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India is experiencing the phase of population-dividend’. In this context, discuss the measures adopted by the Government to tackle appropriately the problem of unemployment in the country. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-3

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भारत जनसंख्या-लाभांश की अवस्था से गुजर रहा है’। इस परिप्रेक्ष्य में, देश में बेरोजगारी की समस्या से समोपयुक्त तरीके से निपटने के लिये सरकार द्वारा अपनाये गये उपायों की विवेचना कीजिये ।

Ans: परिचय (Introduction):

भारत वर्तमान में जनसंख्या-लाभांश (Demographic Dividend) की अवस्था में है, जहाँ कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या अधिक है। यदि इस विशाल मानव संसाधन का सही उपयोग न हो, तो यह लाभांश बेरोजगारी की चुनौती में बदल सकता है। इसलिए सरकार ने रोजगार सृजन हेतु अनेक नीतिगत उपाय अपनाए हैं।

मुख्य उपाय (Key Measures):

  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) – सूक्ष्म उद्योगों के माध्यम से स्वरोजगार को बढ़ावा।
  • मेक इन इंडिया – विनिर्माण क्षेत्र में निवेश व रोजगार के अवसरों में वृद्धि।
  • स्किल इंडिया मिशन – युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर रोजगारयोग्य बनाना।
  • स्टार्टअप इंडिया और मुद्रा योजना – नवाचार व उद्यमिता को प्रोत्साहन।
  • मनरेगा (MGNREGA) – ग्रामीण स्तर पर रोजगार की गारंटी और आय-सुरक्षा।
  • डिजिटल इंडिया – आईटी एवं ऑनलाइन सेवाओं में नए रोजगार अवसरों का सृजन।
  • राष्ट्रीय रोजगार नीति – औपचारिक रोजगार बढ़ाने हेतु दीर्घकालिक रणनीति।

निष्कर्ष (Conclusion):

सरकारी योजनाओं ने युवाओं को कौशल, वित्त और अवसर प्रदान कर रोजगार परिदृश्य को सशक्त किया है। यदि शिक्षा, उद्योग और नीति के बीच समन्वय बना रहे, तो भारत अपने जनसंख्या-लाभांश को वास्तविक आर्थिक शक्ति में बदल सकता है।

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How does the New Economic Policy change the structure of employment in India ? Evaluate. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-3

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नई आर्थिक नीति ने किस प्रकार भारत में रोजगार के ढाँचे को परिवर्तित किया है ? मूल्यांकन कीजिये ।

Ans: परिचय (Introduction):

1991 में लागू की गई नई आर्थिक नीति (New Economic Policy – NEP) के तीन मुख्य घटक थे — उदारीकरण (Liberalization), निजीकरण (Privatization) और वैश्वीकरण (Globalization)। इस नीति ने भारत की अर्थव्यवस्था को खुले बाजार से जोड़ा और रोजगार संरचना में व्यापक परिवर्तन लाए।

मुख्य प्रभाव (Key Impacts):

  • सेवा क्षेत्र का विस्तार – आईटी, बैंकिंग, टेलीकॉम जैसे क्षेत्रों में रोजगार तेजी से बढ़ा।
  • असंगठित क्षेत्र में वृद्धि – लचीले श्रम बाज़ार के कारण अस्थायी व अनुबंधित नौकरियों में वृद्धि हुई।
  • औद्योगिक रोजगार में गिरावट – स्वचालन और प्रतिस्पर्धा से पारंपरिक उद्योगों में नौकरियाँ घटीं।
  • महिला रोजगार में परिवर्तन – सेवा और लघु उद्योगों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी।
  • कौशल आधारित रोजगार – उच्च शिक्षा व तकनीकी दक्षता की माँग बढ़ी।
  • ग्रामीण-शहरी असमानता – ग्रामीण रोजगार अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ा।
  • स्वरोजगार व स्टार्टअप संस्कृति – उद्यमिता को प्रोत्साहन मिला।

निष्कर्ष (Conclusion): नई आर्थिक नीति ने भारत के रोजगार ढाँचे को पारंपरिक कृषि आधारित से सेवा व कौशल आधारित अर्थव्यवस्था में रूपांतरित किया। यद्यपि इससे अवसर बढ़े, परंतु असमानता और अस्थायी रोजगार जैसी चुनौतियाँ भी उभरीं।

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Was the ‘Bhoodan Movement’ a part of land reforms in India ? Discuss its major effects. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-3

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‘भूदान आन्दोलन’ भारत में भूमि सुधार का एक हिस्सा था ? इसके प्रमुख प्रभावों की विवेचना कीजिये ।

Ans: परिचय (Introduction):

‘भूदान आन्दोलन’ (Bhoodan Movement) की शुरुआत 1951 में आचार्य विनोबा भावे ने की थी, जिसका उद्देश्य भूमिहीन किसानों को स्वेच्छा से दान में भूमि दिलाना था। यह आंदोलन अहिंसा और स्वैच्छिक सहयोग पर आधारित था।

मुख्य प्रभाव (Key Impacts):

  • भूमि सुधार का नैतिक पहलू – यह आंदोलन कानूनी न होकर नैतिक भूमि पुनर्वितरण का माध्यम बना।
  • भूमिहीनों को भूमि प्राप्ति – लाखों एकड़ भूमि दान में मिलने से गरीब किसानों को जमीन मिली।
  • सामाजिक समरसता – जमींदारों और किसानों के बीच संबंधों में सुधार हुआ।
  • ग्राम स्वराज की भावना – गांवों में आत्मनिर्भरता और सहयोग की भावना को बढ़ावा मिला।
  • सरकारी भूमि सुधारों पर प्रभाव – इस आंदोलन ने सरकार को भूमि सुधार नीतियाँ अपनाने के लिए प्रेरित किया।
  • सीमित सफलता – कई मामलों में दान की गई भूमि कानूनी या उपयोगी नहीं थी।
  • आन्दोलन का प्रसार – बाद में ग्रामदान, संपत्तिदान जैसे आंदोलनों में भी विस्तार हुआ।

निष्कर्ष (Conclusion):

भूदान आन्दोलन को भारत में भूमि सुधार का नैतिक व सामाजिक अंग कहा जा सकता है। यद्यपि इसकी सीमाएँ थीं, परंतु इसने ग्रामीण चेतना और समानता की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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Give a brief account of measures adopted by the Government to provide adequate credit to the farmers. [Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-3

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किसानों को पर्याप्त ऋण प्रदान करने के लिये सरकार द्वारा अपनाये गये उपायों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत कीजिये ।

Ans: परिचय (Introduction):

कृषि क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, परंतु किसानों के सामने वित्तीय संसाधनों की कमी एक प्रमुख चुनौती रही है। इस समस्या के समाधान हेतु सरकार ने विभिन्न योजनाओं और संस्थागत उपायों के माध्यम से सुलभ एवं सस्ते ऋण की व्यवस्था की है।

मुख्य उपाय (Key Measures):

  • कृषि ऋण पर ब्याज सब्सिडी योजना (Interest Subvention Scheme) — समय पर भुगतान करने वाले किसानों को रियायती ब्याज दर।
  • किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card – KCC) — लघु अवधि के ऋण के लिए सरल व त्वरित सुविधा।
  • नाबार्ड (NABARD) — ग्रामीण बैंकों को पुनर्वित्त सुविधा प्रदान कर कृषि निवेश को बढ़ावा।
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) — ऋण सुरक्षा हेतु फसल हानि पर बीमा कवरेज।
  • ग्रामीण बैंक एवं सहकारी समितियाँ — ऋण वितरण का विकेन्द्रित तंत्र।
  • डिजिटल ऋण प्रणाली — आधार आधारित त्वरित ऋण स्वीकृति।
  • सरकारी गारंटी योजनाएँ — कृषि निवेशकों को जोखिम संरक्षण।

निष्कर्ष (Conclusion):

इन उपायों से किसानों की ऋण पहुँच में सुधार हुआ है, जिससे उत्पादन, निवेश और ग्रामीण आय में वृद्धि संभव हुई है। सतत वित्तीय सहयोग से कृषि क्षेत्र आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है।

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Highlight the key components of upstream and downstream activities in food processing supply chain management with suitable examples.[Marks-8] UPPCS Mains 2024 GS-3

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खाद्य प्रसंस्करण की आपूर्ति श्रृंखला प्रबन्धन में ऊर्ध्व प्रवाह तथा अधो प्रवाह क्रियाओं के प्रमुख अवयवों को सोदाहरण चिन्हांकित कीजिये ।

Ans: परिचय (Introduction):

खाद्य प्रसंस्करण की आपूर्ति श्रृंखला (Food Processing Supply Chain) एक ऐसी प्रणाली है जो कच्चे कृषि उत्पादों को उपभोक्ता तक पहुँचने योग्य तैयार खाद्य में बदलती है। इसमें ऊर्ध्व प्रवाह (Upstream) और अधो प्रवाह (Downstream) दोनों चरण शामिल होते हैं। इन दोनों का कुशल प्रबंधन खाद्य गुणवत्ता, लागत और समयबद्ध वितरण सुनिश्चित करता है।

मुख्य अवयव (Key Components):

  • ऊर्ध्व प्रवाह क्रियाएँ (Upstream Activities):
  • कृषि उत्पादन एवं कच्चे माल की आपूर्ति
  • संग्रहण, ग्रेडिंग और प्राथमिक प्रसंस्करण
  • किसानों, आपूर्तिकर्ताओं और प्रसंस्करण इकाइयों के बीच समन्वय
  • अधो प्रवाह क्रियाएँ (Downstream Activities):
  • प्रसंस्कृत उत्पादों का पैकेजिंग और भंडारण
  • वितरण नेटवर्क एवं लॉजिस्टिक्स
  • थोक, खुदरा और ई-कॉमर्स विपणन
  • उपभोक्ता प्रतिक्रिया और गुणवत्ता प्रबंधन

निष्कर्ष (Conclusion):

इस प्रकार, ऊर्ध्व एवं अधो प्रवाह दोनों की दक्षता से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में मूल्यवर्धन होता है। इनका समुचित समन्वय खाद्य सुरक्षा, निर्यात वृद्धि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करता है।

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“An environmental movement led by youth’s gain popularity through social media, rallies and collaboration with influences and scientists with time the movement gained public support and let the government to propose changes in the policy.” What will be your stand to cope with the situation as a civil servant? (Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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“युवाओं द्वारा संचालित एक पर्यावरणीय आंदोलन सोशल मीडिया, रैलियों और प्रभावकारी व्यक्तियों और वैज्ञानिकों के साथ सहयोग के माध्यम से लोकप्रियता प्राप्त करता है। समय के साथ इस आंदोलन ने सार्वजनिक समर्थन प्राप्त किया और सरकार को नीति में बदलाव का प्रस्ताव देने के लिए प्रेरित किया।” एक सिविल सेवक के रूप में इस स्थिति से निपटने के लिए आप का क्या रुख होगा?

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

युवाओं द्वारा संचालित पर्यावरणीय आंदोलन सामाजिक जागरूकता और लोकतांत्रिक भागीदारी का सशक्त उदाहरण है। एक सिविल सेवक के रूप में मेरा दायित्व होगा कि मैं इस आंदोलन को संवेदनशील, संवादात्मक और नीति-उन्मुख दृष्टिकोण से देखूँ। ऐसे आंदोलनों में प्रशासन को संतुलन रखना होता है—जनहित और नीतिगत व्यवहार्यता दोनों के बीच।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. संवाद स्थापित करना: आंदोलन के नेताओं से सकारात्मक बातचीत शुरू करना ताकि उनकी मांगें स्पष्ट रूप से समझी जा सकें।

2. तथ्यों का अध्ययन: आंदोलन से जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों, रिपोर्टों और विशेषज्ञ मतों का निष्पक्ष विश्लेषण करना।

3. पारदर्शिता: जनता को यह बताना कि सरकार पर्यावरणीय मुद्दों पर क्या कदम उठा रही है।

4. नीति समीक्षा: संबंधित विभागों के साथ मिलकर नीतियों का मूल्यांकन कर आवश्यक संशोधन का प्रस्ताव देना।

5. युवा सहभागिता: आंदोलन के प्रतिनिधियों को नीति-निर्माण प्रक्रिया में परामर्शदाता के रूप में शामिल करना।

6. संतुलित दृष्टिकोण: पर्यावरणीय संरक्षण और विकास की आवश्यकताओं के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाना।

7. वैज्ञानिक सहयोग: पर्यावरण वैज्ञानिकों और अनुसंधान संस्थानों की राय को निर्णय प्रक्रिया में सम्मिलित करना।

8. सोशल मीडिया प्रबंधन: सकारात्मक सूचना साझा कर अफवाहों और गलत सूचनाओं को रोकना।

9. कानून व्यवस्था बनाए रखना: रैलियों या प्रदर्शनों के दौरान शांति और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना।

10. जन-जागरूकता कार्यक्रम: नागरिकों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति दीर्घकालिक जागरूकता बढ़ाने हेतु अभियान चलाना।

11. सफलता का मूल्यांकन: आंदोलन के प्रभाव से लागू नीतियों की समीक्षा कर परिणामों का आकलन करना।

12. नैतिक दृष्टिकोण: जनभावनाओं का सम्मान करते हुए निष्पक्षता और उत्तरदायित्व का पालन करना।

निष्कर्ष (Conclusion):

एक सिविल सेवक के रूप में मेरा उद्देश्य होगा कि युवाओं की ऊर्जा को रचनात्मक नीति-परिवर्तन में परिवर्तित किया जाए। संवाद, पारदर्शिता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर ही प्रशासन पर्यावरण संरक्षण और जनसंतोष दोनों सुनिश्चित कर सकता है।

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“A person’s real behaviour was be contrary to the person’s attitude towards specific subject.” Do you agree with this statement? Answer with suitable argument.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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“एक व्यक्ति का वास्तविक व्यवहार व्यक्ति की विश्वास विषय के प्रति अभिव्यक्ति का विरुद्ध हो सकता है।” क्या आप इस कथन से सहमत है? उपयुक्त तर्कों सहित उत्तर दीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

मानव व्यवहार (Human Behaviour) सदैव उसकी आंतरिक मान्यताओं या विश्वासों (Beliefs) का प्रत्यक्ष प्रतिबिंब नहीं होता। अक्सर व्यक्ति जो सोचता है, वही व्यवहार में प्रदर्शित नहीं करता—इसे “अभिवृत्ति और व्यवहार के अंतर (Attitude-Behaviour Gap)” कहा जाता है। इस अंतर के कई सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य कारण होते हैं।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. सामाजिक दबाव (Social Pressure): व्यक्ति अपने वास्तविक विचारों के विपरीत व्यवहार करता है ताकि समाज में स्वीकृति बनी रहे।

2. परिस्थितिजन्य बाध्यता: कभी-कभी परिस्थिति या पद की सीमाएँ व्यक्ति को अपने विश्वास से अलग कार्य करने पर मजबूर करती हैं।

3. व्यक्तिगत लाभ: स्वार्थ या लाभ की भावना व्यक्ति को नैतिक मान्यताओं के विरुद्ध जाने को प्रेरित कर सकती है।

4. भय और असुरक्षा: सज़ा, आलोचना या अस्वीकृति के डर से व्यक्ति अपने विश्वासों को छिपा सकता है।

5. संगठनात्मक संस्कृति: किसी संस्था का वातावरण व्यक्ति के नैतिक आचरण को प्रभावित करता है।

6. नैतिक द्वंद्व (Moral Dilemma): जब दो नैतिक मूल्यों में टकराव हो, तो व्यवहार विश्वास से भिन्न हो सकता है।

7. आत्म-नियंत्रण की कमी: कभी-कभी व्यक्ति सही विश्वास रखता है, पर भावनाओं पर नियंत्रण न होने से गलत व्यवहार कर बैठता है।

8. अवसरवादिता (Opportunism): अवसर मिलने पर व्यक्ति सिद्धांतों से समझौता कर सकता है।

9. आदर्श और व्यवहार का अंतर: विचारों में व्यक्ति आदर्शवादी होता है, पर व्यवहार में व्यावहारिकता अपनाता है।

10. भूमिका-संघर्ष: विभिन्न सामाजिक भूमिकाओं (जैसे अधिकारी, पिता, मित्र) में व्यक्ति अलग-अलग व्यवहार करता है।

11. शिक्षा और आत्ममंथन की कमी: नैतिक शिक्षा की कमी से विश्वास और व्यवहार में दूरी बढ़ती है।

12. उदाहरण: कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार को गलत मानता है, पर रिश्वत देकर काम करवाने को “व्यवहारिकता” समझता है।

निष्कर्ष (Conclusion):

अतः यह कथन सही है कि व्यक्ति का व्यवहार उसके विश्वासों से भिन्न हो सकता है।  इस अंतर को कम करने के लिए नैतिक शिक्षा, आत्म-जागरूकता और मूल्य-आधारित सामाजिक वातावरण की आवश्यकता है।

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What are the key difference between ethics in private relations (family, friendships) and public relations (business, politics)? Explain.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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निजी संबंधों (परिवार, मित्रता) और सार्वजनिक संबंधों (व्यापार, राजनीति) में नैतिकता के बीच मुख्य अंतर क्या है? समझाइए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

नैतिकता (Ethics) हमारे व्यवहार को सही और गलत के मानदंडों से परखने का आधार प्रदान करती है। यह जीवन के हर क्षेत्र—निजी (Private) और सार्वजनिक (Public)—में समान रूप से आवश्यक है। फिर भी, दोनों क्षेत्रों की प्रकृति और दायित्व अलग होने के कारण उनकी नैतिकता में अंतर पाया जाता है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. संबंधों का आधार:

निजी संबंध भावनाओं, स्नेह और विश्वास पर आधारित होते हैं, जबकि सार्वजनिक संबंध कर्तव्य, नियम और निष्पक्षता पर टिका होता है।

2. उद्देश्य:

निजी संबंधों में व्यक्तिगत सुख-संतोष लक्ष्य होता है, जबकि सार्वजनिक संबंधों का उद्देश्य सामाजिक या सामूहिक कल्याण होता है।

3. जवाबदेही (Accountability):

परिवार या मित्रता में जवाबदेही व्यक्तिगत होती है, जबकि सार्वजनिक जीवन में यह जनता और कानून के प्रति होती है।

4. निर्णय-प्रक्रिया:

निजी जीवन में निर्णय भावनात्मक होते हैं, जबकि सार्वजनिक जीवन में निर्णय तार्किक और नीति-आधारित होते हैं।

5. नैतिक मानदंड:

निजी नैतिकता में करुणा, प्रेम और निष्ठा प्रमुख हैं; सार्वजनिक नैतिकता में सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और पारदर्शिता प्रमुख हैं।

6. गोपनीयता:

निजी संबंधों में गोपनीयता स्वीकार्य है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में पारदर्शिता आवश्यक है।

7. हितों का टकराव:

निजी संबंधों में पक्षपात स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक संबंधों में यह भ्रष्टाचार का रूप ले सकता है।

8. परिणाम का प्रभाव:

निजी नैतिकता का प्रभाव सीमित दायरे में रहता है, जबकि सार्वजनिक नैतिकता का असर व्यापक समाज पर पड़ता है।

9. मूल्य-निर्देशन:

निजी क्षेत्र में नैतिकता व्यक्तिगत मूल्यों से निर्देशित होती है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में संस्थागत नियमों से।

10. समय और परिस्थिति:

निजी नैतिकता लचीली होती है, जबकि सार्वजनिक नैतिकता अधिक स्थिर और औपचारिक।

11. दायित्व की प्रकृति:

निजी संबंध स्वैच्छिक होते हैं, जबकि सार्वजनिक संबंध संवैधानिक या कानूनी दायित्वों पर आधारित होते हैं।

12. नैतिक संघर्ष:

कई बार निजी स्नेह और सार्वजनिक कर्तव्य में टकराव होता है, जहाँ प्रशासक को सार्वजनिक नैतिकता को प्राथमिकता देनी चाहिए।

निष्कर्ष (Conclusion):

निजी और सार्वजनिक नैतिकता दोनों मानव जीवन के पूरक हैं, परंतु शासन और प्रशासन में सार्वजनिक नैतिकता सर्वोपरि है। जब व्यक्ति दोनों में संतुलन बनाए रखता है, तभी वह सच्चे अर्थों में नैतिक जीवन जी सकता है।

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As an administrator, develop an intervention programme for attitude change in “corruption free India”.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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एक प्रशासक के रूप में “भ्रष्टाचार मुक्त भारत” के संवर्धन में अभिवृत्ति परिवर्तन है, अंतरावेशी कार्यक्रम विकसित कीजिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि लोगों की अभिवृत्तियों (attitudes) में सकारात्मक परिवर्तन से संभव है।एक प्रशासक के रूप में यह आवश्यक है कि प्रशासनिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर नैतिक जागरूकता विकसित की जाए।इसके लिए एक अंतराकोशी (Interventional) कार्यक्रम तैयार किया जा सकता है जो व्यवहार, सोच और मूल्यों में बदलाव लाए।

मुख्य बिंदु (Main Points):

1. नैतिक शिक्षा अभियान: विद्यालयों, महाविद्यालयों और प्रशिक्षण संस्थानों में नैतिकता और ईमानदारी पर सत्र आयोजित करना।

2. लोक सेवकों का प्रशिक्षण: अधिकारियों व कर्मचारियों को “Integrity and Ethics” पर नियमित प्रशिक्षण देना।

3. पारदर्शिता बढ़ाना: ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन सेवाओं को बढ़ावा देकर मानव संपर्क आधारित भ्रष्टाचार को कम करना।

4. जन-जागरूकता कार्यक्रम: नारे, पोस्टर, सोशल मीडिया अभियान के माध्यम से नागरिकों में ईमानदारी की भावना जागृत करना।

5. प्रोत्साहन तंत्र: ईमानदार अधिकारियों और नागरिकों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करना।

6. शिकायत निवारण तंत्र: स्वतंत्र और पारदर्शी “जन-सुनवाई” प्रणाली लागू करना।

7. नैतिक क्लब (Ethics Clubs): स्कूलों व कॉलेजों में नैतिक क्लब स्थापित कर युवाओं को भ्रष्टाचार विरोधी संदेश देना।

8. नागरिक सहभागिता: समाज के विभिन्न समूहों—NGOs, RWA, मीडिया—को भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों से जोड़ना।

9. मूल्याधारित नेतृत्व: उच्च अधिकारियों को नैतिक उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करना।

10. समाजिक अनुशासन: भ्रष्ट आचरण के प्रति समाज में अस्वीकार्यता (Zero Tolerance) का वातावरण बनाना।

11. मीडिया निगरानी: स्वतंत्र मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भ्रष्टाचार उजागर करने में सहयोगी बनाना।

12. सतत मूल्यांकन: अभियान की प्रभावशीलता मापने के लिए समय-समय पर निगरानी और सुधार करना।

निष्कर्ष (Conclusion):

भ्रष्टाचार मुक्त भारत की दिशा में सबसे प्रभावी उपाय नागरिकों और प्रशासकों की सोच में नैतिक परिवर्तन है। जब अभिवृत्ति, व्यवहार और प्रशासनिक संस्कृति ईमानदारी से जुड़ेंगी, तभी सच्चा सुशासन साकार होगा।

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Critically evaluate the role of society in shaping and internationalizing political attitudes.(Marks-12) UPPCS Mains 2024 GS-4

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राजनीतिक अभिवृत्तियों को आकार देने और अंतर्राष्ट्रीयकरण में समाज की भूमिका का आलोचनात्मक मूल्यांकन करिए।

Ans: प्रस्तावना (Introduction):

राजनीतिक अभिवृत्तियाँ (Political Attitudes) किसी व्यक्ति या समाज की राजनीतिक व्यवस्था, नीतियों और नेतृत्व के प्रति सोच को दर्शाती हैं। इन अभिवृत्तियों के निर्माण में समाज की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि समाज ही व्यक्ति के मूल्य, दृष्टिकोण और व्यवहार को गढ़ता है। आज के वैश्वीकरण (Globalization) युग में इन राजनीतिक अभिवृत्तियों का अंतर्राष्ट्रीयकरण भी तेजी से बढ़ा है।

मुख्य बिंदु (Main Points):

  • सामाजिक संस्थाएँ: परिवार, विद्यालय और समुदाय व्यक्ति की प्रारंभिक राजनीतिक सोच को आकार देते हैं।
  • मीडिया की भूमिका: सोशल मीडिया और समाचार माध्यम राजनीतिक दृष्टिकोण को वैश्विक स्तर पर प्रभावित करते हैं।
  • शिक्षा का प्रभाव: शिक्षित समाज अधिक तार्किक और लोकतांत्रिक राजनीतिक सोच अपनाता है।
  • आर्थिक स्थिति: आर्थिक वर्गों के भेद राजनीतिक प्राथमिकताओं को निर्धारित करते हैं।
  • धर्म और संस्कृति: सामाजिक परंपराएँ और धार्मिक मान्यताएँ राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रभावित करती हैं।
  • युवा शक्ति: आधुनिक समाज में युवा वर्ग नई राजनीतिक विचारधाराओं का वाहक बन रहा है।
  • वैश्वीकरण का प्रभाव: अंतरराष्ट्रीय मीडिया, प्रवासन और इंटरनेट राजनीतिक विचारों का वैश्विक आदान-प्रदान संभव बना रहे हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ: संयुक्त राष्ट्र (UN), IMF, WTO जैसी संस्थाएँ नीतिगत सोच को अंतरराष्ट्रीय दिशा देती हैं।
  • लोकतांत्रिक मूल्य: मानवाधिकार, समानता, और स्वतंत्रता जैसे मूल्य अब विश्वव्यापी राजनीतिक अभिवृत्ति का हिस्सा बन गए हैं।
  • राजनीतिक आंदोलनों का प्रसार: अरब स्प्रिंग या #MeToo जैसे आंदोलन वैश्विक राजनीतिक चेतना के उदाहरण हैं।
  • आलोचनात्मक पक्ष: वैश्वीकरण से स्थानीय मुद्दों और सांस्कृतिक पहचान का ह्रास भी देखा जा रहा है।
  • संतुलन की आवश्यकता: राष्ट्रीय हितों और वैश्विक मूल्यों में संतुलन बनाना आज की सबसे बड़ी चुनौती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

समाज राजनीतिक अभिवृत्तियों का मूल स्रोत है और वैश्वीकरण ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया है। यदि यह प्रक्रिया नैतिकता और जनहित पर आधारित रहे, तो विश्व राजनीति अधिक मानवीय और सहयोगी बन सकती है।

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