्रमों का संचालन।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण मिशन: बाढ़, सूखा और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं से निपटने के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित।
  • अनुसंधान और नीति मिशन: जलवायु परिवर्तन पर अनुसंधान को बढ़ावा देकर दीर्घकालिक नीति निर्माण का आधार तैयार।

निष्कर्ष (Conclusion):

उत्तर प्रदेश की जलवायु कार्य योजना राज्य को पर्यावरणीय संकटों से निपटने के लिए दीर्घकालिक दृष्टिकोण प्रदान करती है। इन मिशनों के प्रभावी क्रियान्वयन से राज्य सतत विकास और जलवायु लचीलापन (Climate Resilience) की दिशा में सशक्त रूप से आगे बढ़ रहा है।

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Outline the importance of the Meteorological Centre, Lucknow with reference to weather forecasts in Uttar Pradesh. [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-6

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उत्तर प्रदेश में मौसम पूर्वानुमान के संदर्भ में मौसम विज्ञान केन्द्र, लखनऊ के महत्व को रेखांकित करें।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

मौसम पूर्वानुमान (Weather Forecasting) कृषि, आपदा प्रबंधन और जनजीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश में मौसम विज्ञान केंद्र, लखनऊ (Meteorological Centre, Lucknow) भारतीय मौसम विभाग का प्रमुख क्षेत्रीय केंद्र है। यह केंद्र राज्य में सटीक मौसम पूर्वानुमान, चेतावनी प्रणाली और जलवायु विश्लेषण में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।

मुख्य बिंदु (12 Important Bullet Points):

  • स्थापना: यह केंद्र भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अधीन कार्य करता है और उत्तर प्रदेश के सभी जिलों के मौसम डेटा का संकलन करता है।
  • सटीक मौसम पूर्वानुमान: तापमान, वर्षा, आर्द्रता और वायु गति जैसे तत्वों का वास्तविक समय में विश्लेषण करता है।
  • कृषि मौसम सेवा: किसानों के लिए साप्ताहिक पूर्वानुमान और फसल सलाह जारी की जाती है, जिससे कृषि निर्णयों में मदद मिलती है।
  • आपदा चेतावनी प्रणाली: बाढ़, चक्रवात, ओलावृष्टि और शीतलहर जैसी प्राकृतिक घटनाओं की समय पर चेतावनी प्रदान करता है।
  • डॉप्लर वेदर रडार (DWR): लखनऊ में स्थापित आधुनिक रडार से वर्षा और तूफानों की सटीक निगरानी की जाती है।
  • राज्य सरकार के साथ समन्वय: आपदा प्रबंधन विभाग और कृषि विभाग को समय पर रिपोर्ट उपलब्ध कराई जाती है।
  • शहरी मौसम निगरानी: वायु गुणवत्ता और तापमान असंतुलन पर निगरानी रखकर नागरिकों को सचेत करता है।
  • जलवायु परिवर्तन अध्ययन: दीर्घकालिक जलवायु डेटा का विश्लेषण कर राज्य में बदलते मौसमी रुझानों की पहचान।
  • मौसम एप और SMS सेवाएँ: किसानों और नागरिकों को मोबाइल संदेशों के माध्यम से मौसम पूर्वानुमान पहुँचाया जाता है।
  • एविएशन सेवाएँ: हवाई अड्डों को उड़ान सुरक्षा हेतु आवश्यक मौसम जानकारी प्रदान करता है।
  • शोध और प्रशिक्षण केंद्र: छात्रों और वैज्ञानिकों के लिए मौसम संबंधी प्रशिक्षण और अध्ययन की सुविधा।
  • भविष्य की दिशा: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उपग्रह आधारित डेटा से और अधिक सटीक पूर्वानुमान की दिशा में कार्य जारी है।

निष्कर्ष (Conclusion):

मौसम विज्ञान केंद्र, लखनऊ उत्तर प्रदेश के मौसम पूर्वानुमान तंत्र का आधार स्तंभ है। यह न केवल कृषि और आपदा प्रबंधन को सशक्त बनाता है, बल्कि राज्य की जलवायु नीति निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभा रहा है।

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What are the key features and significance of the Lower Ganga Canal System in Uttar Pradesh? [Marks-8] UPPCS Mains 2023 GS-6

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उत्तर प्रदेश में निचली गंगा नहर प्रणाली की मुख्य विशेषताएं और महत्व क्या हैं?

Ans: भूमिका (Introduction):

निचली गंगा नहर प्रणाली (Lower Ganga Canal System) उत्तर प्रदेश की सबसे पुरानी और महत्वपूर्ण सिंचाई योजनाओं में से एक है। यह प्रणाली गंगा नदी से जल लेकर पश्चिमी व मध्य उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्रों को सिंचित करती है। इसका निर्माण ब्रिटिश काल में 1854 ई. में किया गया था, जिससे कृषि उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • निचली गंगा नहर की शुरुआत नारौरा बैराज (Bulandshahr) से होती है।
  • यह नहर मुख्यतः अलीगढ़, एटा, फर्रुखाबाद, कानपुर देहात, और हरदोई जिलों को सिंचित करती है।
  • नहर प्रणाली में मुख्य नहर, शाखाएँ और उप-नहरें शामिल हैं जो लाखों हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा देती हैं।
  • यह क्षेत्र में धान, गेहूँ, गन्ना और दलहनी फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देती है।
  • नहर प्रणाली से भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) में भी सहायता मिलती है।
  • इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाकर कृषि आधारित उद्योगों के विकास को गति दी।
  • निचली गंगा नहर प्रणाली बाढ़ नियंत्रण और जल संतुलन में भी अहम भूमिका निभाती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

निचली गंगा नहर प्रणाली ने उत्तर प्रदेश के कृषि विकास में जल संसाधन प्रबंधन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है।इससे प्रदेश की सिंचाई क्षमता और किसानों की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

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Discuss the characteristics, causes and effects of Tsunami with example. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-1

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सुनामी की विशेषताओं, कारणों एवं प्रभावों का सोदाहरण विवेचन प्रस्तुत कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

सुनामी समुद्र की गहराइयों में उत्पन्न होने वाली तीव्र ऊर्जा का परिणाम होती है, जो विशाल तरंगों के रूप में तटों की ओर बढ़ती है। यह प्राकृतिक आपदा अचानक और व्यापक विनाश करने की क्षमता रखती है। इसके कारण और प्रभाव भौगोलिक, भूवैज्ञानिक तथा मानवीय पहलुओं से गहराई से जुड़े होते हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points) :

  • समुद्र तल में अचानक ऊर्जा विस्फोट—जैसे भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, भू-स्खलन आदि—सुनामी का प्रमुख कारण होता है।
  • अधिकांश सुनामी समुद्र के नीचे आने वाले टेक्टॉनिक भूकंपों से उत्पन्न होती हैं।
  • समुद्र में उठने वाली तरंगों की गति 700–800 किमी/घंटा तक पहुँच सकती है।
  • गहरे समुद्र में तरंगों की ऊँचाई कम होती है, जिससे वे दिखाई नहीं देतीं।
  • तटीय क्षेत्रों के पास पहुँचने पर जल की गहराई कम होने से तरंगों की ऊँचाई अचानक कई मीटर तक बढ़ जाती है।
  • सुनामी की तरंगें एकल नहीं होतीं; वे कई तरंगों की श्रृंखला के रूप में आती हैं।
  • सुनामी तट पर पहुंचकर बड़े पैमाने पर जन-हानि और संपत्ति क्षति का कारण बनती है।
  • तटीय पारिस्थितिकी तंत्र—जैसे मैंग्रोव, कोरल रीफ और समुद्री जैव विविधता—पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है।
  • पेयजल स्रोतों में खारे पानी के मिल जाने से जल-उपलब्धता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।
  • सड़क, बंदरगाह, पुल, विद्युत और संचार जैसी आधारभूत संरचनाएँ व्यापक रूप से नष्ट हो जाती हैं।
  • सुनामी के बाद स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ—जैसे पानी से फैलने वाली बीमारियाँ—बढ़ने का खतरा रहता है।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, तटीय सुरक्षा संरचनाएँ और सामुदायिक जागरूकता से इसके प्रभावों को कम किया जा सकता है।

निष्कर्ष : सुनामी एक जटिल प्राकृतिक घटना है जिसका प्रभाव मानव जीवन, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर गहरा पड़ता है। समुचित तैयारी, वैज्ञानिक समझ और चेतावनी तंत्र ही इसके विनाशकारी प्रभावों को न्यूनतम कर सकते हैं।

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Write a note on seismic zones of India. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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भारत के भूकम्पीय क्षेत्रों पर टिप्पणी लिखिए ।

Ans: प्रस्तावना:

भारत भूकम्पीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील देश है क्योंकि यह भारतीय प्लेट (Indian Plate) और यूरेशियाई प्लेट (Eurasian Plate) के संधि क्षेत्र पर स्थित है। इस कारण देश के विभिन्न भागों में भूकम्प की तीव्रता और आवृत्ति भिन्न-भिन्न पाई जाती है।

मुख्य बिंदु:

  • भूकम्पीय विभाजन: भारत को भूकम्प संभाव्यता के आधार पर पाँच क्षेत्रों (Zone I से V) में बाँटा गया है।
  • सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र (Zone V): जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर-पूर्वी राज्य और अंडमान-निकोबार द्वीप।
  • उच्च संवेदनशील क्षेत्र (Zone IV): दिल्ली, बिहार, सिक्किम, पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग, गुजरात का कुछ हिस्सा।
  • मध्यम क्षेत्र (Zone III): महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा और दक्षिण राजस्थान के कुछ भाग।
  • कम संवेदनशील क्षेत्र (Zone II): दक्कन पठार और दक्षिणी भारत के अधिकांश क्षेत्र।
  • कारण: प्लेट विवर्तनिकी, भ्रंश रेखाएँ और पर्वत निर्माण की प्रक्रियाएँ।
  • निवारण उपाय: भूकम्परोधी भवन निर्माण और जन-जागरूकता आवश्यक है।

उपसंहार:

भारत के भूकम्पीय क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से विविध हैं। उचित योजना और तकनीकी उपायों से भूकम्प के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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Explain the inter relationship between climate, soils and vegetation. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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जलवायु, मृदा और वनस्पति के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

जलवायु (Climate), मृदा (Soil) और वनस्पति (Vegetation) एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए प्राकृतिक घटक हैं। ये तीनों मिलकर किसी क्षेत्र की भौगोलिक विशेषता और पारिस्थितिक संतुलन को निर्धारित करते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • जलवायु का प्रभाव: तापमान और वर्षा की मात्रा यह तय करती है कि किस प्रकार की मिट्टी और वनस्पति विकसित होगी।
  • मृदा निर्माण पर जलवायु का प्रभाव: वर्षा और तापमान चट्टानों के अपक्षय (weathering) को प्रभावित करते हैं, जिससे मिट्टी बनती है।
  • वनस्पति पर मृदा का प्रभाव: मृदा की उर्वरता, नमी और बनावट पौधों की वृद्धि को नियंत्रित करती है।
  • जलवायु और वनस्पति का संबंध: आर्द्र जलवायु में सघन वन, जबकि शुष्क क्षेत्रों में झाड़ियाँ और घास पाई जाती हैं।
  • मृदा और जलवायु की पारस्परिक क्रिया: जलवायु मिट्टी को पोषक तत्व देती है, और मिट्टी वनस्पति को पोषण प्रदान करती है।
  • मानव प्रभाव: कृषि, वनों की कटाई और औद्योगिकीकरण से यह संतुलन प्रभावित होता है।
  • पारिस्थितिक संतुलन: इन तीनों का सामंजस्य जीवन और पर्यावरण की स्थिरता के लिए आवश्यक है।

उपसंहार:

इस प्रकार जलवायु, मृदा और वनस्पति एक-दूसरे के पूरक हैं। इनके संतुलित संबंध से ही पृथ्वी पर जीवन का प्राकृतिक चक्र सुचारु रूप से संचालित होता है।

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What is the use of oceans for humans? [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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मनुष्यों के लिए महासागरों का क्या उपयोग है ?

Ans: प्रस्तावना:

महासागर (Oceans) पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग घेरे हुए हैं और मानव जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। वे न केवल जलवायु को संतुलित रखते हैं, बल्कि भोजन, व्यापार और ऊर्जा के प्रमुख स्रोत भी हैं।

मुख्य उपयोग:

  • खाद्य स्रोत: मछली, शैवाल (algae) और अन्य समुद्री जीव भोजन का प्रमुख साधन हैं।
  • खनिज संपदा: पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, नमक और मैग्नीशियम जैसी खनिजें महासागर तल से प्राप्त होती हैं।
  • परिवहन मार्ग: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का लगभग 80% हिस्सा समुद्री मार्गों से होता है।
  • ऊर्जा उत्पादन: ज्वार-भाटा, तरंग और पवन से ऊर्जा प्राप्त की जाती है।
  • जलवायु नियंत्रण: महासागर तापमान और वर्षा चक्र को नियंत्रित कर जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं।
  • पर्यटन और मनोरंजन: तटीय क्षेत्र रोजगार और आय के प्रमुख केंद्र हैं।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान: महासागर जैव विविधता और पर्यावरणीय अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

उपसंहार:

महासागर मानव जीवन के लिए अपरिहार्य हैं — वे हमारी अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और अस्तित्व के आधार हैं। इसलिए इनका संरक्षण मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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What are the ecologically sensitive areas in India? Mention the policies of the Government of India for their protection. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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भारत में पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र कौन-कौन से हैं ? इनके संरक्षण के लिये भारत सरकार की नीतियों का उल्लेख कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारत अपनी भौगोलिक विविधता और जैविक समृद्धि के कारण कई पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Ecologically Sensitive Areas – ESAs) का घर है। ये क्षेत्र पारिस्थितिक संतुलन, जलवायु स्थिरता और जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनके संरक्षण हेतु भारत सरकार ने अनेक नीतियाँ व कानूनी उपाय अपनाए हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र वे होते हैं जहाँ मानव हस्तक्षेप से पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो सकता है।
  • भारत में प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र हैं –
  • पश्चिमी घाट (Western Ghats) – यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, जैव विविधता से समृद्ध।
  • हिमालयी क्षेत्र – हिमनद, नदियों के स्रोत और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र।
  • सुंदरबन डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र।
  • अंडमान-निकोबार द्वीप समूह – समुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध
  • मरुस्थलीय क्षेत्र (थार रेगिस्तान) – शुष्क पारिस्थितिक संतुलन वाला क्षेत्र।
  • पूर्वोत्तर भारत – उच्च वर्षा और घनी वनस्पति वाला पारिस्थितिक क्षेत्र।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत इन क्षेत्रों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।
  • ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) नीति के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों के आसपास सीमित मानवीय गतिविधियाँ अनुमति-प्राप्त होती हैं।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र की निगरानी करता है।
  • CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management Act, 2016) वनों के क्षरण की भरपाई हेतु लागू है।
  • नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज़ हिमालय क्षेत्र के संरक्षण पर केंद्रित है।
  • ग्रीन इंडिया मिशन और राष्ट्रीय कार्य योजना जलवायु परिवर्तन पर (NAPCC) पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को प्रोत्साहित करते हैं।
  • ई-कोरिडोर परियोजनाएँ वन्यजीवों की आवाजाही और आवास संरक्षण के लिए लागू हैं।
  • स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल करने की नीति ने स्थायी परिणाम दिए हैं।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः भारत के पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र न केवल पर्यावरणीय संतुलन के प्रतीक हैं, बल्कि मानव अस्तित्व के लिए भी आवश्यक हैं। सरकार की नीतियाँ यदि वैज्ञानिक दृष्टि और स्थानीय सहभागिता के साथ लागू हों, तो इनका संरक्षण स्थायी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

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Describe the habitat condition, flora and fauna: the three ecozones of Uttar Pradesh. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-6

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उत्तर प्रदेश के तीन पारिस्थितिक क्षेत्रों: आवास स्थिति, वनस्पति और जीव-जन्तुओं का वर्णन कीजिये ।

Ans: परिचय (Introduction):

उत्तर प्रदेश भौगोलिक रूप से विविध राज्य है, जहाँ की पारिस्थितिकी (Ecology) जलवायु, स्थलाकृति और मिट्टी के आधार पर भिन्न-भिन्न रूपों में पाई जाती है। इसे तीन प्रमुख पारिस्थितिक क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है — तराई क्षेत्र, गंगा–यमुना दोआब, और विंध्य क्षेत्र — जिनकी अपनी विशिष्ट आवास स्थिति, वनस्पति और जीव-जंतु हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • तराई क्षेत्र:
  • आवास स्थिति: नेपाल सीमा से लगा आर्द्र और दलदली क्षेत्र, प्रचुर वर्षा और उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी।
  • वनस्पति: साल, सागौन, शीशम, बांस और गन्ने की खेती प्रमुख।
  • जीव-जंतु: बाघ, हाथी, बारहसिंगा, घड़ियाल और गंगा डॉल्फिन यहाँ पाई जाती हैं।
  • गंगा–यमुना दोआब:
  • आवास स्थिति: समतल मैदान, मध्यम वर्षा, सिंचाई सुविधाओं से संपन्न।
  • वनस्पति: कृषि प्रधान क्षेत्र – गेहूँ, गन्ना, चना और सरसों की प्रमुख फसलें।
  • जीव-जंतु: लोमड़ी, सियार, नीलगाय, खरगोश और अनेक पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
  • विंध्य क्षेत्र:
  • आवास स्थिति: पथरीला, ऊँचा-नीचा और शुष्क भूभाग (मिर्जापुर, सोनभद्र)।
  • वनस्पति: झाड़ियों, सागौन, बबूल व तेंदू वृक्षों की अधिकता।
  • जीव-जंतु: तेंदुआ, चीतल, भालू, सर्प और कई पक्षी प्रजातियाँ।

निष्कर्ष (Conclusion): ये तीनों पारिस्थितिक क्षेत्र उत्तर प्रदेश की जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के मूल आधार हैं, जो राज्य की प्राकृतिक संपदा और पर्यावरणीय स्थिरता को बनाए रखते हैं।

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