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What are the salient features of the architecture of Uttar Pradesh? Describe its key elements and styles.(12 marks) UPPCS Mains 2024 GS-5

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उत्तर प्रदेश की वास्तुकला की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं ? इसके प्रमुख तत्त्वों और शैलियों का वर्णन कीजिए ।

Ans:  परिचय (Introduction):

उत्तर प्रदेश की वास्तुकला (Architecture) भारतीय कला और संस्कृति का अद्भुत संगम है। यहाँ की इमारतें विभिन्न कालों — मौर्य, गुप्त, मुगल और ब्रिटिश — की स्थापत्य शैली को दर्शाती हैं। यह क्षेत्र धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है।

मुख्य विशेषताएँ और तत्व:

• मौर्य काल में अशोक स्तंभ और स्तूप जैसे स्थापत्य का विकास हुआ (जैसे सारनाथ स्तूप)।

• गुप्त काल में मंदिर निर्माण की उत्कृष्ट परंपरा आरंभ हुई — सादगी और संतुलन इसका आधार था।

• मुगल काल में लाल पत्थर और संगमरमर का व्यापक उपयोग हुआ।

• गुम्बद, मेहराब और मीनारें इस काल की प्रमुख पहचान बनीं।

• लखनऊ की नवाबी वास्तुकला में फारसी, मुगल और यूरोपीय प्रभाव देखा जाता है।

• बड़ा इमामबाड़ा और रूमी दरवाज़ा इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं।

• काशी, अयोध्या और मथुरा में धार्मिक वास्तुकला का उत्कर्ष देखने को मिलता है।

• ब्रिटिश काल में औपनिवेशिक भवन जैसे इलाहाबाद हाईकोर्ट और कचहरी बने।

• मंदिर वास्तुकला में नागर शैली प्रमुख रही।

• राजसी इमारतों में नक्काशी, झरोखे और जालियों का प्रयोग हुआ।

• जल संरचनाएँ (घाट, कुएँ, बावड़ियाँ) स्थानीय जीवन का अभिन्न हिस्सा थीं।

• स्थापत्य में सौंदर्य, धर्म और उपयोगिता का समन्वय देखने को मिलता है।

निष्कर्ष (Conclusion ):

उत्तर प्रदेश की वास्तुकला भारतीय इतिहास का जीवंत प्रतिबिंब है। यह न केवल कला की परंपरा बल्कि सांस्कृतिक एकता और विविधता का प्रतीक भी है।

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What was the policy of the British Government towards the Talukdars of Awadh after the revolution of 1857? Marks-8 UPPCS Mains 2024 GS-5

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सन् 1857 की क्रांति के पश्चात् ब्रिटिश सरकार की अवध के तालुकादारों के प्रति क्या नीति थी ?      

Ans: परिचय (Introduction) –

सन् 1857 की क्रांति में अवध के तालुकादारों ने सक्रिय रूप से भाग लिया था, जिससे ब्रिटिश शासन को भारी चुनौती मिली। क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपने प्रशासनिक नियंत्रण को मज़बूत करने हेतु नई नीतियाँ अपनाईं। इन नीतियों का उद्देश्य तालुकादारों को शांत करना और उन्हें शासन का सहयोगी बनाना था।

मुख्य बिंदु (Important Points) –

  • ब्रिटिशों ने आरंभिक दंडात्मक नीति छोड़कर समझौता नीति अपनाई।
  • कई तालुकादारों की जमींदारियाँ पुनः बहाल की गईं।
  • उन्हें राजस्व वसूली का अधिकार दिया गया ताकि वे शासन के प्रति निष्ठावान रहें।
  • भूमि सुधारों के माध्यम से किसानों पर नियंत्रण बनाए रखा गया।
  • तालुकादारों को स्थानीय प्रशासन में प्रमुख भूमिका दी गई।
  • अंग्रेजों ने उन्हें राजनीतिक रूप से आश्रित वर्ग बना दिया।
  • इस नीति से ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रिटिश प्रभुत्व सुदृढ़ हुआ।

निष्कर्ष (Conclusion) –

 क्रांति के बाद की नीति ने तालुकादारों को ब्रिटिश शासन का सहयोगी बना दिया। इससे अंग्रेजों ने अवध में स्थिरता तो पाई, पर किसानों का शोषण बढ़ता गया।

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Outline the development of revolutionary movement in Bengal. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-1

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बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन के विकास को रेखांकित कीजिए ।

Ans: भूमिका (Introduction):

बंगाल भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन का सबसे सशक्त केन्द्र रहा। प्रारम्भ में यह आन्दोलन राजनीतिक असंतोष से प्रेरित था, परंतु शीघ्र ही यह सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम में बदल गया। बंगाल के युवाओं ने संगठन, बलिदान और साहस से आज़ादी के संघर्ष को नई दिशा दी।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • 1905 में बंग-भंग (Partition of Bengal) के विरोध ने क्रान्तिकारी गतिविधियों की भूमि तैयार की।
  • अनुशीलन समिति (1906) की स्थापना ने संगठित क्रान्तिकारी आन्दोलन की शुरुआत की।
  • अरविन्द घोष और बारिन्द्र घोष ने युवाओं को देशभक्ति और सशस्त्र क्रान्ति के लिए प्रेरित किया।
  • युगान्तर और संध्या जैसे पत्रों ने जन-जागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • 1908 का अलीपुर बम काण्डबंगाल के आन्दोलन का निर्णायक मोड़ बना।
  • खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी जैसे युवाओं ने बलिदान से राष्ट्र को झकझोर दिया।
  • 1912 का हार्डिंग बम काण्ड ने आन्दोलन को अखिल भारतीय स्वरूप दिया।
  • प्रथम विश्वयुद्ध के समय जर्मनी के सहयोग से गदर व अनुशीलन समिति ने विद्रोह की योजना बनाई।
  • 1915 के बाद आन्दोलन भूमिगत होकर गुप्त संगठनों में जारी रहा।
  • रासबिहारी बोस और जतिन मुखर्जी (बाघा जतिन) ने राष्ट्रीय क्रान्ति की रूपरेखा तैयार की।
  • 1920 के बाद गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन से कई क्रान्तिकारी राष्ट्रीय धारा में जुड़े।
  • बंगाल के इस आन्दोलन ने अगली पीढ़ी के क्रान्तिकारियों (जैसे भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद) को प्रेरित किया।

निष्कर्ष (Conclusion):

बंगाल का क्रान्तिकारी आन्दोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा था। इसने पूरे देश में देशभक्ति, साहस और बलिदान की लौ प्रज्वलित कर स्वतंत्रता की नींव को सुदृढ़ किया।

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What are the main features of Sangam Period Culture? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-1

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संगमकालीन संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ क्या है ?

Ans: भूमिका (Introduction):

संगमकाल (लगभग 300 ई.पू. से 300 ई.) दक्षिण भारत के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण काल था। इस समय तमिल भाषा, साहित्य, समाज और संस्कृति का अद्भुत विकास हुआ। संगमकालीन संस्कृति जीवन के विविध पक्षों – धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक – का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • साहित्यिक उत्कर्ष: ‘संगम साहित्य’ में प्रेम, युद्ध, नीति, और समाज के वास्तविक चित्रण मिलते हैं।
  • भाषा का विकास: तमिल भाषा का शुद्ध और परिष्कृत रूप इसी काल में उभरा।
  • राजनीतिक जीवन: छोटे-छोटे चेर, चोल और पांड्य राज्यों का शासन प्रमुख था।
  • समाज व्यवस्था: समाज जातिगत न होकर व्यवसाय और गुणों पर आधारित था।
  • महिलाओं की स्थिति: महिलाओं को शिक्षा और सम्मान प्राप्त था; अव्वैयार जैसी कवयित्रियाँ प्रसिद्ध थीं।
  • आर्थिक जीवन: कृषि, व्यापार और समुद्री वाणिज्य अत्यंत उन्नत था; रोम तक व्यापारिक सम्बन्ध थे।
  • धार्मिक जीवन: लोग शैव, वैष्णव, मुरुगन और मातृदेवी की उपासना करते थे।
  • नैतिक मूल्य: वीरता, प्रेम और दानशीलता को सर्वोच्च गुण माना गया।
  • कला और स्थापत्य: संगीत, नृत्य और चित्रकला का उल्लेख संगम ग्रंथों में मिलता है।
  • शहरीकरण: नगरों में सुव्यवस्थित बाजार, सड़कें और सामाजिक संस्थाएँ विकसित थीं।
  • लोक संस्कृति: उत्सव, नृत्य और लोकगीत सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग थे।
  • राजनयिक सम्बन्ध: विदेशी व्यापार और सांस्कृतिक सम्पर्क से समाज उदार व प्रगतिशील बना।

निष्कर्ष (Conclusion): संगमकालीन संस्कृति ने दक्षिण भारत को साहित्य, कला और सामाजिक चेतना का केन्द्र बनाया। यह काल भारतीय संस्कृति के स्थानीय और सार्वभौमिक मूल्यों के संगम का प्रतीक माना जाता है।

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Give an account of the challenges faced by India immediately after Independence. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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स्वतन्त्रता के तुरंत बाद भारत के समक्ष चुनौतियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। देश विभाजन से उपजी समस्याओं और नवगठित लोकतांत्रिक व्यवस्था ने प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा ली। राष्ट्र निर्माण का यह दौर भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला सिद्ध हुआ।

मुख्य बिंदु:

  • देश का विभाजन और शरणार्थियों का पुनर्वास सबसे बड़ी चुनौती थी।
  • साम्प्रदायिक दंगों ने सामाजिक एकता को खतरे में डाला।
  • रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया कठिन और जटिल थी।
  • गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता गंभीर समस्या बनी।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचनाओं का अभाव विकास में बाधक था।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना और स्थायित्व आवश्यक था।
  • सीमाओं पर सुरक्षा और पड़ोसी देशों से संबंध स्थिर करना जरूरी था।

उपसंहार:

इन चुनौतियों के बावजूद भारत ने दृढ़ संकल्प और लोकतांत्रिक मूल्यों के बल पर प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाया। स्वतंत्रता के बाद की यह यात्रा भारत की सहनशीलता और एकता का प्रतीक बनी।

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Was the ‘Bhoodan Movement’ a part of land reforms in India ? Discuss its major effects. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-3

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‘भूदान आन्दोलन’ भारत में भूमि सुधार का एक हिस्सा था ? इसके प्रमुख प्रभावों की विवेचना कीजिये ।

Ans: परिचय (Introduction):

‘भूदान आन्दोलन’ (Bhoodan Movement) की शुरुआत 1951 में आचार्य विनोबा भावे ने की थी, जिसका उद्देश्य भूमिहीन किसानों को स्वेच्छा से दान में भूमि दिलाना था। यह आंदोलन अहिंसा और स्वैच्छिक सहयोग पर आधारित था।

मुख्य प्रभाव (Key Impacts):

  • भूमि सुधार का नैतिक पहलू – यह आंदोलन कानूनी न होकर नैतिक भूमि पुनर्वितरण का माध्यम बना।
  • भूमिहीनों को भूमि प्राप्ति – लाखों एकड़ भूमि दान में मिलने से गरीब किसानों को जमीन मिली।
  • सामाजिक समरसता – जमींदारों और किसानों के बीच संबंधों में सुधार हुआ।
  • ग्राम स्वराज की भावना – गांवों में आत्मनिर्भरता और सहयोग की भावना को बढ़ावा मिला।
  • सरकारी भूमि सुधारों पर प्रभाव – इस आंदोलन ने सरकार को भूमि सुधार नीतियाँ अपनाने के लिए प्रेरित किया।
  • सीमित सफलता – कई मामलों में दान की गई भूमि कानूनी या उपयोगी नहीं थी।
  • आन्दोलन का प्रसार – बाद में ग्रामदान, संपत्तिदान जैसे आंदोलनों में भी विस्तार हुआ।

निष्कर्ष (Conclusion):

भूदान आन्दोलन को भारत में भूमि सुधार का नैतिक व सामाजिक अंग कहा जा सकता है। यद्यपि इसकी सीमाएँ थीं, परंतु इसने ग्रामीण चेतना और समानता की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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Introduce the literary sources for the study of Ancient Indian History. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए साहित्यिक स्रोत का परिचय दीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में साहित्यिक स्रोत (Literary Sources) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये उस काल की सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति का ज्ञान कराते हैं। ये स्रोत हमें भारत की सभ्यता और संस्कृति की निरंतरता को समझने में सहायता देते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • वैदिक साहित्य – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद से आरंभिक आर्यों के जीवन का ज्ञान।
  • उपनिषद – दार्शनिक विचारों और आत्मा-परमात्मा के संबंध की व्याख्या।
  • महाकाव्य – रामायण और महाभारत से राजनैतिक, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की जानकारी।
  • बौद्ध ग्रंथ – त्रिपिटक से मौर्यकालीन समाज और धर्म का चित्रण।
  • जैन ग्रंथ – आगम से श्रमण परंपरा और गणराज्य व्यवस्था की जानकारी।
  • संस्कृत नाटक एवं काव्य – कालिदास जैसे कवियों से गुप्तकालीन संस्कृति का परिचय।
  • विदेशी यात्रियों के वृत्तांत – मेगस्थनीज़, फाह्यान आदि से ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि।

उपसंहार:

इस प्रकार साहित्यिक स्रोत प्राचीन भारत के विविध पक्षों को उजागर करते हैं। ये इतिहास की आधारशिला हैं, जो हमें अतीत से वर्तमान तक की सांस्कृतिक यात्रा दिखाते हैं।

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“Nepolian was the son of the Revolution.” – Explain. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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“नेपोलियन क्रान्ति का पुत्र था ।” – व्याख्या कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

“नेपोलियन क्रांति का पुत्र था” (Napoleon was the child of the Revolution) – यह कथन इस तथ्य को दर्शाता है कि नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Bonaparte) का उदय फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) के परिणामस्वरूप हुआ। क्रांति ने जिस समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व (Liberty, Equality, Fraternity) की भावना को जन्म दिया, उसी वातावरण ने नेपोलियन को शक्ति और अवसर प्रदान किए।

व्याख्या:

  • फ्रांसीसी क्रांति (1789) ने राजशाही का अंत कर समानता व योग्यता के आधार पर उन्नति का मार्ग खोला।
  • नेपोलियन, जो एक सामान्य सैनिक था, इसी क्रांतिकारी व्यवस्था के कारण उच्च पदों तक पहुँचा।
  • उसने क्रांति के सिद्धांतों — समान अधिकार, विधि का शासन और धार्मिक सहिष्णुता — को अपने प्रशासन में लागू किया।
  • नेपोलियनिक कोड (Napoleonic Code) ने नागरिक समानता और संपत्ति के अधिकार को कानूनी रूप दिया।
  • हालांकि बाद में उसने सम्राट बनकर निरंकुश शासन स्थापित किया, फिर भी उसकी नीतियों में क्रांति की छाप बनी रही।

उपसंहार:

इस प्रकार नेपोलियन वास्तव में क्रांति की उपज था — उसने उसके आदर्शों को आगे बढ़ाया और यूरोप में आधुनिक शासन की नींव रखी। अतः उचित ही कहा गया है कि “नेपोलियन क्रांति का पुत्र था।”

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