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Write a short note on the composition of the Constituent Assembly. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-2

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संविधान सभा की संरचना पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

Ans:  परिचय:

भारत की संविधान सभा का गठन ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन योजना (1946) के अनुसार किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य स्वतंत्र भारत के लिए संविधान बनाना था। यह सभा देश की विविध सामाजिक, राजनीतिक एवं भौगोलिक इकाइयों का प्रतिनिधित्व करती थी।

मुख्य बिंदु:

  • संविधान सभा का गठन 1946 में हुआ।
  • इसमें प्रारंभ में 389 सदस्य थे (292 प्रांतीय, 93 रियासतों से, 4 चीफ कमिशनर क्षेत्रों से)।
  • सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से चुने गए।
  • सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई।
  • डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्ष तथा बी.एन. राव संवैधानिक सलाहकार थे।
  • विभाजन के बाद सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई।
  • यह सभा संविधान निर्माण के साथ-साथ संविधान लागू होने तक विधायिका के रूप में भी कार्य करती रही।

निष्कर्ष:

संविधान सभा भारतीय लोकतंत्र की नींव थी जिसने विविध विचारों को समाहित कर एक सशक्त संविधान बनाया। इसकी संरचना भारत की एकता और प्रतिनिधिक भावना का प्रतीक थी।

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Analyze the statement, “State legislatures are often seen as the voice of the states within India’s federal structure.” [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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इस कथन का विश्लेषण कीजिए, “राज्य विधान-मंडलों को अक्सर भारत के संघीय ढाँचे के भीतर राज्यों की आवाज के रूप में देखा जाता है।”

Ans: परिचय (Introduction ):

भारत का संविधान संघीय (Federal) शासन प्रणाली पर आधारित है, जिसमें केन्द्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन है। राज्य विधान-मंडल (State Legislature) राज्य स्तर पर जनता की प्रतिनिधि संस्था है। इसे भारत के संघीय ढाँचे में राज्यों की आवाज़ के रूप में देखा जाता है क्योंकि यह राज्य की नीतियों, हितों और आवश्यकताओं को अभिव्यक्त करता है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • भारत में 28 राज्यों में से अधिकांश के पास द्विसदनीय (Bicameral) या एकसदनीय (Unicameral) विधान-मंडल है।
  • विधान सभा (Legislative Assembly) राज्य की निचली सदन है, जो प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चुनी जाती है।
  • विधान परिषद (Legislative Council) ऊपरी सदन है, जो विभिन्न सामाजिक समूहों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है।
  • राज्य विधान-मंडल राज्य की नीतियों, कानूनों और बजट को निर्धारित करता है।
  • यह केन्द्र की नीतियों पर भी चर्चा कर राज्य के दृष्टिकोण को सामने लाता है।
  • संघीय ढाँचे में यह संस्था राज्यों की स्वायत्तता को सुदृढ़ करती है।
  • विधान सभा राज्य सरकार की कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है।
  • यह केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में संतुलन बनाए रखने का माध्यम है।
  • विधान परिषद् शिक्षाविदों, स्नातकों व शिक्षकों की राय को अभिव्यक्त करने का मंच है।
  • यह राज्य की समस्याओं और आकांक्षाओं को केन्द्र तक पहुँचाने का कार्य करती है।
  • राज्य विधान-मंडल के माध्यम से राज्य के नागरिक सीधे शासन प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
  • यह संघीय लोकतंत्र की आत्मा – ‘राज्यों की भागीदारी’ को मूर्त रूप देती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

इस प्रकार राज्य विधान-मंडल भारत के संघीय ढाँचे में राज्यों की लोकतांत्रिक आवाज़ के रूप में कार्य करता है। यह न केवल राज्य के हितों की रक्षा करता है, बल्कि केन्द्र और राज्यों के बीच सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को भी सुदृढ़ बनाता है।

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What are the key challenges in ensuring an efficient law and order situation in Uttar Pradesh? (8 marks) UPPCS Mains 2024 GS-5

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उत्तर प्रदेश में कुशल कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं ?

  1. उत्तर प्रदेश में कुशल कानून व्यावस्था सुनिश्चित करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?                     8

Ans: परिचय (Introduction) –

उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है, जहाँ कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। राज्य सरकार निरंतर सुधारों के प्रयास कर रही है, परन्तु अनेक सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत समस्याएँ अब भी बनी हुई हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points) –

  • जनसंख्या घनत्व अधिक होने से अपराध नियंत्रण में कठिनाई होती है।
  • पुलिस बल की कमी और आधुनिक प्रशिक्षण का अभाव प्रभावी कार्रवाई में बाधक है।
  • भ्रष्टाचार और राजनीतिक हस्तक्षेप कानून प्रवर्तन की निष्पक्षता को प्रभावित करते हैं।
  • महिलाओं और दलितों के विरुद्ध अपराधों की बढ़ती घटनाएँ चिंता का विषय हैं।
  • साइबर अपराध और संगठित अपराध के नए रूप प्रशासन के लिए चुनौती बने हैं।
  • न्यायिक प्रक्रियाओं में विलंब से अपराधियों में भय की कमी रहती है।
  • अपर्याप्त निगरानी प्रणाली और तकनीकी संसाधनों की कमी भी प्रमुख समस्या है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

कुशल कानून-व्यवस्था के लिए आधुनिक तकनीक, पारदर्शी प्रशासन और पुलिस-जन सहयोग आवश्यक है। इन सुधारों के माध्यम से ही उत्तर प्रदेश में सुरक्षित और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना संभव है।

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What are the implications of the revised appointment process of Election Commission for ensuring its independence? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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चुनाव आयोग की स्वतन्त्रता सुनिश्चित करने के लिए उसकी संशोधित नियुक्ति प्रक्रिया के निहितार्थ क्या हैं ?

Ans: परिचय (Introduction):

भारत में चुनाव आयोग (Election Commission of India) लोकतंत्र की निष्पक्षता और पारदर्शिता का प्रमुख आधार है। इसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए अत्यंत आवश्यक है। हाल ही में आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में संशोधन किए गए हैं, जिनके गहरे निहितार्थ लोकतांत्रिक संतुलन पर पड़े हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • पूर्व में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती थी।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने 2023 में स्वतंत्र चयन समिति का सुझाव दिया था।
  • इसके अनुसार चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश शामिल होने थे।
  • सरकार ने संशोधन कर मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय मंत्री को सदस्य बनाया।
  • यह संशोधन कार्यपालिका (Executive) के प्रभाव को बढ़ाता है।
  • इससे आयोग की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर प्रश्न उठे हैं।
  • विपक्ष और नागरिक संगठनों ने इसे “संवैधानिक संस्थाओं के राजनीतिकरण” की दिशा में कदम बताया।
  • सरकार का तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 324 की भावना के अनुरूप है।
  • आयोग की स्वतंत्रता उसकी विश्वसनीयता और चुनावों की निष्पक्षता के लिए अनिवार्य है।
  • न्यायपालिका की उपस्थिति चयन प्रक्रिया को संतुलित और पारदर्शी बनाती थी।
  • संशोधित प्रक्रिया से शक्तियों का केंद्रीकरण बढ़ने का खतरा है।
  • दीर्घकाल में यह लोकतंत्र के संस्थागत ढाँचे को प्रभावित कर सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

संशोधित नियुक्ति प्रक्रिया ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस को जन्म दिया है। लोकतंत्र की सुदृढ़ता के लिए आवश्यक है कि आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया पूर्णतः निष्पक्ष, संतुलित और पारदर्शी बनी रहे।

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What are the special legislative powers of the Council of States (Rajya Sabha)? Discuss. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-2

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राज्य सभा की विशिष्ट विधायी शक्तियाँ क्या हैं ? विवेचना कीजिए।

Ans: परिचय:

राज्यसभा भारतीय संसद का उच्च सदन है, जो संघ की स्थायित्व और संतुलन का प्रतीक है। यह न केवल विधायी प्रक्रिया में भाग लेती है, बल्कि विशेष परिस्थितियों में लोकसभा से भिन्न शक्तियाँ भी रखती है। इसका उद्देश्य राज्यों के हितों की रक्षा करना है।

मुख्य बिंदु:

  • राज्यसभा किसी विषय को राज्य सूची से समवर्ती सूची में लाने के लिए अनुच्छेद 249 के अंतर्गत प्रस्ताव पारित कर सकती है।
  • अनुच्छेद 312 के तहत नवीन अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन की अनुशंसा कर सकती है।
  • यह राष्ट्रपति द्वारा जारी आपातकालीन घोषणाओं को अनुमोदित कर सकती है।
  • लोकसभा के विघटन की स्थिति में भी कार्य करती रहती है।
  • किसी विधेयक पर पुनर्विचार का सुझाव देकर कानून निर्माण को संतुलित बनाती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय संधियों और नीतिगत मुद्दों पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
  • राज्यों के हितों की रक्षा हेतु संघीय संतुलन बनाए रखती है।

निष्कर्ष:

राज्यसभा भारतीय संघ की एकता और स्थिरता की संवैधानिक गारंटी है। इसकी विशिष्ट शक्तियाँ संसद को अधिक संतुलित, विचारशील और संघीय चरित्र प्रदान करती हैं।

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“If a Second Chamber dissents from the first, it is mischievous; if it agrees, it is superfluous.” In the light of this famous statement, discuss the utility of Uttar Pradesh Legislative Council. (12 marks)

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“यदि दूसरा सदन पहले सदन से असहमत हो तो वह शरारतपूर्ण है; यदि वह सहमत हो तो अनावश्यक है ।” इस प्रसिद्ध कथन के प्रकाश में उत्तर प्रदेश विधान परिषद की उपयोगिता की चर्चा कीजिए ।

Ans: परिचय (Introduction ):

द्विसदनीय विधानमंडल (Bicameral Legislature) का उद्देश्य कानून निर्माण में संतुलन और विवेक सुनिश्चित करना है। उत्तर प्रदेश में विधान परिषद (Legislative Council) इस व्यवस्था का दूसरा सदन है। यद्यपि इसकी उपयोगिता पर अक्सर विवाद होता रहा है, परंतु इसका लोकतांत्रिक महत्व अभी भी बना हुआ है।

मुख्य बिंदु:

• विधान परिषद राज्य का उच्च सदन है, जो परोक्ष रूप से निर्वाचित सदस्यों से बनता है।

• इसका कार्य विधान सभा द्वारा पारित विधेयकों की समीक्षा करना होता है।

• यह शासन में जल्दबाज़ी से बने कानूनों पर अंकुश लगाने का कार्य करती है।

• अनुभवी शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को इसमें प्रतिनिधित्व मिलता है।

• यह प्रशासनिक नीतियों पर सार्थक बहस का मंच प्रदान करती है।

• विधान परिषद को वित्त विधेयकों पर सीमित अधिकार प्राप्त हैं।

• यह विधानसभा के निर्णयों पर पुनर्विचार का अवसर देती है, परंतु उन्हें रोक नहीं सकती।

• आलोचक कहते हैं कि इसकी शक्तियाँ सीमित हैं, इसलिए यह “अनावश्यक” है।

• वहीं समर्थक मानते हैं कि यह लोकतांत्रिक परिपक्वता और विचारशीलता का प्रतीक है।

• कई बार इसे राजनीतिक शरणस्थली के रूप में भी देखा गया है।

• इसकी समाप्ति या बनाए रखने पर समय-समय पर बहस होती रही है।

• उत्तर प्रदेश की विविध सामाजिक संरचना में यह प्रतिनिधित्व की पूरक भूमिका निभाती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

यद्यपि विधान परिषद की शक्तियाँ सीमित हैं, फिर भी यह विधायी प्रक्रिया में संतुलन बनाए रखने में सहायक है। इसे सुधार कर अधिक प्रभावी बनाया जाए तो यह लोकतंत्र की सशक्त संस्था बन सकती है।

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Distinguish between the Consolidated Fund and the Contingency Fund of the State of Uttar Pradesh. (8 marks) UPPCS Mains 2024 GS-5

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उत्तर प्रदेश राज्य की संचित निधि एवं आकस्मिक निधि के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction) –

 उत्तर प्रदेश राज्य की वित्तीय व्यवस्था भारतीय संविधान के अनुच्छेदों के अनुसार संचालित होती है। इसमें संचित निधि (Consolidated Fund) और आकस्मिक निधि (Contingency Fund) दो प्रमुख राज्य निधियाँ हैं। दोनों का उद्देश्य अलग-अलग परिस्थितियों में वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करना है।

मुख्य बिंदु (Important Points) –

  • संचित निधि राज्य की मुख्य निधि है, जिसमें सभी राजस्व, ऋण और प्राप्तियाँ जमा होती हैं।
  • इस निधि से सरकारी व्यय केवल विधानसभा की स्वीकृति से किया जा सकता है।
  • यह निधि राज्य की सामान्य बजटीय आवश्यकताओं के लिए उपयोग होती है।
  • आकस्मिक निधि आपातकालीन या तत्काल व्यय की स्थिति में प्रयोग की जाती है।
  • इसे राज्यपाल के अधीन रखा जाता है, जो तत्काल भुगतान की अनुमति दे सकते हैं।
  • बाद में यह राशि विधानसभा द्वारा अनुमोदित की जाती है।
  • संचित निधि स्थायी प्रकृति की होती है, जबकि आकस्मिक निधि अस्थायी पुनर्भरणीय निधि है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

इस प्रकार, संचित निधि राज्य की नियमित वित्तीय गतिविधियों की आधारशिला है, जबकि आकस्मिक निधि आपात स्थितियों में त्वरित राहत प्रदान करने का साधन है। दोनों मिलकर राज्य की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करती हैं।

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