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Review the contribution of the public distribution system in poverty alleviation. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-2

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गरीबी उन्मूलन हेतु सार्वजनिक वितरण प्रणाली के योगदान की समीक्षा कीजिए।

Ans: परिचय:

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System – PDS) भारत में गरीबों को सस्ते दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने की एक प्रमुख योजना है। यह खाद्य सुरक्षा और सामाजिक न्याय दोनों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका मुख्य उद्देश्य भूखमरी को समाप्त करना और जीवन स्तर में सुधार लाना है।

मुख्य बिंदु:

  • PDS के माध्यम से गेहूँ, चावल, चीनी व केरोसिन जैसी आवश्यक वस्तुएँ रियायती दरों पर दी जाती हैं।
  • यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के तहत कानूनी अधिकार के रूप में लागू है।
  • गरीबों की क्रय शक्ति बढ़ाकर आर्थिक असमानता को घटाती है।
  • ग्रामीण व शहरी गरीबों को न्यूनतम जीवन आवश्यकताएँ सुनिश्चित करती है।
  • Targeted PDS (TPDS) द्वारा कमजोर वर्गों को विशेष प्राथमिकता दी गई।
  • मध्याह्न भोजन योजना और अन्त्योदय अन्न योजना जैसी योजनाएँ PDS से जुड़ी हैं।
  • वितरण प्रणाली में ई-राशन कार्ड और डिजिटल निगरानी से पारदर्शिता बढ़ी है।

निष्कर्ष:

सार्वजनिक वितरण प्रणाली ने भारत में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर गरीबी उन्मूलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि इसे और पारदर्शी व कुशल बनाया जाए, तो यह सामाजिक न्याय का सशक्त उपकरण बन सकती है।

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How does the Indian Constitution ensure the independence of the judiciary? Discuss the importance of the basic structure doctrine. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-2

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भारतीय संविधान न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को कैसे सुनिश्चित करता है ? मूल संरचना सिद्धान्त के महत्त्व पर चर्चा कीजिए।

Ans: परिचय:

भारतीय संविधान में न्यायपालिका को लोकतंत्र का संरक्षक माना गया है। इसकी स्वतंत्रता नागरिक अधिकारों की रक्षा और सत्ता के दुरुपयोग पर नियंत्रण के लिए अनिवार्य है। मूल संरचना सिद्धांत ने इस स्वतंत्रता को संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की है।

मुख्य बिंदु:

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं कार्यकाल संविधान के अनुच्छेद 124–147 (सुप्रीम कोर्ट) और 214–231 (हाई कोर्ट) में निर्धारित हैं।
  • न्यायाधीशों को विधायिका या कार्यपालिका के दबाव से मुक्त रखा गया है।
  • वेतन, भत्ते और सेवा शर्तें संसद के नियंत्रण से बाहर रखी गई हैं।
  • न्यायाधीशों को केवल महाभियोग प्रक्रिया द्वारा ही हटाया जा सकता है।
  • न्यायपालिका को न्यायिक पुनर्विलोकन (Judicial Review) का अधिकार प्राप्त है।
  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने “मूल संरचना सिद्धांत” प्रतिपादित किया।
  • इस सिद्धांत के अनुसार, संविधान का संशोधन उसकी मूल आत्मा — जैसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, विधि का शासन, और मौलिक अधिकार — को नष्ट नहीं कर सकता।

निष्कर्ष:

न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है। मूल संरचना सिद्धांत ने इसे स्थायी संरक्षण देकर संविधान की सर्वोच्चता और नागरिक स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया है।

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What are the special legislative powers of the Council of States (Rajya Sabha)? Discuss. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-2

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राज्य सभा की विशिष्ट विधायी शक्तियाँ क्या हैं ? विवेचना कीजिए।

Ans: परिचय:

राज्यसभा भारतीय संसद का उच्च सदन है, जो संघ की स्थायित्व और संतुलन का प्रतीक है। यह न केवल विधायी प्रक्रिया में भाग लेती है, बल्कि विशेष परिस्थितियों में लोकसभा से भिन्न शक्तियाँ भी रखती है। इसका उद्देश्य राज्यों के हितों की रक्षा करना है।

मुख्य बिंदु:

  • राज्यसभा किसी विषय को राज्य सूची से समवर्ती सूची में लाने के लिए अनुच्छेद 249 के अंतर्गत प्रस्ताव पारित कर सकती है।
  • अनुच्छेद 312 के तहत नवीन अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन की अनुशंसा कर सकती है।
  • यह राष्ट्रपति द्वारा जारी आपातकालीन घोषणाओं को अनुमोदित कर सकती है।
  • लोकसभा के विघटन की स्थिति में भी कार्य करती रहती है।
  • किसी विधेयक पर पुनर्विचार का सुझाव देकर कानून निर्माण को संतुलित बनाती है।
  • अंतर्राष्ट्रीय संधियों और नीतिगत मुद्दों पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
  • राज्यों के हितों की रक्षा हेतु संघीय संतुलन बनाए रखती है।

निष्कर्ष:

राज्यसभा भारतीय संघ की एकता और स्थिरता की संवैधानिक गारंटी है। इसकी विशिष्ट शक्तियाँ संसद को अधिक संतुलित, विचारशील और संघीय चरित्र प्रदान करती हैं।

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Write the role of NITI Aayog in the development of India. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-2

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भारत के विकास में नीति आयोग की भूमिका लिखिए।

Ans: परिचय:

नीति आयोग (NITI Aayog) की स्थापना 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग के स्थान पर की गई। इसका उद्देश्य सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना और राज्यों को विकास की मुख्य धारा में शामिल करना है। यह देश के समग्र और संतुलित विकास के लिए नीति निर्माण की दिशा तय करता है।

मुख्य बिंदु:

  • नीति आयोग थिंक टैंक के रूप में कार्य करता है, जो सरकार को नीतिगत सलाह देता है।
  • यह राज्यों की आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएँ बनाने में सहयोग करता है।
  • सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद को प्रोत्साहित करता है।
  • दीर्घकालिक विकास हेतु सतत विकास लक्ष्य (SDGs) को अपनाया गया है।
  • आयोग नीति निर्माण में डेटा विश्लेषण और नवाचार को प्राथमिकता देता है।
  • आयुष्मान भारत, अटल इनोवेशन मिशन जैसी योजनाओं की निगरानी करता है।
  • आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन आधारित विकास को दिशा देता है।

निष्कर्ष:

नीति आयोग ने योजना आधारित अर्थव्यवस्था को नीति-आधारित विकास मॉडल में परिवर्तित किया। यह भारत को नवोन्मेषी, समावेशी और आत्मनिर्भर विकास की ओर अग्रसर कर रहा है।

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Write a short note on the composition of the Constituent Assembly. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-2

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संविधान सभा की संरचना पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

Ans:  परिचय:

भारत की संविधान सभा का गठन ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मिशन योजना (1946) के अनुसार किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य स्वतंत्र भारत के लिए संविधान बनाना था। यह सभा देश की विविध सामाजिक, राजनीतिक एवं भौगोलिक इकाइयों का प्रतिनिधित्व करती थी।

मुख्य बिंदु:

  • संविधान सभा का गठन 1946 में हुआ।
  • इसमें प्रारंभ में 389 सदस्य थे (292 प्रांतीय, 93 रियासतों से, 4 चीफ कमिशनर क्षेत्रों से)।
  • सदस्य प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से चुने गए।
  • सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई।
  • डॉ. राजेन्द्र प्रसाद अध्यक्ष तथा बी.एन. राव संवैधानिक सलाहकार थे।
  • विभाजन के बाद सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई।
  • यह सभा संविधान निर्माण के साथ-साथ संविधान लागू होने तक विधायिका के रूप में भी कार्य करती रही।

निष्कर्ष:

संविधान सभा भारतीय लोकतंत्र की नींव थी जिसने विविध विचारों को समाहित कर एक सशक्त संविधान बनाया। इसकी संरचना भारत की एकता और प्रतिनिधिक भावना का प्रतीक थी।

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Discuss the functions of National Security Council of India. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के क्रिया कलापों की व्याख्या कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (National Security Council – NSC) की स्थापना वर्ष 1998 में देश की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के समन्वित निर्धारण और रणनीतिक मार्गदर्शन के लिए की गई थी। यह भारत की सर्वोच्च सलाहकारी संस्था है, जो आंतरिक, बाह्य, आर्थिक और सामरिक खतरों से निपटने हेतु समग्र सुरक्षा दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का गठन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में किया गया है।
  • इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित नीतिगत सलाह देना और विभिन्न मंत्रालयों, एजेंसियों एवं सशस्त्र बलों के बीच समन्वय स्थापित करना है।
  • परिषद की संरचना तीन स्तरों पर आधारित है:
  • राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) – नीति निर्धारण निकाय।
  • स्ट्रैटेजिक पॉलिसी ग्रुप (SPG) – रणनीतिक नीतियों पर विचार-विमर्श।
  • नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर बोर्ड (NSAB) – विशेषज्ञ सलाह व अनुसंधान।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) परिषद के कार्यों का समन्वयन करता है और प्रधानमंत्री को प्रत्यक्ष सलाह देता है।
  • परिषद आतंकवाद, सीमा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, रक्षा नीति, आंतरिक विद्रोह और ऊर्जा सुरक्षा जैसे विषयों पर विचार करती है।
  • यह खुफिया एजेंसियों, विदेश नीति और रक्षा तंत्र के बीच सूचना-साझाकरण को सुदृढ़ करती है।
  • NSC संकट प्रबंधन तंत्र (Crisis Management Group) के माध्यम से आपात स्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करती है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के निर्माण में दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण विकसित करना इसका मुख्य कार्य है।
  • परिषद भारत की “एकीकृत सुरक्षा संरचना” (Integrated Security Framework) का केंद्रीय स्तंभ मानी जाती है।
  • NSAB द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टें और नीति सुझाव सरकार की रक्षा एवं विदेश नीतियों को दिशा प्रदान करते हैं।
  • यह वैश्विक सुरक्षा परिवर्तनों के अनुरूप भारत की सुरक्षा प्राथमिकताओं को अद्यतन रखती है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

इस प्रकार, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद भारत की समग्र सुरक्षा व्यवस्था का बौद्धिक और नीतिगत केंद्र है। यह संस्था राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए आंतरिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के बीच प्रभावी संतुलन स्थापित करती है।

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Narco-terrorism has emerged as a serious threat across the country. Suggest suitable measures to counter it. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

पूरे देश में नार्को-आतंकवाद एक गंभीर खतरे के रूप में उभरा है । इससे निपटने के लिये उपयुक्त उपाय सुझाइये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

नार्को-आतंकवाद (Narco-Terrorism) का आशय है मादक पदार्थों (Drugs) की तस्करी से प्राप्त धन का उपयोग आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण में करना। हाल के वर्षों में यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता और युवा पीढ़ी के लिए एक गंभीर खतरे के रूप में उभरा है, विशेषकर सीमावर्ती राज्यों जैसे पंजाब, जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • आतंकवादी संगठन ड्रग व्यापार से अर्जित धन का प्रयोग हथियार खरीद, प्रशिक्षण और नेटवर्क विस्तार में करते हैं।
  • भारत की भौगोलिक स्थिति—“Golden Crescent” (अफगानिस्तान-पाकिस्तान-ईरान) और “Golden Triangle” (म्यांमार-लाओस-थाईलैंड)—के बीच होने से इसे दोहरे खतरे का सामना है।
  • युवाओं में नशे की लत सामाजिक अस्थिरता और अपराध दर को बढ़ा रही है।
  • NDPS Act, 1985 (Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act) के तहत मादक पदार्थों की तस्करी पर कड़ा नियंत्रण है।
  • Narcotics Control Bureau (NCB), BSF और Indian Coast Guard ड्रग तस्करी पर निगरानी रखते हैं।
  • सीमा पार निगरानी को मज़बूत करने हेतु “स्मार्ट फेंसिंग”, ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है।
  • Enforcement Directorate (ED) और Financial Intelligence Unit (FIU) मनी लॉन्ड्रिंग पर निगरानी रखती हैं।
  • UNODC व SAARC Drug Control Programme के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सशक्त किया गया है।
  • स्कूल-कॉलेज स्तर पर Drug-Free India जैसे अभियानों से जन-जागरूकता बढ़ाई जा रही है।
  • नशा पीड़ितों के पुनर्वास केंद्रों के विस्तार पर भी बल दिया जा रहा है।
  • सीमा क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी को बढ़ाना प्रभावी रणनीति सिद्ध हो सकती है।
  • आधुनिक साइबर निगरानी से ऑनलाइन ड्रग नेटवर्क पर अंकुश लगाया जा सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

स्पष्ट है कि नार्को-आतंकवाद केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्थिरता का भी प्रश्न है। सख्त कानून, उन्नत तकनीक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जन-जागरूकता के समन्वय से ही भारत इस जटिल खतरे का स्थायी समाधान पा सकता है।

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What are ‘Social Networking Sites’ and how does their uncontrolled use increase the possibilities of cyber attacks? [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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‘सामाजिक संजाल स्थल’ क्या होते हैं ? और इनका अनियंत्रित उपयोग साइबर हमलों की संभावनाओं में किस प्रकार वृद्धि करता है ?

Ans: भूमिका (Introduction) –

‘सामाजिक संजाल स्थल’ (Social Networking Sites) वे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म हैं जहाँ उपयोगकर्ता आपसी संवाद, विचार, सूचना और सामग्री का आदान-प्रदान करते हैं। जैसे – फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर (X), यूट्यूब, लिंक्डइन आदि। ये आज सामाजिक सहभागिता और सूचना प्रसार का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • सामाजिक संजाल स्थल लोगों को जोड़ने, अभिव्यक्ति और सूचना साझा करने का अवसर देते हैं।
  • ये व्यवसाय, शिक्षा, राजनीति और जन-जागरूकता के प्रभावी साधन बन चुके हैं।
  • परंतु इनका अनियंत्रित और असावधान उपयोग साइबर सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है।
  • उपयोगकर्ता अपनी व्यक्तिगत जानकारी, फोटो, लोकेशन और बैंक विवरण साझा करते हैं, जिन्हें साइबर अपराधी दुरुपयोग कर सकते हैं।
  • फिशिंग (Phishing) और मैलवेयर (Malware) जैसे हमले अक्सर सोशल मीडिया लिंक के माध्यम से फैलते हैं।
  • नकली प्रोफाइल और फेक न्यूज़ से न केवल भ्रम फैलता है, बल्कि डेटा चोरी और पहचान की जालसाजी भी बढ़ती है।
  • सोशल इंजीनियरिंग (Social Engineering) तकनीक द्वारा हैकर्स लोगों को भावनात्मक रूप से भ्रमित कर पासवर्ड या निजी जानकारी प्राप्त करते हैं।
  • अनियंत्रित उपयोग से डेटा लीकेज, गोपनीयता भंग और राष्ट्रीय सुरक्षा तक को खतरा हो सकता है।
  • साइबर हमले अक्सर सोशल मीडिया पर साझा लापरवाह जानकारी के कारण संभव होते हैं।
  • भारत में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट, 2000 तथा CERT-In जैसी संस्थाएँ साइबर सुरक्षा की निगरानी करती हैं।
  • सरकार “डिजिटल साक्षरता अभियान” के माध्यम से नागरिकों को जागरूक करने का प्रयास कर रही है।
  • उपयोगकर्ताओं को मजबूत पासवर्ड, दो-स्तरीय प्रमाणीकरण और सावधानीपूर्ण साझा करने की आदत अपनानी चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion) –

इस प्रकार, सामाजिक संजाल स्थल जहाँ संवाद का सशक्त माध्यम हैं, वहीं अनियंत्रित उपयोग साइबर हमलों की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा देता है। इनका सुरक्षित, जिम्मेदार और जागरूक उपयोग ही डिजिटल युग में सुरक्षा और विश्वास का आधार बन सकता है।

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What are the ecologically sensitive areas in India? Mention the policies of the Government of India for their protection. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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भारत में पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र कौन-कौन से हैं ? इनके संरक्षण के लिये भारत सरकार की नीतियों का उल्लेख कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारत अपनी भौगोलिक विविधता और जैविक समृद्धि के कारण कई पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (Ecologically Sensitive Areas – ESAs) का घर है। ये क्षेत्र पारिस्थितिक संतुलन, जलवायु स्थिरता और जैव विविधता संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनके संरक्षण हेतु भारत सरकार ने अनेक नीतियाँ व कानूनी उपाय अपनाए हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र वे होते हैं जहाँ मानव हस्तक्षेप से पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो सकता है।
  • भारत में प्रमुख संवेदनशील क्षेत्र हैं –
  • पश्चिमी घाट (Western Ghats) – यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल, जैव विविधता से समृद्ध।
  • हिमालयी क्षेत्र – हिमनद, नदियों के स्रोत और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र।
  • सुंदरबन डेल्टा – विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र।
  • अंडमान-निकोबार द्वीप समूह – समुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध
  • मरुस्थलीय क्षेत्र (थार रेगिस्तान) – शुष्क पारिस्थितिक संतुलन वाला क्षेत्र।
  • पूर्वोत्तर भारत – उच्च वर्षा और घनी वनस्पति वाला पारिस्थितिक क्षेत्र।
  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत इन क्षेत्रों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है।
  • ईको-सेंसिटिव जोन (ESZ) नीति के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों के आसपास सीमित मानवीय गतिविधियाँ अनुमति-प्राप्त होती हैं।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र की निगरानी करता है।
  • CAMPA (Compensatory Afforestation Fund Management Act, 2016) वनों के क्षरण की भरपाई हेतु लागू है।
  • नेशनल मिशन ऑन हिमालयन स्टडीज़ हिमालय क्षेत्र के संरक्षण पर केंद्रित है।
  • ग्रीन इंडिया मिशन और राष्ट्रीय कार्य योजना जलवायु परिवर्तन पर (NAPCC) पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को प्रोत्साहित करते हैं।
  • ई-कोरिडोर परियोजनाएँ वन्यजीवों की आवाजाही और आवास संरक्षण के लिए लागू हैं।
  • स्थानीय समुदायों को संरक्षण कार्यों में शामिल करने की नीति ने स्थायी परिणाम दिए हैं।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः भारत के पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील क्षेत्र न केवल पर्यावरणीय संतुलन के प्रतीक हैं, बल्कि मानव अस्तित्व के लिए भी आवश्यक हैं। सरकार की नीतियाँ यदि वैज्ञानिक दृष्टि और स्थानीय सहभागिता के साथ लागू हों, तो इनका संरक्षण स्थायी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।

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Compare Indian Knowledge Tradition based aeronautics with modern aeronautics. Mention the policies of the Department of Science and Technology for the research in this field. [Marks-12] UPPCS Mains 2024 GS-3

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भारतीय ज्ञान परम्परा आधारित वैमानिकी शास्त्र की तुलना आधुनिक वैमानिकी शास्त्र से कीजिये । इस क्षेत्र में अनुसंधान हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की नीतियों का उल्लेख कीजिये ।

Ans: भूमिका (Introduction) –

भारतीय ज्ञान परम्परा में वैमानिकी शास्त्र (Aeronautics) का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों जैसे विमानिका शास्त्र और संहिताओं में मिलता है, जिनमें उड़ने वाले यंत्रों, उनकी संरचना और संचालन सिद्धांतों का वर्णन किया गया है। आधुनिक वैमानिकी शास्त्र (Modern Aeronautics) वैज्ञानिक परीक्षणों, भौतिकी के सिद्धांतों और प्रौद्योगिकी के प्रयोग पर आधारित है। दोनों की तुलना परंपरा और विज्ञान के विकासक्रम को दर्शाती है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • प्राचीन वैमानिकी शास्त्र में वायुयान के प्रकार, ईंधन, दिशा नियंत्रण एवं गति का वर्णन मिलता है।
  • यह ज्यामिति, यांत्रिकी और धातु विज्ञान के प्रारंभिक स्वरूपों से जुड़ा था।
  • आधुनिक वैमानिकी वायुगतिकी (Aerodynamics), प्रणोदन (Propulsion), सामग्री विज्ञान (Material Science) और इलेक्ट्रॉनिक्स पर आधारित है।
  • भारतीय परम्परा में यह अवधारणा वैचारिक और सैद्धांतिक थी; आधुनिक विज्ञान ने इसे प्रयोगात्मक रूप दिया।
  • आज वैमानिकी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और नैनो प्रौद्योगकी का प्रयोग बढ़ रहा है।
  • प्राचीन ग्रंथों का पुनःअध्ययन भारतीय वैज्ञानिक सोच की ऐतिहासिक गहराई को उजागर करता है।
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) इस क्षेत्र में Indigenous Knowledge Systems (IKS) पर अनुसंधान को प्रोत्साहित कर रहा है।
  • DST ने “भारतीय ज्ञान प्रणाली केंद्र” (IKS Division) की स्थापना कर पारंपरिक विज्ञान के वैज्ञानिक विश्लेषण को बढ़ावा दिया है।
  • एयरोस्पेस अनुसंधान हेतु DST-AR&DB (Aeronautics Research and Development Board) विभिन्न संस्थानों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
  • यह नीतियाँ प्राचीन सिद्धांतों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं।
  • ISRO और DRDO भी वैमानिकी के क्षेत्र में स्वदेशी नवाचारों को प्रोत्साहित कर रहे हैं।
  • नीति का उद्देश्य भारत को आत्मनिर्भर वैमानिकी प्रौद्योगिकी (Aatmanirbhar Aeronautics) के क्षेत्र में अग्रणी बनाना है।

निष्कर्ष (Conclusion) –

अतः कहा जा सकता है कि भारतीय वैमानिकी परम्परा ने वैचारिक आधार प्रदान किया, जबकि आधुनिक वैमानिकी ने उसे वैज्ञानिक रूप दिया। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की नीतियाँ इन दोनों के समन्वय से भारत को प्राचीन ज्ञान और आधुनिक अनुसंधान के संगम पर अग्रसर कर रही हैं।

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