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“An environmental movement led by youth’s gain popularity through social media, rallies and collaboration with influences and scientists with time the movement gained public support and let the government to propose changes in the policy.” What will be your stand to cope with the situation as a civil servant? (Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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“युवाओं द्वारा संचालित एक पर्यावरणीय आंदोलन सोशल मीडिया, रैलियों और प्रभावकारी व्यक्तियों और वैज्ञानिकों के साथ सहयोग के माध्यम से लोकप्रियता प्राप्त करता है। समय के साथ इस आंदोलन ने सार्वजनिक समर्थन प्राप्त किया और सरकार को नीति में बदलाव का प्रस्ताव देने के लिए प्रेरित किया।” एक सिविल सेवक के रूप में इस स्थिति से निपटने के लिए आप का क्या रुख होगा?

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

युवाओं द्वारा संचालित पर्यावरणीय आंदोलन सामाजिक जागरूकता और लोकतांत्रिक भागीदारी का सशक्त उदाहरण है। एक सिविल सेवक के रूप में मेरा दायित्व होगा कि मैं इस आंदोलन को संवेदनशील, संवादात्मक और नीति-उन्मुख दृष्टिकोण से देखूँ। ऐसे आंदोलनों में प्रशासन को संतुलन रखना होता है—जनहित और नीतिगत व्यवहार्यता दोनों के बीच।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. संवाद स्थापित करना: आंदोलन के नेताओं से सकारात्मक बातचीत शुरू करना ताकि उनकी मांगें स्पष्ट रूप से समझी जा सकें।

2. तथ्यों का अध्ययन: आंदोलन से जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों, रिपोर्टों और विशेषज्ञ मतों का निष्पक्ष विश्लेषण करना।

3. पारदर्शिता: जनता को यह बताना कि सरकार पर्यावरणीय मुद्दों पर क्या कदम उठा रही है।

4. नीति समीक्षा: संबंधित विभागों के साथ मिलकर नीतियों का मूल्यांकन कर आवश्यक संशोधन का प्रस्ताव देना।

5. युवा सहभागिता: आंदोलन के प्रतिनिधियों को नीति-निर्माण प्रक्रिया में परामर्शदाता के रूप में शामिल करना।

6. संतुलित दृष्टिकोण: पर्यावरणीय संरक्षण और विकास की आवश्यकताओं के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाना।

7. वैज्ञानिक सहयोग: पर्यावरण वैज्ञानिकों और अनुसंधान संस्थानों की राय को निर्णय प्रक्रिया में सम्मिलित करना।

8. सोशल मीडिया प्रबंधन: सकारात्मक सूचना साझा कर अफवाहों और गलत सूचनाओं को रोकना।

9. कानून व्यवस्था बनाए रखना: रैलियों या प्रदर्शनों के दौरान शांति और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना।

10. जन-जागरूकता कार्यक्रम: नागरिकों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति दीर्घकालिक जागरूकता बढ़ाने हेतु अभियान चलाना।

11. सफलता का मूल्यांकन: आंदोलन के प्रभाव से लागू नीतियों की समीक्षा कर परिणामों का आकलन करना।

12. नैतिक दृष्टिकोण: जनभावनाओं का सम्मान करते हुए निष्पक्षता और उत्तरदायित्व का पालन करना।

निष्कर्ष (Conclusion):

एक सिविल सेवक के रूप में मेरा उद्देश्य होगा कि युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक नीति-परिवर्तन में परिवर्तित किया जाए। संवाद, पारदर्शिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर ही प्रशासन पर्यावरण संरक्षण और जनसंतोष दोनों सुनिश्चित कर सकता है।

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In the process of policy making by public administrators whether the priority should be given to the moral transparency or the effectiveness of consequences/results? Elucidate. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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लोक प्रशासकों द्वारा नीति-निर्माण की प्रक्रिया में वांछित सामाजिक-नैतिक लक्षणों की प्राप्ति हेतु, क्या साधनों की नैतिक पारदर्शिता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए अथवा परिणामों की प्रभावशीलता को? समझाइये।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

लोक प्रशासक नीति-निर्माण में ऐसे निर्णय लेते हैं जो समाज के जीवन-मूल्यों को प्रभावित करते हैं। इन निर्णयों में नैतिक पारदर्शिता और परिणामों की प्रभावशीलता दोनों का संतुलन आवश्यक है। यह प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि साधन और परिणाम दोनों ही शासन की नैतिकता को परिभाषित करते हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points – 12 bullet points):

  • साधनों की नैतिकता (Ethical Means): नीति-निर्माण में अपनाए गए साधन पारदर्शी, न्यायसंगत और सत्यनिष्ठ होने चाहिए।
  • परिणामों की प्रभावशीलता (Effectiveness of Outcomes): नीतियों के परिणाम व्यावहारिक, जनोन्मुखी और समाजहितकारी हों।
  • गांधीजी का दृष्टिकोण: उन्होंने कहा – “असत्य साधनों से सत्य उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता।”
  • नैतिक पारदर्शिता का महत्व: यह नीति-निर्माताओं की विश्वसनीयता और सार्वजनिक विश्वास को सुदृढ़ करती है।
  • परिणाम-आधारित दृष्टिकोण: आधुनिक प्रशासन में परिणामों की गुणवत्ता और मापन पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
  • संतुलन की आवश्यकता: केवल साधनों पर या केवल परिणामों पर ध्यान देना नैतिक असंतुलन पैदा कर सकता है।
  • उद्देश्य और साधन की एकता: जब नीति-निर्माण में दोनों एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, तभी नैतिकता और दक्षता दोनों सुनिश्चित होती हैं।
  • लोकहित सर्वोपरि सिद्धांत: नीति चाहे कोई भी हो, उसका अंतिम उद्देश्य जनकल्याण होना चाहिए।
  • पारदर्शिता और जवाबदेही: नीति प्रक्रिया खुली और उत्तरदायी होनी चाहिए ताकि भ्रष्टाचार व पक्षपात न बढ़े।
  • मानवीय दृष्टिकोण: नीति बनाते समय समाज के कमजोर वर्गों के हितों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • दीर्घकालिक प्रभाव: नैतिक साधनों से बनी नीतियाँ स्थायी और व्यापक प्रभाव डालती हैं।
  • नैतिक नेतृत्व की भूमिका: नीति-निर्माताओं के व्यक्तिगत मूल्य पूरे प्रशासनिक तंत्र को प्रभावित करते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion – 2 lines):

लोक प्रशासन में साधनों की नैतिक पारदर्शिता को प्राथमिकता देना ही सच्चा सुशासन है। जब नीति निर्माण में नैतिक साधन और प्रभावी परिणाम साथ चलते हैं, तभी जनविश्वास और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा होती है।

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Examine the role of the following in the context of civil service. A) Moral code of conduct B) Work culture (8 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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सिविल सेवा के सन्दर्भ में निम्नलिखित भूमिका का परीक्षण कीजिए। अ) नीतिपरक आचार संहिता ब) कार्य संस्कृति

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

सिविल सेवा में नीतिपरक आचार संहिता और कार्य संस्कृति सुशासन (Good Governance) के आधार स्तंभ हैं। ये दोनों तत्व प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और जनसेवा की भावना को सशक्त बनाते हैं। इनका पालन प्रशासनिक दक्षता और जनविश्वास बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • नीतिपरक आचार संहिता सिविल सेवकों के नैतिक आचरण का मार्गदर्शन करती है।
  • यह निष्पक्षता, ईमानदारी और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता देने की प्रेरणा देती है।
  • कार्य संस्कृति प्रशासनिक व्यवहार, निर्णय प्रक्रिया और कार्य निष्पादन की शैली को दर्शाती है।
  • सकारात्मक कार्य संस्कृति नवाचार, टीमवर्क और परिणामोन्मुखता को बढ़ावा देती है।
  • नीतिपरक आचार संहिता भ्रष्टाचार और पक्षपात को रोकने में सहायक होती है।
  • आधुनिक प्रशासन में उत्तरदायित्व (Accountability) और पारदर्शिता पर बल दिया जाता है।
  • दोनों तत्व मिलकर प्रभावी, नैतिक और जनोन्मुख प्रशासन का निर्माण करते हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):

इस प्रकार नीतिपरक आचार संहिता और कार्य संस्कृति सिविल सेवा की आत्मा हैं। इनका समन्वय ही सुशासन और जनविश्वास की स्थायी नींव रखता है।

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What are the consequences of the ongoing Israel-Palestine conflict? How should India address the emerging challenges? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-2

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के क्या परिणाम हैं ? भारत को इससे उत्पन्न चुनौतियों का सामना कैसे करना चाहिए ?

Ans: परिचय:

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष (Israel-Palestine Conflict) मध्य पूर्व का सबसे पुराना और जटिल विवाद है, जिसकी जड़ें 1948 में इजराइल के गठन से जुड़ी हैं। यह संघर्ष धार्मिक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक कारणों से दशकों से जारी है। इसके परिणाम केवल क्षेत्रीय ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और भारत जैसे देशों पर भी प्रभाव डालते हैं।

मुख्य बिंदु:

  • मानवाधिकार संकट: संघर्ष में आम नागरिकों की मौत, विस्थापन और मानवीय त्रासदी बढ़ी है।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता: मध्य पूर्व में शांति और स्थायित्व लगातार प्रभावित हुआ है।
  • आतंकवाद का प्रसार: चरमपंथी संगठनों को हिंसा फैलाने का अवसर मिला।
  • वैश्विक तेल बाजार पर असर: पश्चिम एशिया में तनाव से तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है।
  • अंतर्राष्ट्रीय ध्रुवीकरण: अमेरिका, यूरोपीय संघ, अरब देशों और रूस की नीतियाँ एक-दूसरे से टकराती हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता पर प्रश्न: शांति प्रयास बार-बार असफल रहे हैं।
  • भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) पर खतरा: पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का प्रमुख स्रोत है।
  • प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: हजारों भारतीय नागरिक इस क्षेत्र में कार्यरत हैं।
  • राजनयिक संतुलन की चुनौती: भारत इजराइल और फिलिस्तीन दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है।
  • आर्थिक संबंधों पर प्रभाव: संघर्ष से व्यापार, रक्षा और तकनीकी सहयोग प्रभावित हो सकता है।
  • मानवीय दृष्टिकोण: भारत निरंतर “दो-राष्ट्र समाधान” (Two-State Solution) का समर्थन करता है।
  • संघर्ष की दीर्घता: क्षेत्रीय अस्थिरता भारत की पश्चिम एशिया नीति को जटिल बनाती है।
  • भारत के लिए चुनौतियों से निपटने के उपाय:
  • संतुलित कूटनीति अपनाकर दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना।
  • क्षेत्र में शांति प्रयासों का समर्थन और मानवीय सहायता प्रदान करना।
  • तेल आपूर्ति और प्रवासी सुरक्षा के लिए वैकल्पिक तंत्र विकसित करना।
  • वैश्विक मंचों पर शांति और सह-अस्तित्व की नीति को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष (Conclusion ):

इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष ने विश्व शांति और भारत की पश्चिम एशिया नीति दोनों को प्रभावित किया है। भारत को अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करते हुए संतुलित, मानवीय और शांति-समर्थक भूमिका निभानी चाहिए।

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Critically explain the efforts of the State Government towards strengthening the health infrastructure in Uttar Pradesh. (8 marks) UPPCS Mains 2024 GS-5

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उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य ढाँचे को मजबूत करने की दिशा में राज्य सरकार के प्रयासों की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।

Ans: परिचय (Introduction) –

 उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य ढाँचा लंबे समय से असमान वितरण और संसाधनों की कमी से जूझता रहा है। राज्य सरकार ने हाल के वर्षों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने और आधुनिक सुविधाओं को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए हैं। फिर भी, इन प्रयासों की प्रभावशीलता मिश्रित परिणाम दिखाती है।

मुख्य बिंदु (Important Points) –

  • मुख्यमंत्री आरोग्य योजना और आयुष्मान भारत के तहत निःशुल्क उपचार की सुविधा दी गई।
  • ई–संजय और टेलीमेडिसिन जैसी डिजिटल स्वास्थ्य पहलें ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंच बढ़ा रही हैं।
  • जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध कर विशेषज्ञ सेवाओं का विस्तार किया गया।
  • मिशन शक्ति और जननी सुरक्षा योजना के माध्यम से मातृ–शिशु स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित किया गया।
  • कोविड–19 के दौरान ऑक्सीजन संयंत्र और ICU बेड जैसी संरचनाएँ विकसित की गईं।
  • ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों और नर्सों की कमी अभी भी प्रमुख चुनौती है।
  • स्वास्थ्य बजट में बढ़ोतरी के बावजूद व्यवस्थापन और निगरानी की कमी बनी हुई है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

सरकार के प्रयासों से स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के संकेत मिलते हैं, परन्तु गुणवत्ता, मानव संसाधन और ग्रामीण पहुँच में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। सतत निवेश और पारदर्शी प्रबंधन ही स्वास्थ्य ढाँचे को सशक्त बना सकते हैं।

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What is the role of empathy in shaping the attitude of a civil servant? How it can enhance their interaction with the public? (8 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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एक लोकसेवक की अभिवृत्ति को आकार देने में समानुभूति की भूमिका क्या है? यह जनता के साथ उनकी अंतर्क्रिया को कैसे बढ़ा सकता है?

Ans: प्रस्तावना (Introduction ):

समानुभूति (Empathy) लोकसेवक की वह क्षमता है, जिससे वह दूसरों की भावनाओं, कठिनाइयों और दृष्टिकोण को समझ पाता है। यह मानवीय दृष्टिकोण से प्रशासन को अधिक संवेदनशील बनाती है। समानुभूति लोकसेवक की अभिवृत्ति (Attitude) और जनता के साथ उसके संबंधों को गहराई प्रदान करती है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • समानुभूति लोकसेवक में संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण विकसित करती है।
  • इससे वह नागरिकों की वास्तविक समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ पाता है।
  • निर्णय प्रक्रिया में मानव-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने में मदद करती है।
  • यह जनता के प्रति विश्वास और सहयोग की भावना को प्रोत्साहित करती है।
  • तनावपूर्ण या विवादित परिस्थितियों में संतुलित व्यवहार को बनाए रखती है।
  • शिकायत निवारण और सेवा वितरण को अधिक प्रभावी बनाती है।
  • समानुभूति से लोकसेवक जनता के साथ संवाद और विश्वास को मजबूत करता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

समानुभूति लोकसेवक की नैतिक और सामाजिक संवेदनशीलता का मूल है। यह उसकी अभिवृत्ति को जनोन्मुख बनाकर प्रभावी, उत्तरदायी प्रशासन की नींव रखती है।

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What should be the nature of civil service values for a public administrator? How can he create a balance between these values in his personal and public life? Explain. (12 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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लोक प्रशासन में कार्यरत अधिकारी के लिए सिविल सेवा मूल्यों का स्वरूप क्या होना चाहिए? वह अपने व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में इन मूल्यों के बीच कैसे संतुलन स्थापित कर सकता है? समझाइये।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

लोक प्रशासन में कार्यरत अधिकारी समाज और सरकार के बीच सेतु का कार्य करता है। उसके आचरण में सिविल सेवा मूल्यों का प्रतिबिंब जनविश्वास और सुशासन की नींव बनता है। अतः इन मूल्यों का स्पष्ट स्वरूप और संतुलित पालन अत्यंत आवश्यक है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • सत्यनिष्ठा (Integrity): ईमानदारी और नैतिकता को प्रत्येक कार्य का आधार बनाना।
  • निष्पक्षता (Impartiality): सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना, किसी भी दबाव से मुक्त रहना।
  • उत्तरदायित्व (Accountability): अपने निर्णयों और कार्यों के लिए जनता और सरकार के प्रति जवाबदेह रहना।
  • पारदर्शिता (Transparency): नीतियों और निर्णयों को स्पष्ट, सार्वजनिक और जाँच योग्य रखना।
  • लोकहित की भावना (Public Service Orientation): निजी लाभ से ऊपर जनहित को रखना।
  • कर्तव्यनिष्ठा (Dedication to Duty): प्रशासनिक कार्यों को समय पर और पूर्ण समर्पण से पूरा करना।
  • संवेदनशीलता (Empathy): विशेषकर कमजोर वर्गों की समस्याओं के प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखना।
  • व्यावसायिकता (Professionalism): ज्ञान, दक्षता और नैतिकता का संयोजन बनाए रखना।
  • शुचिता (Probity): पद की गरिमा बनाए रखते हुए भ्रष्टाचार रहित आचरण अपनाना।
  • साहसिकता (Courage of Conviction): सही निर्णय के लिए नैतिक साहस दिखाना, चाहे दबाव कोई भी हो।
  • संतुलन (Balance): निजी जीवन में सादगी, संयम और पारिवारिक मूल्यों का पालन करते हुए सार्वजनिक जीवन में निष्पक्षता बनाए रखना।
  • निरंतर आत्ममंथन (Self-evaluation): अपने आचरण की समय-समय पर समीक्षा करना ताकि नैतिकता बनी रहे।

निष्कर्ष (Conclusion):

सिविल सेवक के लिए नैतिक मूल्य केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि आचरण की रीढ़ हैं। जब वह निजी और सार्वजनिक जीवन दोनों में इन मूल्यों का संतुलन रखता है, तभी वह सच्चे अर्थों में जनसेवक कहलाता है।

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Discuss the various skills by which a public servant may enhance public commitment to the rules of law. (8 Marks) UPPCS Mains 2024 GS-4

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उन विभिन्न कौशलों की चर्चा कीजिए जिनके द्वारा एक लोक सेवक कानून के नियमों के प्रति जनता की प्रतिबद्धता को बढ़ा सकता है।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

लोक सेवक समाज और शासन के बीच सेतु का कार्य करता है। उसकी भूमिका केवल कानून लागू करने की नहीं, बल्कि जनता में कानून के प्रति सम्मान विकसित करने की भी होती है। इसके लिए उसे विविध प्रशासनिक, संवादात्मक और नैतिक कौशलों की आवश्यकता होती है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • संवाद कौशल: स्पष्ट, संवेदनशील और पारदर्शी संचार द्वारा नागरिकों को जागरूक करना।
  • नेतृत्व कौशल: उदाहरण प्रस्तुत कर कानून पालन की प्रेरणा देना।
  • नैतिक कौशल: ईमानदारी और निष्पक्षता से जनता का विश्वास अर्जित करना।
  • सहभागिता कौशल: निर्णय प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करना।
  • संघर्ष प्रबंधन कौशल: विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करना।
  • जनसंपर्क कौशल: जनता के साथ सकारात्मक संबंध बनाए रखना।
  • प्रेरणात्मक कौशल: नागरिकों को कानून के प्रति कर्तव्यबोध के लिए प्रेरित करना।

निष्कर्ष (Conclusion): इन कौशलों के माध्यम से लोक सेवक कानून के प्रति जन-प्रतिबद्धता को सुदृढ़ बना सकता है। इससे प्रशासन में विश्वास, अनुशासन और सहयोग की भावना विकसित होती है।

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You are a city commissioner. There is a reputed college in your city, which has the maximum number of girl students. The conditions of the toilets/washrooms in this college is very poor and pathetic due to which the girl students have to face many mental, physical and hygiene relate problems every day. The college administration is not paying any attention to these basic facilities of the girl students. As a city commissioner, what steps will you take to improve this basic facility of the girl students and against the indifference of the college administration? (Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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आप एक नगर आयुक्त हैं। आप के नगर में एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय स्थित है, जिसमें छात्राओं की संख्या काफी अधिक है। इस महाविद्यालय में शौचालय/प्रसाधन की स्थिति अत्यन्त दयनीय है, जिससे आये दिन छात्राओं को मानसिक, शारीरिक एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। महाविद्यालय प्रशासन छात्राओं की इस बुनियादी सुविधाओं पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। एक नगर आयुक्त के रूप में आप छात्राओं को इस बुनियादी सुविधाओं के सुधार के लिए महाविद्यालय प्रशासन की उदासीनता के विरुद्ध क्या कदम उठायेंगे? (12)

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

एक नगर आयुक्त के रूप में मेरी प्राथमिक जिम्मेदारी नगर के नागरिकों, विशेषकर छात्राओं, को सुरक्षित और स्वच्छ वातावरण प्रदान करना है। महाविद्यालयों में स्वच्छ शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएँ न केवल स्वास्थ्य बल्कि गरिमा और समानता से भी जुड़ी हैं। ऐसी स्थिति में प्रशासन की निष्क्रियता के विरुद्ध नैतिक, कानूनी और मानवीय दृष्टि से ठोस कदम आवश्यक हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • स्थिति का मूल्यांकन: सर्वप्रथम महाविद्यालय परिसर का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट तैयार करूँगा।
  • नोटिस जारी करना: महाविद्यालय प्रशासन को तत्काल सुधार हेतु औपचारिक नोटिस भेजा जाएगा।
  • समय-सीमा निर्धारण: स्वच्छता और शौचालय निर्माण/मरम्मत के लिए निश्चित समय सीमा तय की जाएगी।
  • जनस्वास्थ्य अधिनियम के तहत कार्यवाही: यदि सुधार नहीं होता, तो नगर निगम अधिनियम या जनस्वास्थ्य कानूनों के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
  • छात्राओं की शिकायत निवारण समिति: छात्राओं की समस्याएँ सीधे सुनने के लिए शिकायत प्रकोष्ठ बनाया जाएगा।
  • स्वच्छता निरीक्षण दल: नियमित अंतराल पर निरीक्षण हेतु विशेष दल गठित किया जाएगा।
  • स्वच्छता मिशन से सहयोग: ‘स्वच्छ भारत मिशन’ या CSR फंडिंग के माध्यम से वित्तीय सहयोग लिया जा सकता है।
  • जन-जागरूकता अभियान: छात्राओं में स्वच्छता, स्वास्थ्य और अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने हेतु अभियान चलाया जाएगा।
  • मीडिया पारदर्शिता: समस्या और उठाए गए कदमों की जानकारी स्थानीय मीडिया में साझा की जाएगी ताकि जवाबदेही बनी रहे।
  • स्थानीय जनप्रतिनिधियों से समन्वय: पार्षद या विधायक से समन्वय कर प्रशासनिक सहयोग प्राप्त किया जाएगा।
  • दीर्घकालिक योजना: भविष्य में नगर के सभी शैक्षणिक संस्थानों में स्वच्छता ऑडिट को अनिवार्य बनाया जाएगा।
  • नैतिक जिम्मेदारी: एक लोकसेवक के रूप में छात्राओं की गरिमा और स्वास्थ्य की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी।

निष्कर्ष (Conclusion):

नगर आयुक्त के रूप में मेरा उद्देश्य केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन के माध्यम से जनकल्याण सुनिश्चित करना है। स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय उपलब्ध कराना छात्राओं के अधिकार और गरिमा दोनों की रक्षा का प्रतीक है।

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Discuss the characteristics, causes and effects of Tsunami with example. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-1

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सुनामी की विशेषताओं, कारणों एवं प्रभावों का सोदाहरण विवेचन प्रस्तुत कीजिए ।

Ans: प्रस्तावना:

सुनामी समुद्र की गहराइयों में उत्पन्न होने वाली तीव्र ऊर्जा का परिणाम होती है, जो विशाल तरंगों के रूप में तटों की ओर बढ़ती है। यह प्राकृतिक आपदा अचानक और व्यापक विनाश करने की क्षमता रखती है। इसके कारण और प्रभाव भौगोलिक, भूवैज्ञानिक तथा मानवीय पहलुओं से गहराई से जुड़े होते हैं।

मुख्य बिंदु (Important Points) :

  • समुद्र तल में अचानक ऊर्जा विस्फोट—जैसे भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, भू-स्खलन आदि—सुनामी का प्रमुख कारण होता है।
  • अधिकांश सुनामी समुद्र के नीचे आने वाले टेक्टॉनिक भूकंपों से उत्पन्न होती हैं।
  • समुद्र में उठने वाली तरंगों की गति 700–800 किमी/घंटा तक पहुँच सकती है।
  • गहरे समुद्र में तरंगों की ऊँचाई कम होती है, जिससे वे दिखाई नहीं देतीं।
  • तटीय क्षेत्रों के पास पहुँचने पर जल की गहराई कम होने से तरंगों की ऊँचाई अचानक कई मीटर तक बढ़ जाती है।
  • सुनामी की तरंगें एकल नहीं होतीं; वे कई तरंगों की श्रृंखला के रूप में आती हैं।
  • सुनामी तट पर पहुंचकर बड़े पैमाने पर जन-हानि और संपत्ति क्षति का कारण बनती है।
  • तटीय पारिस्थितिकी तंत्र—जैसे मैंग्रोव, कोरल रीफ और समुद्री जैव विविधता—पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ता है।
  • पेयजल स्रोतों में खारे पानी के मिल जाने से जल-उपलब्धता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है।
  • सड़क, बंदरगाह, पुल, विद्युत और संचार जैसी आधारभूत संरचनाएँ व्यापक रूप से नष्ट हो जाती हैं।
  • सुनामी के बाद स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ—जैसे पानी से फैलने वाली बीमारियाँ—बढ़ने का खतरा रहता है।
  • प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, तटीय सुरक्षा संरचनाएँ और सामुदायिक जागरूकता से इसके प्रभावों को कम किया जा सकता है।

निष्कर्ष : सुनामी एक जटिल प्राकृतिक घटना है जिसका प्रभाव मानव जीवन, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर गहरा पड़ता है। समुचित तैयारी, वैज्ञानिक समझ और चेतावनी तंत्र ही इसके विनाशकारी प्रभावों को न्यूनतम कर सकते हैं।

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