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Explain the contribution of woman’s organisation in the development of Indian rural society. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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भारतीय ग्रामीण समाज के विकास में महिला संगठनों के योगदान का वर्णन कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

भारतीय ग्रामीण समाज में महिलाओं की भूमिका पारंपरिक रूप से सीमित रही, परंतु महिला संगठनों (Women Organizations) ने इस स्थिति में परिवर्तन लाने का कार्य किया। इन संगठनों ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर, शिक्षित और सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मुख्य बिंदु:

  • स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups – SHGs): ग्रामीण महिलाओं को लघु ऋण और उद्यमशीलता के अवसर प्रदान किए।
  • राष्ट्रीय महिला कोष (Rashtriya Mahila Kosh): महिलाओं को वित्तीय सहायता देकर आजीविका बढ़ाने में सहयोग किया।
  • सेल्फ एम्प्लॉयड वूमेन्स एसोसिएशन (SEWA): असंगठित क्षेत्र की महिलाओं को संगठित कर आर्थिक सशक्तिकरण किया।
  • महिला मंडल और एनजीओ: स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाई।
  • सरकारी योजनाएँ: महिला समाख्या, डी.डब्ल्यू.सी.आर.ए. जैसी योजनाओं ने सहभागिता को बढ़ावा दिया।
  • पंचायती राज में भागीदारी: 33% आरक्षण से ग्रामीण शासन में महिलाओं की भूमिका सशक्त हुई।
  • सामाजिक परिवर्तन: महिला संगठनों ने बाल विवाह, दहेज और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ आंदोलन चलाए।

उपसंहार:

महिला संगठनों ने ग्रामीण समाज में नई चेतना और आत्मविश्वास का संचार किया। इनके प्रयासों से ग्रामीण भारत में महिला सशक्तिकरण सामाजिक विकास का आधार बन गया है।

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Discuss the impacts of Globalisation on Indian Society. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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भारतीय समाज पर वैश्वीकरण के प्रभावों की चर्चा कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

वैश्वीकरण (Globalization) का अर्थ है — विश्व के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी एकीकरण की प्रक्रिया। 1991 के आर्थिक उदारीकरण (Liberalization) के बाद भारत में वैश्वीकरण ने तीव्र गति से प्रभाव डाला। इसने भारतीय समाज के अनेक आयामों को परिवर्तित किया।

मुख्य प्रभाव:

  • आर्थिक प्रभाव: रोजगार के नए अवसर बढ़े, परंतु असमानता भी बढ़ी।
  • सांस्कृतिक प्रभाव: पश्चिमी जीवनशैली, पहनावा और उपभोक्तावाद का प्रसार हुआ।
  • शैक्षिक प्रभाव: तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा का विस्तार हुआ।
  • संचार क्रांति: इंटरनेट और मोबाइल ने सामाजिक जुड़ाव और जानकारी का प्रसार बढ़ाया।
  • महिलाओं की स्थिति: शिक्षा और रोजगार में अवसर बढ़े, परंतु सांस्कृतिक द्वंद्व भी उभरा।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: औद्योगिकीकरण और उपभोग ने पर्यावरणीय संकट बढ़ाया।
  • परिवार संरचना: संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों का चलन बढ़ा।

उपसंहार:

वैश्वीकरण ने भारतीय समाज को आधुनिक और विश्व से जुड़ा बनाया, परंतु इसके साथ सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियाँ भी उत्पन्न हुईं। अतः आवश्यक है कि भारत अपने मूल मूल्यों को बनाए रखते हुए वैश्वीकरण का संतुलित उपयोग करे।

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“Nepolian was the son of the Revolution.” – Explain. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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“नेपोलियन क्रान्ति का पुत्र था ।” – व्याख्या कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

“नेपोलियन क्रांति का पुत्र था” (Napoleon was the child of the Revolution) – यह कथन इस तथ्य को दर्शाता है कि नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Bonaparte) का उदय फ्रांसीसी क्रांति (French Revolution) के परिणामस्वरूप हुआ। क्रांति ने जिस समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व (Liberty, Equality, Fraternity) की भावना को जन्म दिया, उसी वातावरण ने नेपोलियन को शक्ति और अवसर प्रदान किए।

व्याख्या:

  • फ्रांसीसी क्रांति (1789) ने राजशाही का अंत कर समानता व योग्यता के आधार पर उन्नति का मार्ग खोला।
  • नेपोलियन, जो एक सामान्य सैनिक था, इसी क्रांतिकारी व्यवस्था के कारण उच्च पदों तक पहुँचा।
  • उसने क्रांति के सिद्धांतों — समान अधिकार, विधि का शासन और धार्मिक सहिष्णुता — को अपने प्रशासन में लागू किया।
  • नेपोलियनिक कोड (Napoleonic Code) ने नागरिक समानता और संपत्ति के अधिकार को कानूनी रूप दिया।
  • हालांकि बाद में उसने सम्राट बनकर निरंकुश शासन स्थापित किया, फिर भी उसकी नीतियों में क्रांति की छाप बनी रही।

उपसंहार:

इस प्रकार नेपोलियन वास्तव में क्रांति की उपज था — उसने उसके आदर्शों को आगे बढ़ाया और यूरोप में आधुनिक शासन की नींव रखी। अतः उचित ही कहा गया है कि “नेपोलियन क्रांति का पुत्र था।”

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Give an account of the challenges faced by India immediately after Independence. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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स्वतन्त्रता के तुरंत बाद भारत के समक्ष चुनौतियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। देश विभाजन से उपजी समस्याओं और नवगठित लोकतांत्रिक व्यवस्था ने प्रशासनिक क्षमता की परीक्षा ली। राष्ट्र निर्माण का यह दौर भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला सिद्ध हुआ।

मुख्य बिंदु:

  • देश का विभाजन और शरणार्थियों का पुनर्वास सबसे बड़ी चुनौती थी।
  • साम्प्रदायिक दंगों ने सामाजिक एकता को खतरे में डाला।
  • रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया कठिन और जटिल थी।
  • गरीबी, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता गंभीर समस्या बनी।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचनाओं का अभाव विकास में बाधक था।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना और स्थायित्व आवश्यक था।
  • सीमाओं पर सुरक्षा और पड़ोसी देशों से संबंध स्थिर करना जरूरी था।

उपसंहार:

इन चुनौतियों के बावजूद भारत ने दृढ़ संकल्प और लोकतांत्रिक मूल्यों के बल पर प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाया। स्वतंत्रता के बाद की यह यात्रा भारत की सहनशीलता और एकता का प्रतीक बनी।

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Introduce the literary sources for the study of Ancient Indian History. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-1

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प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन के लिए साहित्यिक स्रोत का परिचय दीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में साहित्यिक स्रोत (Literary Sources) अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये उस काल की सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं आर्थिक स्थिति का ज्ञान कराते हैं। ये स्रोत हमें भारत की सभ्यता और संस्कृति की निरंतरता को समझने में सहायता देते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • वैदिक साहित्य – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद से आरंभिक आर्यों के जीवन का ज्ञान।
  • उपनिषद – दार्शनिक विचारों और आत्मा-परमात्मा के संबंध की व्याख्या।
  • महाकाव्य – रामायण और महाभारत से राजनैतिक, सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों की जानकारी।
  • बौद्ध ग्रंथ – त्रिपिटक से मौर्यकालीन समाज और धर्म का चित्रण।
  • जैन ग्रंथ – आगम से श्रमण परंपरा और गणराज्य व्यवस्था की जानकारी।
  • संस्कृत नाटक एवं काव्य – कालिदास जैसे कवियों से गुप्तकालीन संस्कृति का परिचय।
  • विदेशी यात्रियों के वृत्तांत – मेगस्थनीज़, फाह्यान आदि से ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि।

उपसंहार:

इस प्रकार साहित्यिक स्रोत प्राचीन भारत के विविध पक्षों को उजागर करते हैं। ये इतिहास की आधारशिला हैं, जो हमें अतीत से वर्तमान तक की सांस्कृतिक यात्रा दिखाते हैं।

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“United Nations Organisation has failed in its objective of maintaining international peace and security.” Describe with example. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

“संयुक्त राष्ट्र संघ अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखने के अपने उद्देश्य में विफल रहा है।” उदाहरण के साथ वर्णन कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

संयुक्त राष्ट्र संघ (United Nations – UN) की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से हुई थी। इसका लक्ष्य था—युद्ध की पुनरावृत्ति रोकना और राष्ट्रों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना। किन्तु, समय के साथ यह संगठन अपने मूल उद्देश्य को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में असफल रहा है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • सुरक्षा परिषद् (UNSC) के पाँच स्थायी सदस्यों (P5) के वीटो अधिकार के कारण निर्णय प्रक्रिया अक्सर बाधित होती है।
  • सीरिया, यूक्रेन, गाज़ा जैसे संघर्षों में संयुक्त राष्ट्र निर्णायक हस्तक्षेप नहीं कर सका।
  • इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष में दशकों से शांति स्थापना के प्रयास असफल रहे हैं।
  • रवांडा (1994) और बोस्निया (1995) में नरसंहार रोकने में UN की असफलता मानवता पर कलंक रही।
  • अफगानिस्तान और इराक युद्ध में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका कमजोर और विभाजित रही।
  • कई बार बड़ी शक्तियाँ संगठन के मंच का उपयोग अपने राजनीतिक हितों के लिए करती हैं।
  • शांति सेना (Peacekeeping Forces) कई बार निष्क्रिय और सीमित अधिकारों में बंधी रहती हैं।
  • आर्थिक और मानवीय संकटों में भी इसकी प्रतिक्रिया अक्सर धीमी रही है।
  • जलवायु परिवर्तन, शरणार्थी संकट, आतंकवाद जैसे नए खतरों पर भी प्रभावी वैश्विक नीति नहीं बन सकी।
  • संगठन की संरचना और सदस्यता आज की विश्व राजनीति के अनुरूप नहीं है।
  • विकासशील देशों की आवाज़, विशेषकर भारत जैसी उभरती शक्तियों की, निर्णय प्रक्रिया में सीमित है।
  • सुधार की कमी के कारण UN की विश्वसनीयता और प्रासंगिकता पर प्रश्न उठ रहे हैं।

उदाहरण:

यूक्रेन-रूस युद्ध (2022) में सुरक्षा परिषद् विभाजित रही और कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका — यह विफलता का ताज़ा उदाहरण है।

निष्कर्ष (Conclusion):

संयुक्त राष्ट्र संघ की सीमाएँ आज की बहुध्रुवीय दुनिया में स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी हैं।

यदि इसमें संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो यह संगठन अपने मूल उद्देश्य — विश्व शांति और सुरक्षा — से और अधिक दूर होता जाएगा।

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What are the consequences of the ongoing Israel-Palestine conflict? How should India address the emerging challenges? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के क्या परिणाम हैं ? भारत को इससे उत्पन्न चुनौतियों का सामना कैसे करना चाहिए ?

Ans: परिचय:

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष (Israel-Palestine Conflict) मध्य पूर्व का सबसे पुराना और जटिल विवाद है, जिसकी जड़ें 1948 में इजराइल के गठन से जुड़ी हैं। यह संघर्ष धार्मिक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक कारणों से दशकों से जारी है। इसके परिणाम केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और भारत जैसे देशों पर भी प्रभाव डालते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • मानवाधिकार संकट: संघर्ष में आम नागरिकों की मौत, विस्थापन और मानवीय त्रासदी बढ़ी है।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता: मध्य पूर्व में शांति और स्थायित्व लगातार प्रभावित हुआ है।
  • आतंकवाद का प्रसार: चरमपंथी संगठनों को हिंसा फैलाने का अवसर मिला।
  • वैश्विक तेल बाजार पर असर: पश्चिम एशिया में तनाव से तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय ध्रुवीकरण: अमेरिका, यूरोपीय संघ, अरब देशों और रूस की नीतियाँ एक-दूसरे से टकराती हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न: शांति प्रयास बार-बार असफल रहे हैं।
  • भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) पर खतरा: पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का प्रमुख स्रोत है।
  • प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: हजारों भारतीय नागरिक इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।
  • राजनयिक संतुलन की चुनौती: भारत इजराइल और फिलिस्तीन दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है।
  • आर्थिक संबंधों पर प्रभाव: संघर्ष से व्यापार, रक्षा और तकनीकी सहयोग प्रभावित हो सकता है।
  • मानवीय दृष्टिकोण: भारत निरंतर “दो-राष्ट्र समाधान” (Two-State Solution) का समर्थन करता है।
  • संघर्ष की दीर्घता: क्षेत्रीय अस्थिरता भारत की पश्चिम एशिया नीति को जटिल बनाती है।
  • भारत के लिए चुनौतियों से निपटने के उपाय:
  • संतुलित कूटनीति अपनाकर दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना।
  • क्षेत्र में शांति प्रयासों का समर्थन और मानवीय सहायता प्रदान करना।
  • तेल आपूर्ति और प्रवासी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक तंत्र विकसित करना।
  • वैश्विक मंचों पर शांति और सह-अस्तित्व की नीति को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष (Conclusion ):

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष ने विश्व शांति और भारत की पश्चिम एशिया नीति दोनों को प्रभावित किया है। भारत को अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए संतुलित, मानवीय और शांति-समर्थक भूमिका निभानी चाहिए।

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Examine the major issues of dispute between India and Bangladesh and give suggestions for improving bilateral relations. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

भारत एवं बांग्लादेश के मध्य विवाद के प्रमुख मुद्दों का परीक्षण कीजिए एवं द्विपक्षीय सम्बन्धों में सुधार हेतु सुझाव दीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

भारत और बांग्लादेश ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। 1971 में स्वतंत्रता के बाद से दोनों देशों के सम्बन्ध सामान्यतः सहयोगात्मक रहे हैं, परंतु कुछ मुद्दों पर मतभेद भी बने हुए हैं। इन विवादों का समाधान दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • जल बँटवारा विवाद (Water Sharing Dispute): सबसे प्रमुख मुद्दा गंगा और तीस्ता नदी के जल वितरण को लेकर है।
  • सीमा विवाद: 2015 के भूमि सीमा समझौते (Land Boundary Agreement) से अधिकांश मुद्दे सुलझे, परंतु कुछ सीमाई अतिक्रमण अब भी होते हैं।
  • अवैध आव्रजन (Illegal Migration): असम व पूर्वोत्तर भारत में बांग्लादेशी घुसपैठ एक संवेदनशील विषय है।
  • सीमापार तस्करी (Cross-border Smuggling): मवेशी, नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी दोनों देशों के लिए चिंता का विषय है।
  • रोहिंग्या शरणार्थी संकट: इस मुद्दे पर दोनों देशों की स्थिति और सहयोग की सीमा भिन्न है।
  • सीमा सुरक्षा बलों के बीच तनाव: कभी-कभी गोलीबारी और विवाद की घटनाएँ संबंधों को प्रभावित करती हैं।
  • व्यापार असंतुलन (Trade Imbalance): भारत को व्यापार में अधिक लाभ होने से बांग्लादेश में असंतोष रहता है।
  • परिवहन व संपर्क (Connectivity): हाल के वर्षों में सड़क, रेल और जलमार्गों से संपर्क बेहतर हुआ है।
  • ऊर्जा सहयोग: बिजली व ईंधन के क्षेत्र में भारत-बांग्लादेश सहयोग बढ़ा है।
  • संस्कृतिक संबंध: साझा भाषा, परंपरा और धर्म दोनों देशों को जोड़ते हैं।
  • कूटनीतिक प्रयास: द्विपक्षीय वार्ताओं और उच्चस्तरीय यात्राओं से संबंधों में सकारात्मक सुधार हुआ है।
  • भारत की “नेबरहुड फर्स्ट” नीति बांग्लादेश को क्षेत्रीय सहयोग का प्रमुख भागीदार बनाती है।
  • सुझाव (Suggestions):
  • तीस्ता जल समझौते पर शीघ्र समाधान किया जाए।
  • सीमा प्रबंधन में संयुक्त निगरानी और तकनीकी सहयोग बढ़ाया जाए।
  • व्यापार संतुलन के लिए बांग्लादेश को अधिक बाज़ार पहुँच दी जाए।
  • सांस्कृतिक और शैक्षिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष (Conclusion):

भारत-बांग्लादेश संबंधों में सहयोग की अपार संभावनाएँ हैं, पर विवादों का समाधान आवश्यक है। आपसी विश्वास, संवाद और समान हितों पर आधारित नीति से दोनों देश क्षेत्रीय स्थिरता और प्रगति के अग्रदूत बन सकते

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What is India’s progress on hunger and poverty after 2014? Explain. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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2014 के पश्चात भूख और गरीबी पर भारत की प्रगति क्या है ? व्याख्या कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

2014 के बाद भारत सरकार ने भूख (Hunger) और गरीबी (Poverty) को कम करने के लिए कई व्यापक नीतियाँ और योजनाएँ शुरू कीं। इनका उद्देश्य था—“सबका साथ, सबका विकास” के सिद्धांत पर आधारित समावेशी विकास सुनिश्चित करना। हालाँकि कुछ प्रगति हुई है, फिर भी भूख और कुपोषण जैसी समस्याएँ आज भी चुनौती बनी हुई हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • 2014 के बाद गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत लगातार घटा है।
  • नीति आयोग के अनुसार, 2013-14 से 2022 तक लगभग 24 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) से बाहर आए।
  • प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) के तहत 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) ने भोजन का अधिकार सुनिश्चित किया।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, और जल जीवन मिशन ने जीवन स्तर में सुधार किया।
  • मनरेगा (MGNREGA) ने ग्रामीण रोजगार के माध्यम से आय में वृद्धि की।
  • जन-धन योजना ने वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ाया, जिससे गरीब तबकों की पहुँच बैंकिंग तक हुई।
  • आयुष्मान भारत योजना ने स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाया।
  • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) ने योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ाई और लीकेज घटाया।
  • कोविड-19 के दौरान सरकार की राहत योजनाओं ने गरीब वर्गों को आंशिक सहारा दिया।
  • फिर भी, ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2024 में भारत की रैंक अभी भी चिंताजनक है (100 से नीचे)।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कुपोषण, बेरोजगारी और मूल्यवृद्धि जैसी समस्याएँ अब भी गरीबी को बढ़ाती हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

2014 के बाद भारत ने गरीबी घटाने और खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में उल्लेखनीय कदम उठाए हैं। फिर भी, स्थायी विकास के लिए रोजगार सृजन, पोषण सुधार और सामाजिक सुरक्षा को और सशक्त बनाना आवश्यक है।                  

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The labour class of the country has been significantly affected by the New Economic Policy. Explain. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

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नई आर्थिक नीति से देश का श्रमिक वर्ग बहुत प्रभावित हुआ है। स्पष्ट कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction):

भारत में 1991 में लागू की गई नई आर्थिक नीति (New Economic Policy – NEP) ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में बड़ा परिवर्तन लाया। इस नीति ने भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रतिस्पर्धात्मक बनाया, परंतु इसके प्रभाव से श्रमिक वर्ग (Working Class) पर गहरा असर पड़ा। आर्थिक सुधारों ने जहाँ विकास के अवसर बढ़ाए, वहीं श्रमिकों की सुरक्षा और स्थायित्व को चुनौती भी दी।

मुख्य बिंदु (Important Points):

  • नई आर्थिक नीति के तहत सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector) का दायरा घटा और निजीकरण बढ़ा।
  • इससे लाखों श्रमिकों की नौकरी अस्थिर (Job insecurity) हो गई।
  • ठेका प्रणाली (Contract system) के विस्तार से स्थायी रोजगार घटे।
  • श्रम कानूनों को लचीला बनाने से श्रमिकों की सौदेबाज़ी शक्ति कमजोर हुई।
  • औद्योगिक पुनर्गठन से कई पारंपरिक उद्योग बंद हुए, जिससे बेरोजगारी बढ़ी।
  • असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) में काम करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी।
  • मजदूरी दरें (Wages) महँगाई के अनुपात में नहीं बढ़ीं।
  • सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ (Social Security Schemes) सीमित दायरे में रह गईं।
  • श्रमिकों की यूनियनें (Trade Unions) कमजोर पड़ीं और उनका प्रभाव घटा।
  • महिलाएँ और प्रवासी मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हुए।
  • प्रतिस्पर्धा और उत्पादकता के दबाव से कार्य-परिस्थितियाँ कठिन हुईं।
  • कौशल विकास (Skill Development) के प्रयासों के बावजूद निम्न आय वर्ग पर असमानता बढ़ी।

निष्कर्ष (Conclusion):

नई आर्थिक नीति ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा, पर श्रमिक वर्ग पर इसके नकारात्मक प्रभाव गहरे रहे। आवश्यक है कि विकास के साथ-साथ श्रमिकों की सुरक्षा, सम्मान और सामाजिक न्याय को भी प्राथमिकता दी जाए।

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