Polity

Home Polity

Analyze the statement, “State legislatures are often seen as the voice of the states within India’s federal structure.” [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

0

इस कथन का विश्लेषण कीजिए, “राज्य विधान-मंडलों को अक्सर भारत के संघीय ढाँचे के भीतर राज्यों की आवाज के रूप में देखा जाता है।”

Ans: परिचय (Introduction ):

भारत का संविधान संघीय (Federal) शासन प्रणाली पर आधारित है, जिसमें केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन है। राज्य विधान-मंडल (State Legislature) राज्य स्तर पर जनता की प्रतिनिधि संस्था है। इसे भारत के संघीय ढाँचे में राज्यों की आवाज़ के रूप में देखा जाता है क्योंकि यह राज्य की नीतियों, हितों और आवश्यकताओं को अभिव्यक्त करता है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • भारत में 28 राज्यों में से अधिकांश के पास द्विसदनीय (Bicameral) या एकसदनीय (Unicameral) विधान-मंडल है।
  • विधान सभा (Legislative Assembly) राज्य की निचली सदन है, जो प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुनी जाती है।
  • विधान परिषद (Legislative Council) ऊपरी सदन है, जो विभिन्न सामाजिक समूहों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है।
  • राज्य विधान-मंडल राज्य की नीतियों, कानूनों और बजट को निर्धारित करता है।
  • यह केन्द्र की नीतियों पर भी चर्चा कर राज्य के दृष्टिकोण को सामने लाता है।
  • संघीय ढाँचे में यह संस्था राज्यों की स्वायत्तता को सुदृढ़ करती है।
  • विधान सभा राज्य सरकार की कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है।
  • यह केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में संतुलन बनाए रखने का माध्यम है।
  • विधान परिषद् शिक्षाविदों, स्नातकों व शिक्षकों की राय को अभिव्यक्त करने का मंच है।
  • यह राज्य की समस्याओं और आकांक्षाओं को केन्द्र तक पहुँचाने का कार्य करती है।
  • राज्य विधान-मंडल के माध्यम से राज्य के नागरिक सीधे शासन प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
  • यह संघीय लोकतंत्र की आत्मा – ‘राज्यों की भागीदारी’ को मूर्त रूप देती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

इस प्रकार राज्य विधान-मंडल भारत के संघीय ढाँचे में राज्यों की लोकतांत्रिक आवाज़ के रूप में कार्य करता है। यह न केवल राज्य के हितों की रक्षा करता है, बल्कि केन्द्र और राज्यों के बीच सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को भी सुदृढ़ बनाता है।

Attempt this question in your own words and language,
Use mobile to scan image and upload in comments section below.

What are the implications of the revised appointment process of Election Commission for ensuring its independence? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

0

चुनाव आयोग की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करने के लिए उसकी संशोधित नियुक्ति प्रक्रिया के निहितार्थ क्या हैं ?

Ans: परिचय (Introduction):

भारत में चुनाव आयोग (Election Commission of India) लोकतंत्र की निष्पक्षता और पारदर्शिता का प्रमुख आधार है। इसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए अत्यंत आवश्यक है। हाल ही में आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में संशोधन किए गए हैं, जिनके गहरे निहितार्थ लोकतांत्रिक संतुलन पर पड़े हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • पूर्व में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में स्वतंत्र चयन समिति का सुझाव दिया था।
  • इसके अनुसार चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल होने थे।
  • सरकार ने संशोधन कर मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय मंत्री को सदस्य बनाया।
  • यह संशोधन कार्यपालिका (Executive) के प्रभाव को बढ़ाता है।
  • इससे आयोग की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर प्रश्न उठे हैं।
  • विपक्ष और नागरिक संगठनों ने इसे “संवैधानिक संस्थाओं के राजनीतिकरण” की दिशा में कदम बताया।
  • सरकार का तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 324 की भावना के अनुरूप है।
  • आयोग की स्वतंत्रता उसकी विश्वसनीयता और चुनावों की निष्पक्षता के लिए अनिवार्य है।
  • न्यायपालिका की उपस्थिति चयन प्रक्रिया को संतुलित और पारदर्शी बनाती थी।
  • संशोधित प्रक्रिया से शक्तियों का केंद्रीकरण बढ़ने का खतरा है।
  • दीर्घकाल में यह लोकतंत्र के संस्थागत ढाँचे को प्रभावित कर सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

संशोधित नियुक्ति प्रक्रिया ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। लोकतंत्र की सुदृढ़ता के लिए आवश्यक है कि आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पूर्णतः निष्पक्ष, संतुलित और पारदर्शी बनी रहे।

Attempt this question in your own words and language,
Use mobile to scan image and upload in comments section below.

What role can the Finance Commission play in addressing regional disparities in India and what measures has it taken so far? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

0

भारत में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने में वित्त आयोग क्या भूमिका निभा सकता है और इसने अब तक क्या उपाय किए हैं ?

Ans: परिचय (Introduction):

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में क्षेत्रीय असमानताएँ (Regional Inequalities) एक प्रमुख चुनौती हैं। इन असमानताओं को कम करने में वित्त आयोग (Finance Commission) की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह आयोग केन्द्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के न्यायसंगत वितरण के माध्यम से संतुलित विकास सुनिश्चित करता है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • वित्त आयोग का गठन अनुच्छेद 280 के तहत हर पाँच वर्ष में किया जाता है।
  • इसका मुख्य कार्य केन्द्र और राज्यों के बीच राजस्व विभाजन (Tax Devolution) निर्धारित करना है।
  • आयोग वित्तीय संसाधनों का ऐसा वितरण करता है जिससे पिछड़े राज्यों को अधिक सहायता मिल सके।
  • यह राज्यों की वित्तीय क्षमता और आवश्यकताओं का तुलनात्मक मूल्यांकन करता है।
  • आयोग राज्यों की जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्रफल, आय स्तर और राजकोषीय अनुशासन जैसे मानदंडों को ध्यान में रखता है।
  • 14वें वित्त आयोग ने राज्यों को कुल कर राजस्व का 42% हिस्सा देने की अनुशंसा की, जिससे राज्यों की स्वायत्तता बढ़ी।
  • 15वें वित्त आयोग ने राज्यों के प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन (Performance-based incentives) को जोड़ा।
  • विशेष सहायता पूर्वोत्तर, पहाड़ी और आकांक्षी जिलों के लिए दी गई।
  • आयोग ने आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अनुदान देने की व्यवस्था की।
  • इसने राज्यों के वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता को बढ़ावा दिया।
  • आयोग की सिफारिशों से क्षेत्रीय संतुलन की दिशा में ठोस प्रगति हुई है।
  • फिर भी, राज्य-स्तरीय नीति कार्यान्वयन में असमानताएँ बनी हुई हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

वित्त आयोग भारत में वित्तीय समानता और क्षेत्रीय संतुलन का प्रमुख साधन है। इसके विवेकपूर्ण सुझावों से राज्यों की आत्मनिर्भरता और समावेशी विकास की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।

Attempt this question in your own words and language,
Use mobile to scan image and upload in comments section below.

What are the key challenges in ensuring an efficient law and order situation in Uttar Pradesh? (8 marks) UPPCS Mains 2024 GS-5

0

उत्तर प्रदेश में कुशल कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं ?

  1. उत्तर प्रदेश में कुशल कानून व्यावस्था सुनिश्चित करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?                     8

Ans: परिचय (Introduction) –

उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है, जहाँ कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। राज्य सरकार निरंतर सुधारों के प्रयास कर रही है, परन्तु अनेक सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत समस्याएँ अब भी बनी हुई हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points) –

  • जनसंख्या घनत्व अधिक होने से अपराध नियंत्रण में कठिनाई होती है।
  • पुलिस बल की कमी और आधुनिक प्रशिक्षण का अभाव प्रभावी कार्रवाई में बाधक है।
  • भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप कानून प्रवर्तन की निष्पक्षता को प्रभावित करते हैं।
  • महिलाओं और दलितों के विरुद्ध अपराधों की बढ़ती घटनाएँ चिंता का विषय हैं।
  • साइबर अपराध और संगठित अपराध के नए रूप प्रशासन के लिए चुनौती बने हैं।
  • न्यायिक प्रक्रियाओं में विलंब से अपराधियों में भय की कमी रहती है।
  • अपर्याप्त निगरानी प्रणाली और तकनीकी संसाधनों की कमी भी प्रमुख समस्या है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

कुशल कानून-व्यवस्था के लिए आधुनिक तकनीक, पारदर्शी प्रशासन और पुलिस-जन सहयोग आवश्यक है। इन सुधारों के माध्यम से ही उत्तर प्रदेश में सुरक्षित और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना संभव है।

Attempt this question in your own words and language,
Use mobile to scan image and upload in comments section below.

What are the special legislative powers of the Council of States (Rajya Sabha)? Discuss. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-2

0

राज्य सभा की विशिष्ट विधायी शक्तियाँ क्या हैं ? विवेचना कीजिए।

Ans: परिचय:

राज्यसभा भारतीय संसद का उच्च सदन है, जो संघ की स्थायित्व और संतुलन का प्रतीक है। यह न केवल विधायी प्रक्रिया में भाग लेती है, बल्कि विशेष परिस्थितियों में लोकसभा से भिन्न शक्तियाँ भी रखती है। इसका उद्देश्य राज्यों के हितों की रक्षा करना है।

मुख्य बिंदु:

  • राज्यसभा किसी विषय को राज्य सूची से समवर्ती सूची में लाने के लिए अनुच्छेद 249 के अंतर्गत प्रस्ताव पारित कर सकती है।
  • अनुच्छेद 312 के तहत नवीन अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन की अनुशंसा कर सकती है।
  • यह राष्ट्रपति द्वारा जारी आपातकालीन घोषणाओं को अनुमोदित कर सकती है।
  • लोकसभा के विघटन की स्थिति में भी कार्य करती रहती है।
  • किसी विधेयक पर पुनर्विचार का सुझाव देकर कानून निर्माण को संतुलित बनाती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय संधियों और नीतिगत मुद्दों पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
  • राज्यों के हितों की रक्षा हेतु संघीय संतुलन बनाए रखती है।

निष्कर्ष:

राज्यसभा भारतीय संघ की एकता और स्थिरता की संवैधानिक गारंटी है। इसकी विशिष्ट शक्तियाँ संसद को अधिक संतुलित, विचारशील और संघीय चरित्र प्रदान करती हैं।

Attempt this question in your own words and language,
Use mobile to scan image and upload in comments section below.

Discuss the composition and jurisdiction of the State High Court of Uttar Pradesh. (8 marks) UPPCS Mains 2024 GS-5

0

उत्तर प्रदेश के राज्य उच्च न्यायालय के गठन व क्षेत्राधिकार की विवेचना कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction) –

उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय राज्य की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है, जो न्यायिक व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। इसका गठन ब्रिटिश काल में हुआ था, और आज यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा तथा न्याय प्रदान करने का प्रमुख केंद्र है।

मुख्य बिंदु (Important Points) –

  • उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय की स्थापना 17 मार्च 1866 को इलाहाबाद (प्रयागराज) में हुई।
  • प्रारंभ में यह नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस हाईकोर्ट कहलाता था।
  • संविधान के अनुच्छेद 214 से 231 के तहत राज्य उच्च न्यायालय की संरचना और कार्य तय किए गए हैं।
  • इसका मुख्य पीठ प्रयागराज में तथा खण्डपीठ (Bench) लखनऊ में स्थित है।
  • इसका क्षेत्राधिकार पूरे उत्तर प्रदेश राज्य तक विस्तृत है।
  • न्यायालय को मूल, अपीलीय और लेखापरीक्षा (writ jurisdiction) प्राप्त है।
  • यह राज्य सरकार और उसके अधिकारियों के विरुद्ध न्यायिक पुनरावलोकन करने में सक्षम है।

निष्कर्ष (Conclusion) – उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय राज्य में न्याय, विधि और संविधान की रक्षा का प्रमुख स्तंभ है। इसका व्यापक क्षेत्राधिकार नागरिक अधिकारों और न्यायिक पारदर्शिता को सुदृढ़ बनाता है।

Attempt this question in your own words and language,
Use mobile to scan image and upload in comments section below.

How does the Indian Constitution ensure the independence of the judiciary? Discuss the importance of the basic structure doctrine. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-2

0

भारतीय संविधान न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को कैसे सुनिश्चित करता है ? मूल संरचना सिद्धान्त के महत्त्व पर चर्चा कीजिए।

Ans: परिचय:

भारतीय संविधान में न्यायपालिका को लोकतंत्र का संरक्षक माना गया है। इसकी स्वतंत्रता नागरिक अधिकारों की रक्षा और सत्ता के दुरुपयोग पर नियंत्रण के लिए अनिवार्य है। मूल संरचना सिद्धांत ने इस स्वतंत्रता को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की है।

मुख्य बिंदु:

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं कार्यकाल संविधान के अनुच्छेद 124–147 (सुप्रीम कोर्ट) और 214–231 (हाई कोर्ट) में निर्धारित हैं।
  • न्यायाधीशों को विधायिका या कार्यपालिका के दबाव से मुक्त रखा गया है।
  • वेतन, भत्ते और सेवा शर्तें संसद के नियंत्रण से बाहर रखी गई हैं।
  • न्यायाधीशों को केवल महाभियोग प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता है।
  • न्यायपालिका को न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) का अधिकार प्राप्त है।
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने “मूल संरचना सिद्धांत” प्रतिपादित किया।
  • इस सिद्धांत के अनुसार, संविधान का संशोधन उसकी मूल आत्मा — जैसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, विधि का शासन, और मौलिक अधिकार — को नष्ट नहीं कर सकता।

निष्कर्ष:

न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है। मूल संरचना सिद्धांत ने इसे स्थायी संरक्षण देकर संविधान की सर्वोच्चता और नागरिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया है।

Attempt this question in your own words and language,
Use mobile to scan image and upload in comments section below.

Popular Posts

My Favorites

“An environmental movement led by youth’s gain popularity through social media,...

0
"युवाओं द्वारा संचालित एक पर्यावरणीय आंदोलन सोशल मीडिया, रैलियों और प्रभावकारी व्यक्तियों और वैज्ञानिकों के साथ सहयोग के माध्यम से लोकप्रियता प्राप्त करता है।...