Critically examine the increasing powers and role of Prime Minister. How does it impact other institutions ? [Marks-12] UPPCS Mains 2023 GS-2
प्रधानमंत्री की बढ़ती शक्तियों और भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण करें। अन्य संस्थाओं पर इसका कैसे प्रभाव पडता है ?
Ans: परिचय:
भारत में प्रधानमंत्री संसदीय लोकतंत्र का प्रमुख स्तंभ हैं। समय के साथ प्रधानमंत्री की शक्तियाँ और भूमिका काफी बढ़ी हैं, जिससे वे शासन का वास्तविक केंद्र बन गए हैं। परंतु इस शक्ति-संतुलन ने अन्य संस्थाओं की स्वायत्तता पर भी प्रभाव डाला है।
मुख्य बिंदु:
- प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद के नेता होते हैं और सरकार की नीतियों की दिशा तय करते हैं।
- वे मंत्रियों की नियुक्ति, पदमुक्ति एवं कार्य-विभाजन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
- नीति-निर्माण एवं प्रशासनिक निर्णयों में अंतिम अधिकार प्रायः प्रधानमंत्री के पास होता है।
- संसद में बहुमत पर उनका नियंत्रण उन्हें अत्यधिक राजनीतिक शक्ति प्रदान करता है।
- कैबिनेट का कार्य प्रायः ‘प्रधानमंत्री-केंद्रित’ हो गया है, जिसे “प्रधानमंत्री शासन” कहा जाता है।
- प्रधानमंत्री का मीडिया, जनमत और नौकरशाही पर भी प्रभाव बढ़ा है।
- पार्टी संगठन पर मजबूत पकड़ होने से वे राजनीतिक एजेंडा तय करते हैं।
- विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत भूमिका निर्णायक हो गई है।
- राष्ट्रपति की संवैधानिक भूमिका व्यवहार में प्रतीकात्मक रह गई है।
- संसद की भूमिका सीमित हो गई है क्योंकि अधिकांश निर्णय मंत्रिपरिषद द्वारा लिए जाते हैं।
- संघीय ढाँचे में राज्यों पर केंद्र का नियंत्रण बढ़ा है, जिससे ‘सहकारी संघवाद’ कमजोर पड़ता है।
- न्यायपालिका और मीडिया पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव देखने को मिलता है, जिससे संस्थागत संतुलन प्रभावित होता है।
निष्कर्ष :
प्रधानमंत्री की बढ़ती शक्तियाँ शासन की स्थिरता और निर्णायकता के लिए उपयोगी हैं। परंतु लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने के लिए अन्य संस्थाओं की स्वतंत्रता और जवाबदेही भी समान रूप से आवश्यक है।
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