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What is the use of oceans for humans? [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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मनुष्यों के लिए महासागरों का क्या उपयोग है ?

Ans: प्रस्तावना:

महासागर (Oceans) पृथ्वी की सतह का लगभग 71% भाग घेरे हुए हैं और मानव जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। वे न केवल जलवायु को संतुलित रखते हैं, बल्कि भोजन, व्यापार और ऊर्जा के प्रमुख स्रोत भी हैं।

मुख्य उपयोग:

  • खाद्य स्रोत: मछली, शैवाल (algae) और अन्य समुद्री जीव भोजन का प्रमुख साधन हैं।
  • खनिज संपदा: पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, नमक और मैग्नीशियम जैसी खनिजें महासागर तल से प्राप्त होती हैं।
  • परिवहन मार्ग: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का लगभग 80% हिस्सा समुद्री मार्गों से होता है।
  • ऊर्जा उत्पादन: ज्वार-भाटा, तरंग और पवन से ऊर्जा प्राप्त की जाती है।
  • जलवायु नियंत्रण: महासागर तापमान और वर्षा चक्र को नियंत्रित कर जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं।
  • पर्यटन और मनोरंजन: तटीय क्षेत्र रोजगार और आय के प्रमुख केंद्र हैं।
  • वैज्ञानिक अनुसंधान: महासागर जैव विविधता और पर्यावरणीय अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

उपसंहार:

महासागर मानव जीवन के लिए अपरिहार्य हैं — वे हमारी अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और अस्तित्व के आधार हैं। इसलिए इनका संरक्षण मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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Identify the Ramsar sites of Uttar Pradesh and describe their features. [8 Marks] UPPCS Mains 2024 GS

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उत्तर प्रदेश के रामसर स्थलों को चिह्नित कीजिये एवं उनकी विशेषताओं का वर्णन कीजिये।

Ans:  परिचय:

उत्तर प्रदेश में कई आर्द्रभूमि स्थल (Wetlands) हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय महत्व के कारण रामसर स्थल (Ramsar Sites) घोषित किया गया है। ये स्थल जैव विविधता, जल संरक्षण और प्रवासी पक्षियों के आवास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

मुख्य बिंदु:

  • राज्य में कुल 10 रामसर स्थल हैं जैसे— नवाबगंज, समासपुर, संडी, पार्वती अरण्य, बखिरा, सुरहा ताल, सैंथरी, सम्प्रस, हक्कार और संजय झील।
  • अधिकांश स्थल गंगा और घाघरा नदी तंत्र से जुड़े हैं।
  • यहाँ सारस, पेलिकन, साइबेरियन क्रेन जैसे दुर्लभ पक्षी पाए जाते हैं।
  • ये स्थल भू-जल पुनर्भरण और जलवायु संतुलन में सहायक हैं।
  • स्थानीय मछली पालन और पर्यटन को बढ़ावा देते हैं।
  • कुछ स्थल इको-टूरिज़्म केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।
  • प्रदूषण और अतिक्रमण इनके संरक्षण की मुख्य चुनौती हैं।

निष्कर्ष: रामसर स्थल उत्तर प्रदेश की पर्यावरणीय धरोहर हैं, जिनके संरक्षण से सतत विकास और पारिस्थितिक संतुलन को मजबूती मिलेगी।

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What are the ecologically sensitive areas in India? Mention the policies of the Government of India for their protection. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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भारत में पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र कौन-कौन से हैं ? इनके संरक्षण के लिये भारत सरकार की नीतियों का उल्लेख कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारत अपनी भौगोलिक विविधता और जैविक समृद्धि के कारण कई पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Ecologically Sensitive Areas – ESAs) का घर है। ये क्षेत्र पारिस्थितिक संतुलन, जलवायु स्थिरता और जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनके संरक्षण हेतु भारत सरकार ने अनेक नीतियाँ व कानूनी उपाय अपनाए हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र वे होते हैं जहाँ मानव हस्तक्षेप से पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो सकता है।
  • भारत में प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र हैं –
  • पश्चिमी घाट (Western Ghats) – यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, जैव विविधता से समृद्ध।
  • हिमालयी क्षेत्र – हिमनद, नदियों के स्रोत और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र।
  • सुंदरबन डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र।
  • अंडमान-निकोबार द्वीप समूह – समुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध
  • मरुस्थलीय क्षेत्र (थार रेगिस्तान) – शुष्क पारिस्थितिक संतुलन वाला क्षेत्र।
  • पूर्वोत्तर भारत – उच्च वर्षा और घनी वनस्पति वाला पारिस्थितिक क्षेत्र।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत इन क्षेत्रों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।
  • ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) नीति के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों के आसपास सीमित मानवीय गतिविधियाँ अनुमति-प्राप्त होती हैं।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र की निगरानी करता है।
  • CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management Act, 2016) वनों के क्षरण की भरपाई हेतु लागू है।
  • नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज़ हिमालय क्षेत्र के संरक्षण पर केंद्रित है।
  • ग्रीन इंडिया मिशन और राष्ट्रीय कार्य योजना जलवायु परिवर्तन पर (NAPCC) पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को प्रोत्साहित करते हैं।
  • ई-कोरिडोर परियोजनाएँ वन्यजीवों की आवाजाही और आवास संरक्षण के लिए लागू हैं।
  • स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल करने की नीति ने स्थायी परिणाम दिए हैं।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः भारत के पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र न केवल पर्यावरणीय संतुलन के प्रतीक हैं, बल्कि मानव अस्तित्व के लिए भी आवश्यक हैं। सरकार की नीतियाँ यदि वैज्ञानिक दृष्टि और स्थानीय सहभागिता के साथ लागू हों, तो इनका संरक्षण स्थायी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

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Explain the inter relationship between climate, soils and vegetation. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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जलवायु, मृदा और वनस्पति के अन्तर्सम्बन्धों को स्पष्ट कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

जलवायु (Climate), मृदा (Soil) और वनस्पति (Vegetation) एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए प्राकृतिक घटक हैं। ये तीनों मिलकर किसी क्षेत्र की भौगोलिक विशेषता और पारिस्थितिक संतुलन को निर्धारित करते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • जलवायु का प्रभाव: तापमान और वर्षा की मात्रा यह तय करती है कि किस प्रकार की मिट्टी और वनस्पति विकसित होगी।
  • मृदा निर्माण पर जलवायु का प्रभाव: वर्षा और तापमान चट्टानों के अपक्षय (weathering) को प्रभावित करते हैं, जिससे मिट्टी बनती है।
  • वनस्पति पर मृदा का प्रभाव: मृदा की उर्वरता, नमी और बनावट पौधों की वृद्धि को नियंत्रित करती है।
  • जलवायु और वनस्पति का संबंध: आर्द्र जलवायु में सघन वन, जबकि शुष्क क्षेत्रों में झाड़ियाँ और घास पाई जाती हैं।
  • मृदा और जलवायु की पारस्परिक क्रिया: जलवायु मिट्टी को पोषक तत्व देती है, और मिट्टी वनस्पति को पोषण प्रदान करती है।
  • मानव प्रभाव: कृषि, वनों की कटाई और औद्योगिकीकरण से यह संतुलन प्रभावित होता है।
  • पारिस्थितिक संतुलन: इन तीनों का सामंजस्य जीवन और पर्यावरण की स्थिरता के लिए आवश्यक है।

उपसंहार:

इस प्रकार जलवायु, मृदा और वनस्पति एक-दूसरे के पूरक हैं। इनके संतुलित संबंध से ही पृथ्वी पर जीवन का प्राकृतिक चक्र सुचारु रूप से संचालित होता है।

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Write a note on seismic zones of India. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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भारत के भूकम्पीय क्षेत्रों पर टिप्पणी लिखिए ।

Ans: प्रस्तावना:

भारत भूकम्पीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील देश है क्योंकि यह भारतीय प्लेट (Indian Plate) और यूरेशियाई प्लेट (Eurasian Plate) के संधि क्षेत्र पर स्थित है। इस कारण देश के विभिन्न भागों में भूकम्प की तीव्रता और आवृत्ति भिन्न-भिन्न पाई जाती है।

मुख्य बिंदु:

  • भूकम्पीय विभाजन: भारत को भूकम्प संभाव्यता के आधार पर पाँच क्षेत्रों (Zone I से V) में बाँटा गया है।
  • सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र (Zone V): जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर-पूर्वी राज्य और अंडमान-निकोबार द्वीप।
  • उच्च संवेदनशील क्षेत्र (Zone IV): दिल्ली, बिहार, सिक्किम, पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग, गुजरात का कुछ हिस्सा।
  • मध्यम क्षेत्र (Zone III): महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा और दक्षिण राजस्थान के कुछ भाग।
  • कम संवेदनशील क्षेत्र (Zone II): दक्कन पठार और दक्षिणी भारत के अधिकांश क्षेत्र।
  • कारण: प्लेट विवर्तनिकी, भ्रंश रेखाएँ और पर्वत निर्माण की प्रक्रियाएँ।
  • निवारण उपाय: भूकम्परोधी भवन निर्माण और जन-जागरूकता आवश्यक है।

उपसंहार:

भारत के भूकम्पीय क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से विविध हैं। उचित योजना और तकनीकी उपायों से भूकम्प के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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