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What are the ecologically sensitive areas in India? Mention the policies of the Government of India for their protection. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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भारत में पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र कौन-कौन से हैं ? इनके संरक्षण के लिये भारत सरकार की नीतियों का उल्लेख कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारत अपनी भौगोलिक विविधता और जैविक समृद्धि के कारण कई पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Ecologically Sensitive Areas – ESAs) का घर है। ये क्षेत्र पारिस्थितिक संतुलन, जलवायु स्थिरता और जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनके संरक्षण हेतु भारत सरकार ने अनेक नीतियाँ व कानूनी उपाय अपनाए हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र वे होते हैं जहाँ मानव हस्तक्षेप से पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो सकता है।
  • भारत में प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र हैं –
  • पश्चिमी घाट (Western Ghats) – यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, जैव विविधता से समृद्ध।
  • हिमालयी क्षेत्र – हिमनद, नदियों के स्रोत और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र।
  • सुंदरबन डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र।
  • अंडमान-निकोबार द्वीप समूह – समुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध
  • मरुस्थलीय क्षेत्र (थार रेगिस्तान) – शुष्क पारिस्थितिक संतुलन वाला क्षेत्र।
  • पूर्वोत्तर भारत – उच्च वर्षा और घनी वनस्पति वाला पारिस्थितिक क्षेत्र।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत इन क्षेत्रों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।
  • ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) नीति के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों के आसपास सीमित मानवीय गतिविधियाँ अनुमति-प्राप्त होती हैं।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र की निगरानी करता है।
  • CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management Act, 2016) वनों के क्षरण की भरपाई हेतु लागू है।
  • नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज़ हिमालय क्षेत्र के संरक्षण पर केंद्रित है।
  • ग्रीन इंडिया मिशन और राष्ट्रीय कार्य योजना जलवायु परिवर्तन पर (NAPCC) पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को प्रोत्साहित करते हैं।
  • ई-कोरिडोर परियोजनाएँ वन्यजीवों की आवाजाही और आवास संरक्षण के लिए लागू हैं।
  • स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल करने की नीति ने स्थायी परिणाम दिए हैं।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः भारत के पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र न केवल पर्यावरणीय संतुलन के प्रतीक हैं, बल्कि मानव अस्तित्व के लिए भी आवश्यक हैं। सरकार की नीतियाँ यदि वैज्ञानिक दृष्टि और स्थानीय सहभागिता के साथ लागू हों, तो इनका संरक्षण स्थायी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

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Discuss the characteristics, causes and effects of Tsunami with example. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-1

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सुनामी की विशेषताओं, कारणों एवं प्रभावों का सोदाहरण विवेचन प्रस्तुत कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

सुनामी समुद्र की गहराइयों में उत्पन्न होने वाली तीव्र ऊर्जा का परिणाम होती है, जो विशाल तरंगों के रूप में तटों की ओर बढ़ती है। यह प्राकृतिक आपदा अचानक और व्यापक विनाश करने की क्षमता रखती है। इसके कारण और प्रभाव भौगोलिक, भूवैज्ञानिक तथा मानवीय पहलुओं से गहराई से जुड़े होते हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points) :

  • समुद्र तल में अचानक ऊर्जा विस्फोट—जैसे भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, भू-स्खलन आदि—सुनामी का प्रमुख कारण होता है।
  • अधिकांश सुनामी समुद्र के नीचे आने वाले टेक्टॉनिक भूकंपों से उत्पन्न होती हैं।
  • समुद्र में उठने वाली तरंगों की गति 700–800 किमी/घंटा तक पहुँच सकती है।
  • गहरे समुद्र में तरंगों की ऊँचाई कम होती है, जिससे वे दिखाई नहीं देतीं।
  • तटीय क्षेत्रों के पास पहुँचने पर जल की गहराई कम होने से तरंगों की ऊँचाई अचानक कई मीटर तक बढ़ जाती है।
  • सुनामी की तरंगें एकल नहीं होतीं; वे कई तरंगों की श्रृंखला के रूप में आती हैं।
  • सुनामी तट पर पहुंचकर बड़े पैमाने पर जन-हानि और संपत्ति क्षति का कारण बनती है।
  • तटीय पारिस्थितिकी तंत्र—जैसे मैंग्रोव, कोरल रीफ और समुद्री जैव विविधता—पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है।
  • पेयजल स्रोतों में खारे पानी के मिल जाने से जल-उपलब्धता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।
  • सड़क, बंदरगाह, पुल, विद्युत और संचार जैसी आधारभूत संरचनाएँ व्यापक रूप से नष्ट हो जाती हैं।
  • सुनामी के बाद स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ—जैसे पानी से फैलने वाली बीमारियाँ—बढ़ने का खतरा रहता है।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, तटीय सुरक्षा संरचनाएँ और सामुदायिक जागरूकता से इसके प्रभावों को कम किया जा सकता है।

निष्कर्ष : सुनामी एक जटिल प्राकृतिक घटना है जिसका प्रभाव मानव जीवन, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर गहरा पड़ता है। समुचित तैयारी, वैज्ञानिक समझ और चेतावनी तंत्र ही इसके विनाशकारी प्रभावों को न्यूनतम कर सकते हैं।

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Divide the geographical regions of Uttar Pradesh and explain their geographical, economic and cultural significance. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-6

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उत्तर प्रदेश को भौगोलिक प्रदेशों में विभक्त कीजिए और इनके भौगोलिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व को समझाइये ।

Ans: परिचय (Introduction):

उत्तर प्रदेश भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विविध राज्य है। इसकी स्थलाकृति, जलवायु और मिट्टी की भिन्नता के आधार पर इसे चार प्रमुख भौगोलिक प्रदेशों में बाँटा गया है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • तराई एवं भावर प्रदेश:
  • स्थान: नेपाल सीमा के समानांतर फैला क्षेत्र।
  • भौगोलिक महत्त्व: जलोढ़ मिट्टी, घने वन और नमी युक्त जलवायु।
  • आर्थिक महत्त्व: धान, गन्ना उत्पादन और पशुपालन के लिए उपयुक्त।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: थारू व स्थानीय जनजातीय संस्कृति प्रमुख।
  • गंगा–यमुना दोआब:
  • भौगोलिक महत्त्व: समतल मैदान और उपजाऊ मिट्टी।
  • आर्थिक महत्त्व: गन्ना, गेहूँ उत्पादन तथा कानपुर, मेरठ जैसे औद्योगिक नगर।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: प्रयागराज धार्मिक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध।
  • अवध–बुंदेलखंड पठार:
  • भौगोलिक महत्त्व: मिश्रित भू-आकृतियाँ और मध्यम उपजाऊ मिट्टी।
  • आर्थिक महत्त्व: कृषि, हस्तशिल्प व खनन।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: अवध की नवाबी संस्कृति और बुंदेलखंड की लोक परंपराएँ।
  • विंध्य प्रदेश:
  • भौगोलिक महत्त्व: पहाड़ी व वनाच्छादित क्षेत्र (सोनभद्र, मिर्जापुर)।
  • आर्थिक महत्त्व: कोयला, चूना पत्थर जैसे खनिजों से समृद्ध।
  • सांस्कृतिक महत्त्व: मंदिर, लोकनृत्य और जनजातीय जीवन।

निष्कर्ष (Conclusion): ये चारों प्रदेश उत्तर प्रदेश की भौगोलिक विविधता, आर्थिक आधार और सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं।

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Write a note on seismic zones of India. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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भारत के भूकम्पीय क्षेत्रों पर टिप्पणी लिखिए ।

Ans: प्रस्तावना:

भारत भूकम्पीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील देश है क्योंकि यह भारतीय प्लेट (Indian Plate) और यूरेशियाई प्लेट (Eurasian Plate) के संधि क्षेत्र पर स्थित है। इस कारण देश के विभिन्न भागों में भूकम्प की तीव्रता और आवृत्ति भिन्न-भिन्न पाई जाती है।

मुख्य बिंदु:

  • भूकम्पीय विभाजन: भारत को भूकम्प संभाव्यता के आधार पर पाँच क्षेत्रों (Zone I से V) में बाँटा गया है।
  • सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र (Zone V): जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर-पूर्वी राज्य और अंडमान-निकोबार द्वीप।
  • उच्च संवेदनशील क्षेत्र (Zone IV): दिल्ली, बिहार, सिक्किम, पश्चिम बंगाल के उत्तरी भाग, गुजरात का कुछ हिस्सा।
  • मध्यम क्षेत्र (Zone III): महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा और दक्षिण राजस्थान के कुछ भाग।
  • कम संवेदनशील क्षेत्र (Zone II): दक्कन पठार और दक्षिणी भारत के अधिकांश क्षेत्र।
  • कारण: प्लेट विवर्तनिकी, भ्रंश रेखाएँ और पर्वत निर्माण की प्रक्रियाएँ।
  • निवारण उपाय: भूकम्परोधी भवन निर्माण और जन-जागरूकता आवश्यक है।

उपसंहार:

भारत के भूकम्पीय क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से विविध हैं। उचित योजना और तकनीकी उपायों से भूकम्प के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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Describe the geographical distribution and characteristics of main types of natural vegetation found in Uttar Pradesh. [8 Marks] UPPCS Mains 2024 GS-6

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उत्तर प्रदेश में पायी जाने वाली प्रमुख प्राकृतिक वनस्पतियों के भौगोलिक वितरण एवं विशेषताओं का वर्णन करें।

Ans: परिचय:

 उत्तर प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पतियाँ राज्य के जलवायु, वर्षा और स्थलाकृति पर निर्भर करती हैं। यहाँ की वनस्पतियाँ उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों से लेकर काँटेदार झाड़ियों तक विविध प्रकार की हैं, जो राज्य के पारिस्थितिक संतुलन में योगदान देती हैं।

मुख्य बिंदु:

  • राज्य का लगभग 6.5% क्षेत्र वनाच्छादित है।
  • तराई और पूर्वी यूपी में घने नमीदार साल, सागौन, शीशम जैसे वृक्ष पाए जाते हैं।
  • मध्य प्रदेश सीमा से लगे बुंदेलखंड क्षेत्र में काँटेदार झाड़ियाँ व बबूल प्रमुख हैं।
  • गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में कृषि प्रधान भूमि के कारण प्राकृतिक वन कम हैं।
  • सोनभद्र और मिर्जापुर के पहाड़ी क्षेत्रों में सूखे पर्णपाती वन मिलते हैं।
  • तराई क्षेत्र के दलदली वन में बांस, सरकंडा, और ताड़ प्रमुख हैं।
  • वनस्पतियाँ जैव विविधता, मृदा संरक्षण और जलवायु संतुलन में सहायक हैं।

निष्कर्ष: उत्तर प्रदेश की वनस्पतियाँ राज्य की भौगोलिक विविधता का प्रतिबिंब हैं। इनके संरक्षण से पर्यावरणीय स्थिरता और सतत विकास सुनिश्चित होता है।

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